

एक दिन महान फ़िल्मकार करन जौहर अपने कमरे में अकेले बैठे देश की समस्याओं पर गहन चिन्तन कर रहे थे। अचानक उनकी अन्तरआत्मा (यह एक ऐसी चीज़ होती है जो अक्सर खूब सारे पैसे कमाने के बाद और विराट सफलता पाने के बाद हर इंसान में थोड़ी देर के लिये जाग जाती है और भुगतना दूसरों को पड़ता है। इस बार करन की अन्तरआत्मा का शिकार आम दर्शक हुये, खैर) उनके सामने आ खड़ी हुयी। अन्तरआत्मा ने उनसे पूछा के ऐ बॉलीवुड के सफलतम निर्माता निर्देशकों में से एक, बता आज तक तूने अपनी फ़िल्मों से कितने लोगों को जगाया है। सिनेमा जिसे समाज का दर्पण कहा जाता है, से कितनी ज्वलन्त समस्याओं की नब्ज़ पर उंगली रखी है। करन ने बताया कि उन्होंने स्त्रियों के कल्याण के लिये अपनी फिल्म में दिखाया है कि पुरुष का इन्तज़ार अगर स्त्री दस सालों तक करे तो वह भी एक दिन वापस ज़रूर आता है। उन्होंने अपनी एक दूसरी फ़िल्म में दिखाया है कि जिनके आंगन में हवाई जहाज़ उतरता है वे भी दीन दुखियारी लड़कियों से प्रेम विवाह कर सकते हैं और इस तरह समाज में वर्ग अन्तराल को कम करने की कोशिश की है। उन्होंने अपने बैनर द्वारा निर्देशित फि़ल्मों से प्रेम का प्रसार किया है और यहां तक बताने की कोशिश की है कि प्रेम किसी के भी बीच हो सकता है। और दो पुरुषों के बीच हुआ प्रेम भी उतनी ही सार्थक और बिकाऊ होता है। अन्तरआत्मा कनवेंस नहीं हुयी। उसने करन के कान में कुछ कहा और करन उठ खड़े हुये। उन्होंने सोचा कि यह सही वक्त आ गया है कि जब कुछ ऐसी चीज़ बनायी जाय जिससे पता चल सके कि वे भी देश की समस्याओं को लेकर गम्भीर हैं। हालांकि बाद में उन्हें याद आया कि वे इतने ग्लोबल हो चुके हैं कि उनसे देश की समस्याओं से ज्यादा दुनिया की चिन्ता करनी चाहिये। बहरहाल, उन्होंने अपने अभिन्न मित्र शाहरूख खान को याद किया और दोनों ने मिलकर एक शानदार फ़िल्म बना डाली जिसका नाम उन्होंने रखा ´माई नेम इज़ खान' हालांकि देश के अल्पसंख्यकों की भी समस्याएं भी कम विकराल नहीं थीं और आये दिन सन्दिग्ध इनकाउंटर हो रहे थे। यहां तक कि देश में अल्पसंख्यकों को किराये पर कमरा लेने तक की जद्दोजहद करनी पड़ रही थी लेकिन करन जानते थे कि ये तुच्छ समस्याएं दिखाने से रुपये आएंगे जबकि अमेरिका में एक अल्पसंख्यक की समस्याएं दिखाने से डॉलर पौण्ड सहित और भी बहुत कुछ आयेगा। फ़िल्म एस्पर्जर नामक बीमारी से ग्रस्त एक व्यक्ति रिज़वान खान की है जिसकी भूमिका शाहरूख ने पूरी ईमानदारी से निभायी है जैसा कि एक साक्षात्कार में उन्होंने खुद ही कहा था कि जहां उन्हें अच्छा पैसा मिलता है वहां वो अच्छा काम करते हैं (सबूत के लिये देखें हालिया रिलीज ´दूल्हा मिल गया´)। एस्पर्जरग्रस्त रिजवान हिन्दी फिल्म के नायकों से कहीं से भी पीछे नहीं है विकलांगता के बावजूद। वह अच्छे खासे पज़ल को चुटकियों में हल कर सकता है और पीले रंग से डर लगने के बावजूद कई दृश्यों में पीले रंग से डरना भूल जाता है। काजोल चुलबुली मन्दिरा के रोल में हैं जिनका पहले पति से एक बच्चा है। वह इतनी समझदार दिखायी पड़ती हैं कि एक एस्पर्जरग्रस्त व्यक्ति से शादी करने के लिये उन्हें सिर्फ सुबह का नज़ारा दिखाये जाने की ज़रूरत होती है। उन्हें न तो रिजवान का एस्पर्जरग्रस्त होने से कोई समस्या नहीं है और उसके मुसलमान होने को तो वह महान महिला एक बार भी रेखांकित नहीं करती। आपके मन में ये सवाल उठता है लेकिन आप यह सोच कर चुप रह जाते हैं कि नायिका वाकई बहुत समझदार और सुलझी हुयी है। 9/11 के हमले के बाद नायिका का बेटा एक हमले में मार दिया जाता है जिसे बहुत सतही तरीके से फिल्म में नस्लीय हमला करार दिया गया है पर दरअसल वह दूसरी समस्या है। उसके बाद वही नायिका जिसके लिये अलग धर्म का होना बहुत मामूली बात थी अचानक प्रवीन तोगड़िया और मौलाना बुखारी की तरह उन्माद में आ जाती है। वह रिज़वान खान को भला बुरा कहती है, हिस्टीरिया के मरीज़ की तरह चीखती है और यह जानते हुये भी कि उसके पति का इसमें कोई हाथ नहीं है, उसे अपने से दूर कर देती है। यहां करण को कहानी में एक ज़बरदस्त टिवस्ट मिलता है कि नायक को अमेरिका के राष्ट्रपति से मिलने भेजा जाय तो अमेरिकी दर्शक बहुत खुश होंगे। तो वह नायिका को सिखाते हैं। नायिका कुछ संवाद बोलने के बाद यह प्रस्ताव नायक को देती है और नायक अपने अभियान पर चल देता है। मगर नायक और उसके साथ निर्देशक दोनों ही असली सफ़र पर जाने की बजाया इधर उधर ज्यादा भटकते दिखायी देते हैं। एस्पर्जरग्रस्त नायक तूफ़ान में जाकर वह वह काम करता है जो सुपरमैन भी न कर पाता। वह महामानव बनने लगता है और अन्तत: अपने मिशन में कामयाब होता है। वह नवनिर्वाचित राश्ट्रपित बराक ओबामा से हाथ मिलाकर बोलता है-माइ नेम इज़ खान एण्ड आयम नॉट ए टेररिस्ट। फ़िल्म खत्म होती है और जैसा कि उम्मीद थी, भारत के दर्शक शाहरूख की उम्दा एक्टिंग के लिये यह अझेल फ़िल्म देख ले जाते हैं और टारगेट ऑडियंस अपनी समस्या से आइडेंटिफाई करती हुयी। विदेशों में फ़िल्म सफ़लता के झण्डे गाड़ देती है और कई रिकॉर्ड तोड़ देती है और करन का यह भ्रम बरक़रार रह जाता है कि वे बड़ी शानदार फिल्में बनाते हैं।
बहरहाल, फ़िल्म बहुत ही बोझिल तरीके से शुरू होती है और उससे भी बोझिल तरीके से ख़त्म। शुरूआत फिर भी अच्छी है जहां ज़रीना वहाब ने एक मां की भूमिका में कई अच्छे दृश्य दिये हैं। मगर पूरी फ़िल्म में अतार्किक कहे जा सकने वाले दृश्यों की भरमार है। 9/11 की बरसी पर जब सभी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं, हमारा नायक जो भारत में डिजायनर कपड़े पहनता था अचानक शलवार कुर्ते में सूरा फतह पढ़ता दिखायी देता है। वह बहुत प्यारा मुसलमान है जो उस माहौल में भी कहीं भी नमाज पढ़ सकता है। मस्जिद में एक कहानी सुनते वक़्त वो ढेर सारे मुसलमानों के बीच असली कहानी सुनाता है और आश्चर्य है कि वहां बैठे सभी मुसलमानों में से किसी को भी उसका जवाब नहीं मालूम। सभी पूछते हैं तो रिज़वान जवाब देता है- वह शैतान था।
फ़िल्म के सफल होने के बाद करन एक दिन अपने कमरे में बैठे कुछ गठीले अभिनेताओं की तस्वीरें देख रहे थे कि उनकी अन्तरआत्मा वहां आ गई। उसने कहा कि फिल्म में भारत के अल्पसंख्यकों की समस्याओं को दिखाया जाना चाहिये था जो अपेक्षाकृत ज्यादा असहाय हैं। करन मुस्कराये, दरवाज़ा खोला और उसे लात मार कर बाहर धकेल दिया।
विमल चन्द्र पाण्डेय
माइ नेम इज़ आम दर्शक और मैं बेवकूफ़ नहीं हूं
addictionofcinema, बुधवार, 17 मार्च 2010मासूमा
Javed Khan, शनिवार, 13 मार्च 2010
बहुत दिनो से कुछ पढ़ नहीं। अपने पढ़ने की भुख को मिटाने के लिए कुछ खोज रहा था ठीक उसी तरह जैसे कुत्ता भुखा होने पर हड्डी खोजता है। तभीं मुझे इस्मत चुग़ताई की एक किताब मिली `मासूमा´। जिसकी शुरूआत एक कविता से हुई है और खत्म भी कविता से है। और किताब के बारे में ज्यादा तो नहीं बता सकता क्योंकि अभी मैंने पढ़ना शुरू ही किया है मगर मैं आपको वो दोनो कविता पेश करना चाहता हूं-किताब जहां से शुरू होती है-
चार महीने का मकान का किराया
नौकरों की तन्ख्वाह-बनिये का कर्ज
बिजली का बिल-धोबी की धुलाई
बच्चों की फीस-पानी सर से गुज़र जाता है
मैं डूबते-डूबते उभरकर देखती हूं
मेरी सोलह बरस की जीती जागती बेटी
नौ-उम्र सहेलियों के साथ रस्सी कूद रही है।
और किताब के अन्त में-
मेरी सोलह बरस की जीती जागती बेटी
नौ-उम्र सहेलियों के साथ रस्सी कूद रही है
ऐ काश मैं वापस उसे अपनी कोख में छुपा सकती !
जुगाड़ से पहले का जुगाड़
shashi shekhar, शुक्रवार, 12 मार्च 2010
मीडिया में नौकरी यानि 'फुलटू' जुगाड़
भागीरथ, बुधवार, 10 मार्च 2010
उत्तम बनर्जी
चाहे टीवी हो या फिर प्रिंट ...पत्रकारिता में अपना भविष्य तलाश रहे स्टूडेंट इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि बिना जुगाड़ के इस इण्डस्ट्री में कुछ होने वाला नहीं। वजह साफ है...इक्के दुक्के मीडिया इंस्टीट्यूट को छोड़ दिया जाए तो देश में कुकुरमुत्ते की तरह फैले तमाम संस्थानों से निकले स्टूडेंट्स जिनका कोर्स कंपलीट करने के बाद एक ही ख्वाब होता है मीडिया में आते ही छा जाना। मगर हकीकत की जमीन पर कदम रखते ही इनका ये ख्वाब आइने की तरह चकनाचूर हो जाता है। तमाम योग्यता के बावजूद देश के टॉप-मोस्ट टीवी चैनल या फिर अखबार में नौकरी पाने की उम्मीद कहीं दूर दूर तक नज़र नहीं आती।
वजह इनके पास यहां तक पहुंचकर अपनी काबिलियत दिखाने के लिए किसी जुगाड़ का न होना। कुछ दिनों मीडिया हाउसों के चक्कर लगाने के बाद इन्हें ये बात समझते देर नही लगती कि जिस ग्लैमर के फेर में इन्होंने समाज में कुछ अलग से कर गुजरने के लिए ये पेशा चुना... अन्दरखाने इसकी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। टीवी चैनल हो या अखबार का दफ्तर... रेज्यूमे लेकर पहुंचते ही स्टूडेंट्स का पाला सबसे पहले दफ्तर के बाहर खड़े सुरक्षा गार्ड से होता है जिसे सुरक्षा करने के साथ साथ पूरी तरह से ये अघोषित अथारिटी मिली होती है कि नए नवेले पत्रकारों से वो अपने तरीके से ही निपटे। आज के जमाने के हिसाब से महज साक्षरता की डिग्री लिए (कई सुरक्षा गार्ड के पास तो लम्बे चौड़े शरीर के अलावा कोई सर्टिफिकेट तक नहीं होता) ये गार्ड होनहार पत्रकारों का बाहर से ही इंटरव्यू लेकर इन्हें गुडबॉय बोल देता है। अगर दो चार मिनट ठहरकर गार्डों से संस्थान के बारे में पता किया जाए तो ये सुनकर वाकई हैरानी होती है कि इन्हें संस्थान की अन्दरूनी खबर ऐसे मालूम रहती है जैसे ये मैनेजमेंट टीम के ही कोई सीक्रेट एजेंट हों। एक जगह से निपटकर स्टूडेंट दूसरे मीडिया संस्थान पहुंचता है, ये सोचकर कि शायद वहां कुछ भला हो जाए लेकिन यहां की स्थिति भी वही ढाक के तीन-पात।
लिहाजा, कुछ दिनों में ही इन्हें एकेडमिक और प्रोफेशनल के बीच करियर का फर्क समझ में आना शुरू हो जाता है। आखिर में नौकरी को छोड़कर स्टूडेंट इस समझौते पर राजी हो जाते हैं कि किसी मीडिया संस्थान में इंटर्नशिप ही मिल जाए। इंटर्नशिप के दौरान शोषण और त्रासदी का एक नया दौर शुरू होता है। इसके ठीक उलट कुछ मीडिया संस्थानों में बहुतायत में लड़के-लड़कियों को सिर्फ इसलिए इंटर्नशिप दी जाती है ताकि चैनल या अखबार को मुफ्त में काम करने वाले लोग मुहैया हो सके। इंटर्नशिप पाने वाले स्टूडेंटस जी जान से मेहनत करते हैं ताकि उनकी मेहनत और प्रतिभा पर उनके बास की नज़र पड़े और उनके भाग्य का पिटारा खुल जाए लेकिन ऐसा कभी कभार ही हो पाता है। आलम ये है कि कई स्टूडेंटस इसी गलतफहमी में एक-एक साल तक अलग-अलग मीडिया संस्थान में केवल इंटर्नशिप ही करते नज़र आते हैं लेकिन आखिर में सिवाय मायूसी के इनके हाथ कुछ नही लगता।
अब एक दिलचस्प बात...मीडिया के दिग्गजों के बारे में ...मीडिया के महारथी माने जाने वाले दिग्गज पत्रकारों का एक हुजुम ऐसा भी है जिन्हें अगर गलती से फोन कर नौकरी की बात कर दी जाए तो वे ऐसे रिएक्ट करते हैं जैसे उनसे राह चलते कोई भिखारी टकरा गया हो। फोन करने वालों से इनका पहला सवाल यही होता है कि तुम्हें मेरा नंबर किसने दिया। मीडिया के इन महारथियों को शायद इस बात का इल्म तो होगा ही कि इस इण्डस्ट्री में उनके फोंन नंबर तो क्या आज की तारीख में किसी का भी नंबर हासिल करना कोई टेढ़ी खीर नही है। हैरानी की बात तो ये है कि अपने बीते दिनों को ऐसे लोग जरा भी याद नही रखते जब इन्होंने भी नौकरी के लिए इधर-उधर खाक छानी होगी।
ये बात जगजाहिर है कि अब पुराने पत्रकारिता के दिन लद गए जब पत्रकार मतलब कुर्ता-पजामा और कंधे पर बैग होता था। उस दौर में पत्रकारिता का मकसद भी कलम की ताकत से हवा का रूख मोड़ देना था...आज पत्रकारिता के मॉडर्न लुक में ज्यादातर बड़े पत्रकारों के पास नए मॉडल की चार-पहिया गाड़ी होती है। तनख्वाह तो पूछिए मत....सुनते ही होश उड़ जाएंगे। ज्यादातर संपादक अपने संस्थान में इस बात को अक्सर कहते सुने जाते हैं कि चैनल या अखबार मैं समाजसेवा के लिए नही चला रहा हूं। अखबारों में जहां सर्कुलेशन को लेकर भस्सड़ मची रहती है, ठीक यही हाल टीवी चैनलों में टीआरपी को लेकर दिखाई देता है। कही फलां न्यूज चैनल या अखबार उनसे आगे नही निकल जाए इस बात को लेकर संपादक दफ्तर के हर कर्मचारी को अक्सर नसीहत झाड़ते नज़र आते हैं। अगर गलती से भी टीआरपी या सर्कुलेशन कम हुआ तो गाज गिरना तय है।
ऐसे हालात में मैं मीडिया के उन तमाम स्टूडेंटस को यही ताकीद करना चाहूंगा कि अगर प्रतिभा, पेशेंश और सबसे महत्वपूर्ण चीज जुगाड़ है तभी इस फील्ड में कदम रखें। नही तो..... ये राह नहीं आसां बस इतना समझ लीजै। इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।
(लेखक प्रज्ञा टीवी में एसोसिएट प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर हैं)

आनंद प्रधान
अपने समाचार चैनलों में कुछ अपवादों को छोड़कर आक्रामकता और शोर बहुत है। इस हद तक कि खबरें चीखती हुई दिखती हैं। एंकर और रिपोर्टर चिल्लाते हुए से लगते हैं। चर्चाएं हंगामाखेज होती हैं। धीरे-धीरे यह शोर और आक्रामकता चैनलों की सबसे बड़ी पहचान बन गई है। संपादक इस बात को बड़े फाख्र से अपने दमखम, साहस और स्वतंत्रता की निशानी के बतौर पेश करते हैं। उनका दावा है कि उन्होंने हमेशा बिना डरे, पूरी मुखरता से न्याय के हक में आवाज उठाई है। इसके लिए आवाज ऊंची भी करनी पड़ी है तो उन्होंने संकोच नहीं किया है।
चैनलों के कर्ता-धर्ताओं का तर्क है कि उनकी आक्रामकता और शोर आम लोगों को जगाने और ताकतवर लोगों को चुनौती देने के लिए जरूरी हैं। बात में कुछ दम है। कई मामलों में यह आक्रामकता और शोर जरूरी भी लगता है। पहरेदार की उनकी भूमिका को देखते हुए यह स्वाभाविक भी है। यह भी सही है कि कई मामलों में चैनलों के इस शोर से सत्ता या उसका संरक्षण पाए शक्तिशाली अपराधियों को पीछे हटना पड़ा या कमजोर लोगों को न्याय मिलने का अहसास हुआ़ भले ही चैनलों के भ्रष्टाचार विरोधी या न्याय अभियान का दायरा ज्यादातर कुछ सांसदों, छोटे-मोटे नेताओं-अफसरों, बड़े शहरों और उनके उच्च मध्यमवर्गीय लोगों तक सीमित रहा हो लेकिन इसके लिए भी चैनलों की तारीफ होनी चाहिए। आखिर कुछ नहीं से कुछ होना हमेशा बेहतर है।
कल्पना करिए कि आज से 50 या 100 साल बाद जब इतिहासकार हमारे मौजूदा चैनलों की रिकॉर्डिंग के आधार पर आज का इतिहास लिखेंगे तो उस इतिहास में क्या होगा? वह किस देश का इतिहास होगा और उस इतिहास के नायक, खलनायक और विदूषक कौन होंगे? लेकिन समाचार चैनलों से उनके दर्शकों की अपेक्षाएं इससे कहीं ज्यादा हैं। मशहूर लेखक आर्थर मिलर ने अच्छे अखबार की परिभाषा देते हुए लिखा था कि अच्छा अखबार वह है जिसमें देश खुद से बातें करता दिखता है। बेशक, समाचार चैनलों के लिए भी यह कसौटी उतनी ही सटीक है। सवाल यह है कि हमारे शोर करते चैनलों में हमारा वास्तविक देश कितना दिखता है? क्या उनमें देश खुद से बातें करता हुआ दिखाई देता है? याद रखिए, चैनल कहीं न कहीं हमारे दौर का इतिहास भी दर्ज कर रहे हैं। जाहिर है कि स्रोत के बतौर चैनलों को आधार बनाकर लिखे इतिहास में मुंबई, दिल्ली और कुछ दूसरे मेट्रो शहरों का वृत्तांत ही भारत का इतिहास होगा जिसमें असली नायक, खलनायक की तरह, खलनायक, विदूषक और विदूषक, नायक जैसे दिखेंग़े। इस इतिहास में कहानी तो बहुत दिलचस्प होगी लेकिन उसमें गल्प अधिक होगा, तथ्य कम। शोर बहुत होगा पर समझ कम। थोथापन, आक्रामकता, कट्टरता, जिद्दीपन जैसी चीजें ज्यादा होंगी मगर न्याय और तर्क कम। बारीकी से देखें तो साफ तौर पर चैनलों के शोर और आक्रामकता के पीछे एक षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी और भीरुपन भी दिखाई देगा। लगेगा कि चैनल जान-बूझकर शोर-शराबे और आक्रामक रवैए के पीछे कुछ छुपाने में लगे रहते हैं। आखिर वे क्या छुपाते हैं? गौर से देखिए तो वे वह हर जानकारी छुपाते या नजरअंदाज करते हैं जिससे नायक, नायक, खलनायक, खलनायक और विदूषक, विदूषक की तरह दिखने लग़े, इसीलिए चैनल आम तौर पर उन मुद्दों से एक हाथ की दूरी रखते हैं जो सत्ता तंत्र द्वारा तैयार आम सहमति को चुनौती दे सकते हैं।
नहीं तो क्या कारण है कि माओवादी हिंसा को लेकर जो चैनल इतना अधिक आक्रामक दिखते और शोर करते हैं, वे छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और बंगाल में जमीन पर क्या हो रहा है, उसकी रिपोर्टिंग के लिए टीम और कैमरे नहीं भेजते? क्या ये जगहें देश से बाहर हैं? इन राज्यों में जमीन, जंगल, नदियों और संसाधनों के साथ ही वहां के मूल निवासियों की क्या स्थिति है, इसके बारे में खबर हर कीमत पर, सच दिखाने का साहस, आपको रखे आगे और सबसे तेज होने का दावा करने वाले चैनलों से नियमित वस्तुपरक रिपोर्ट की अपेक्षा करना क्या चांद मांगने के बराबर है?
क्या चैनलों से यह उम्मीद करना गलत है कि वे मुंबई में बाल-उद्घव-राज ठाकरे को दिन-रात दिखाने और शोर मचाने के बाद कुछ समय निकालकर युवा वकील शाहिद आजमी की हत्या पर भी थोड़ी आक्रामकता दिखाएंगे? या देश भर में कहीं नक्सली, कहीं माओवादी और कहीं आतंकवादी बताकर पकड़े-मारे जा रहे नौजवानों के बारे में थोड़े स्वतंत्र तरीके से खोजबीन करके निष्पक्ष रिपोर्ट दिखाएंगे? क्या वे उन बुद्घिजीवियों-पत्रकारों के बारे में तथ्यपूर्ण रिपोर्ट सामने लाएंगे, जिन्हें नक्सलियों का समर्थक बताकर गिरफ्तार किया गया है या जिनकी हिरासत में मौत हुई है? क्या वे चंडीगढ़ की रुचिका की तरह छत्तीसगढ़ के गोंपद गांव की सोडी संबो की कहानी में भी थोड़ी दिलचस्पी लेंगे और उसे न्याय दिलाने की पहल करेंगे? दरअसल, शोर-शराबे और आक्रामकता के बावजूद ऐसे सैकड़ों मामलों में चैनलों की चुप्पी कोई अपवाद नहीं। यह एक बहुत सोची-समझी चुप्पी है जिसे चैनलों के शोर-शराबे में आसानी से सुना जा सकता है।
(आनंद प्रधान भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं और उनका यह लेख तहलका से साभार लिया गया है)
आधी के लिए तिहाई क्यों?
नीरज कुमार, मंगलवार, 9 मार्च 2010आखिर क्यों किसी पार्टी कि औकात नहीं हुई कि वह आरक्षण बिल का विरोध कर सके सिर्फ इसलिए कि कोई अपने वोट बैंक में सेंध नहीं लगवाना चाहता है लेकिन जैसे ही किसी पार्टी से पूछा जाता है कि आप ने चुनाव में कितनी टिकटें महिलाओं को दी थी सभी के मुंह पर टेप चिपक जाती है, अपनी बगलें झाँकने लगते हैं. भाई साहब नियत में ही खोट है अगर नियत साफ़ होती तो कोई पार्टी भला करने के लिए बिल का इंतज़ार नहीं करती समाज सेवा करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता का ठप्पा लगाना जरुरी है क्या? कोई बिल कोई आरक्षण कभी भी किसी समाज का भला नहीं कर सकता है मेरी इस बिल को लेकर कोई आपति नहीं है लेकिन कृपया इसे किसी नैतिकता या आदर्श राजनैतिक पहल के रूप में मत देखिये.
'जंग में क़त्ल सिपाही ही होंगे, सुर्ख रु जिल्ले इलाही ही होंगे'
deepak k singh,मुझे हैरानी हो रही है इस हाय तोबा को देखकर जो महिला आरक्षण के सवाल पर मची हुई है। मैं इस हालत में नहीं हूँ की इस पर कोई स्टैंड ले कर अपनी बात कह सकूं। क्योंकि ये व्यवस्था स्टैंड के मुद्दे पर केवल दो विकल्पों को पेश कर रही है। एक, या तो आप इसका समर्थन करें और दो के इसका विरोध करें। इनके अलावा और कोई विकल्प प्रस्तुत ही नहीं किया जा रहा और न ही ऐसी कोई गुंजाईश ही छोड़ी है की कोई विकल्प पेश किया जा सके। ये ठीक उसी किस्म की रिक्तता है जो हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विधमान है। यानी की घूम फिर कर बात वहीँ आ जाएगी जहाँ से शुरू हुई। हमारी महिलाएं भी पोलिटिकल सवर्ण बन्ने को बेक़रार हैं? यदि हां, तो कितनी ? इसका समुचित उत्तर दिए बिना कोई फैसला करना बेमानी ही होगी क्यूंकि इस मुल्क की सभी महिलाएं शहरों में नहीं रहती हैं और सभी की समस्या केवल तैंतीस फीसद आरक्षण से समाप्त नहीं हो जाएँगी। फिर इसका लाभ किन लोगों को मिलने वाला है? वो कौन भारतीय नारियां हैं जिनका जीर्णोधार इससे होने वाला है। कहीं ये वो ही पोलिटिकल सवर्ण तो नहीं जिसने इस बार नारी की शकल अख्तियार कर ली है?
मैं इस बात से बिलकुल इत्तेफाक रखता हूँ की राजनितिक प्रतिनिधित्व सामाजिक परिवर्तन का और सामाजिक रूप से शोषित व उपेक्षित लोगों को शाश्क्त करने का ठोस जरिया है। संविधान में राजनितिक आरक्षण कुछ इन्ही आदर्शों को सोच कर रखा गया था। लेकिन अफ़सोस की बात ये है की इसने केवल कुछ का ही भला किया है। तो क्या फिर हम ये मान ले की महिला आरक्षण भी उन्ही 'कुछ' को ध्यान में रखकर प्लान किया गया है। आरक्षण मिल जाने की हालत में भी इस बात की क्या गारंटी है की जिनकी (पुरुष प्रधानता) की वजह से ये पूरा मामला उठा उस की मानसिकता या सोच में कुछ बुनियादी बदलाव आएगा? ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब या विकल्प तक ये व्यवस्था नहीं देती।
'सवर्णों' का देश है 'भारत'!
अजय यादव, रविवार, 7 मार्च 2010
बात अगर यूं कहें कि भारत, एक ऐसा देश, जो अपने निर्माण के हजारों साल पहले से ही धर्म, जाति, क्षेत्र, समुदाय और विभिन्न संस्कृतियों के बीच उलझा हुआ देश था(है)। आज वही देश अनेको तरह के संक्रमण को झेलते हुए न सिर्फ दुनियां की महाशक्ति बनने को बेकरार है, बल्कि संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने को प्रतिबद्ध भी। भारत के लिए यह एक ऐतिहासिक समय ही है कि महिला दिवस के मौके पर दक्षिणपंथी-वामपंथी-कांग्रेसी और कुछ क्षेत्रीय दल भी राजनीति में महिलाओं को एक तिहाई हिस्सेदारी देने के लिए एकमत हो गये हैं। 'आरक्षण विरोधियों' या यूं कहिए कि पिछड़ों का प्रतिनिधित्व करने वाली नाममात्र की कुछ क्षेत्रीय पार्टियों को छोड़ दें तो आज पूरा देश इस बात पर सहमत है कि महिलाएं, जो किसी भी वर्ग,वर्ण,जाति,क्षेत्र,समुदाय, धर्म या संस्कृति की हों, 'दलित' ही हैं, इसलिए उन्हें आरक्षण देना देश और समाज के हित में है- जाहिर है यह सब बढ़कर बहुतों को अच्छा लग रहा होगा, और इनमें भी सबसे ज्यादा वे लोग होंगे जो महिला आरक्षण के मामले में भरत(भारत) के साथ हैं।
वही त्रिलोचन है
कठफोड़वा, गुरुवार, 4 मार्च 2010शास्त्री बाजारवाद के धुर विरोधी थे। हालांकि उन्होंने हिंदी में प्रयोगधर्मिता का समर्थन किया। उनका कहना था, भाषा में जितने प्रयोग होंगे वह उतनी ही समृद्ध होगी। शास्त्री ने हमेशा ही नवसृजन को बढ़ावा दिया। वह नए लेखकों के लिए उत्प्रेरक थे। 9 दिसंबर, 2007 को ग़ाजियाबाद में उनका निधन हो गया।
वही त्रिलोचन है
वही त्रिलोचन है, वह-जिस के तन पर गंदे
कपड़े हैं। कपड़े भी कैसे-फटे लटे हैं
यह भी फ़ैशन है, फ़ैशन से कटे कटे हैं।
कौन कह सकेगा इसका यह जीवन चंदे
पर अवलम्बित् है। चलना तो देखो इसका-
उठा हुआ सिर, चौड़ी छाती, लम्बी बाहें,
सधे कदम, तेजी, वे टेढ़ी मेढ़ी राहें
मानो डर से सिकुड़ रही हैं, किस का किस का
ध्यान इस समय खींच रहा है। कौन बताए,
क्या हलचल है इस के रुंधे रुंधाए जी में
कभी नहीं देखा है इसको चलते धीमे।
धुन का पक्का है, जो चेते वही चिताए।
जीवन इसका जो कुछ है पथ पर बिखरा है,
तप तप कर ही भट्ठी में सोना निखरा है।
(कविता कोष से साभार)
'चलो फिर हमीं क़त्ल हो आयें यारों'
deepak k singh, बुधवार, 3 मार्च 2010बजट पेश हो चुका है। वाहवाही लूटी जा चुकी है। विरोध जताया जा चुका है। वो सब हो चुका है जो हर साल बजट पेश होने के बाद होता है। यानी की जिंदगी ज़ारी है। जिंदगी की कहानी ज़ारी है। जिंदगी की कविता उसका गीत ज़ारी है। अभी कल ही की बात है जम्मू कश्मीर का पूर्व मुख्यमंत्री वर्तमान वित्तमंत्री के इस संतुलित बजट पर उसकी पीठ ठोंक रहा था। ठीक इसी वक़्त कहीं से फैज़ की वो नज़्म कहीं किसी सड़क पर, रेलवे स्टेशन पर, बस - रेलगाड़ी में, पैदल चलते लोगों की उखड्तीहुई साँसों से दूर कहीं फसल काटते हुए किसान की हसियां से, हाइवे बनाने में जुटी उस सांवल मांसल युवती के पसीने से निकली जिसे मैं कभी कभी गुनगुनाता हूँ:
मेरे दिल मेरे मुसाफिर, हुआ फिर से हुकम सादिर,
के वतन बदर हों हम तुम।
दे गली गली सदायें करें रुख नगर नगर का के सुराग कोई पायें किसी यार ऐ नामवर का,
हर एक अजनबी से पूछें जो पता था अपने घर का,
सर ऐ कू ऐ ना शानाया हमे दिन से रात करना,
कभी इससे बात करना कभी उससे बात करना,
तुम्हे क्या कहूँ की क्या है, शब् ऐ ग़म बुरी बला है,
हमे ये भी था गनीमत जो कोई शुमार होता,
हमे क्या बुरा था मरना जो एक बार होता.
थारी भली होवे मीडिया ................ !
गुड्डा गुडिया, शनिवार, 27 फ़रवरी 2010आउटडेटेड देवियां!
अजय यादव, शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010
मकबूल को ही क्यों, मुझे भी देवी-देवता नंगे दिखते थे…थे इसलिए कि आजकल नंगई देखने के मेरे पास ढेर सारे विकल्प हैं। कुछ उसी तरह जैसे सरस्वती के बाद मकबूल की नजर माधुरी पर गड़ गयी, भले ही दोनों को देखने के उनके भाव अलग-अलग हो।
मैं यहां बता दूं कि जब न चाहते हुए भी मुझे हिन्दू देवियां नंगी दिखती थी, तब मैं चौथी-पांचवी-छठी-सातवीं-आठवीं-नौवी-दसवीं में पढ़ता था और ब्रह्यचर्य के सिद्धान्तों पर खरा उतरने की कोशिश करता था। मेरी भाभियां मुझे अपना सबसे अच्छा देवर, बहने सबसे अच्छा भाई, मायें अच्छा बेटा और गांव सीधा लड़का मानता था। मैं अपने सहपाठियों और दोस्तों के इश्कबाजी के जांबाज किस्सों को नजरअंदाज करता अकेले रहना पसंद करता था। उस घर में जहां देवी-देवताओं के फोटो टंगे रहते थे और मेरे पढ़ने का टेबल भी।,खूब पूजापाठ किया करता था और भगवान से मांफी मांगते हुए उनकी बगल में खड़ी देवियों को चोरी से निहारता भी था।
· (मेरा उद्देश्य मकबूल को सही ठहराना नहीं, बल्कि मुर्खाना विरोध और उसपर की जा रही राजनीति से है)
क्या यह इंसानों का बजट था?
अजय यादव, गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
अगर मैं कहूं कि सांस लेने के लिए हवा, पीने के लिए पानी, रौशनी के लिए सूरज, पढ़ने के लिए स्कूल, पेट के लिए भोजन, पहनने के लिए कपड़ा और रहने के लिए एक छज्जा तो सभी के लिए जरूरी है, तो क्या मैं वाकई कोई हास्यास्पद बात कर रहा हूं। अगर मैं कहूं कि किसी महान देश का नागरिक होने के नाते नहीं, बल्कि एक आदमी होने के नाते हर आदमी को उसका हक तो मिलना ही चाहिए, क्या यह भी कोई हास्यास्पद बात है। 24 फरवरी सन् 2010 को भारत की रेलमंत्री ममता बनर्जी ने अपने नागरिकों (भारत में सफर करने वाले विदेशियों के लिए भी) का रेल बजट पेश किया, लेकिन औपनिवेशिक दौर से ही चले आ रहे यात्राओं के अमानवीय सफर की तरफ ध्यान भी नहीं दिया और पिछले रेलमंत्रियों और सरकारों की तरह इस बार भी भेदभाव के सफर को जारी रखा।
मैं बात कर रहा हूं रेलवे का अभिन्न अंग बन चुके उस साधारण डिब्बे की, जो भारत की वर्ण व्यवस्था की तरह देश की बहुसंख्यक जनता के सफर की नियति बन चुकी है। 70 सीटों वाले इस डिब्बे में यात्री तब तक घुसने की जुगत में लगे रहते हैं जबतक कि डिब्बे के दरवाजे पर लटकने की जरा-सी भी गुंजाइश बची हो। कभी ऐसे ही ठसाठस भरे डिब्बे के पास जाइए और केवल समझने के तौर पर अपने बैग बोगी में घुसाने का प्रयास कीजिए। आप पाएंगे कि पहले तो लोग बैग भीतर जाने से ही रोकेंगे और अगर किसी तरह आपका बैग डिब्बे में घुस गया तो वह एक हाथ से दूसरे हाथ, दूसरे हाथ से तीसरे, उपर ही उपर वह पूरी बोगी में सफर कर जाएगा और यह भी तय है कि कुछ मिनटों बाद उसे भी जगह मिल ही जाएगी, लेकिन उस बैग को बोगी से बाहर फेंकने का ख्याल किसी भी यात्री के दिमाग में नहीं आयेगा। लेकिन यही यात्री भारत में सफर की इस वर्ग व्यवस्था का कभी-कभी शिकार भी बन जाते हैं, जिनकी ट्रेन से गिरकर घायल होने या मरने की खबरें हमें अखबारों में अक्सर पढ़ने को मिल जाती हैं।
मैं ये बातें आदमी के हक को खैरात समझने वालों या उन मीडियाकर्मियों के तर्क कि सचिन की सेंचुरी के सामने ममता के बजट की क्या चर्चा, के विरोध में नहीं लिख रहा हूं। बल्कि इसलिए लिख रहा हूं कि आज जब मैं अपने दोस्त जितेन्द्र को छोड़ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचा तो दरभंगा जाने वाली बिहार संपर्क क्रान्ति एक्सप्रेस के एसी टू टीयर के यात्री इस बात से काफी खुश दिखे कि आर्थिक मंदी और कमरतोड़ महंगाई के बावजूद दीदी ने इस बार यात्री किराए में कोई बढ़ोतरी नहीं की। वहीं दूसरी तरफ 17-18 डिब्बों वाली इस ट्रेन के साधारण डिब्बे का नजारा ही दूसरा था। ओवरफ्लो हो चुके डिब्बों में घुसने का प्रयास कर रहे यात्रियों पर पुलिस डंडे बरसा रही थी और ज्यादा पैसा लेकर टीटी जनरल से स्लीपर का वेटिंग का टिकट बना रहे थे। आप विश्वास मानिये कि यह काम कोई एक-दो टीटी नहीं, बल्कि इस काम में करीब 80-90 टीटी लगे हुए थे। स्लीपर और जनरल में फर्क करना मुश्किल था।
इतिहास की पुस्तकों के उन पन्नों को पलटिए या फिर उन फिल्मों को देखिए, जिसमें हिटलर कैसे अपने विरोधियों को गैस चैंबर में झोकने से पहले, मालगाड़ी के डिब्बों में लोगों को भेड़-बकरियों की तरह ढूंस-ढूंस कर भरवाता था। पूरी मानवता को ही स्वाहा करने का दौर था वह, लोग लाचार थे और प्रतिरोधी भी। लेकिन हिटलरकाल से भी बदतर स्थिति में भारत की साधारण डिब्बे में सफर करने वाले ये अभिशप्त, पुलिस के डंडे खाते और टीटी की लूट का शिकार होते लोग किस आजाद देश के नागरिक हैं!
इस बजट को ममता के रेल बजट के रूप में देखने की भूल एकदम मत कीजिए, बल्कि इसके लिए अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी के भारत में गरीबी के आकड़े को देखिए। जिसके मुताबिक, हमारे देश में 78 फीसदी ऐसे लोग हैं, जिनकी एक दिन की कमाई मात्र 20 रूपये है, उनमें भी ये 28 फीसदी शहरी गरीब हैं और 72 फीसदी ग्रामीण। बाकी बचे 22 फीसदी में अंबानी हैं, आप-हम हैं और 21 रूपये में जीवन गुजर-बसर करने वाले घुरहू-कतवारू भी हैं। क्या देश की 80 फीसदी आबादी को सफर करने की कीमत अपने आदमी होने के हक को कुर्बान करके ही तय की जा सकती है। अगर साधारण डिब्बे की संकल्पना, सीट रिजर्व न हो पाने की तत्काल व्यवस्था के रूप में होती तो बात कुछ हद तक समझ में भी आती, हमारे महान देश में तो तत्काल यात्रा को भी दो दिन पहले ही रिजर्व कर लिया जाता है।
और अंत में जवाहर खानदान की बहू मेनका गांधी के उस महामानववाद को याद कीजिए। उनके मुताबिक, हम कितने सभ्य हैं, इस बात से पता चलता है कि हमारा समाज जानवरों के साथ कैसा बर्ताव करता है। मुझे नहीं लगता कि कोई भी आदमी उनकी इस बात का विरोध करेगा, लेकिन जब वह कहती हैं कि एक ट्रक में तीन से ज्यादा पशु नहीं जाने चाहिए, हम भी कहते हैं कि जानवरों के साथ अमानवीय बर्ताव नहीं होना चाहिए, लेकिन ऐसी सोच पशुओं के मामले में ही क्यो? साधारण डिब्बे में आलू-बैगन की तरह ठंसे आदमियों को निरपेक्षभाव से देखने की हमें आदत क्यों पड़ गयी है?
अभिनेता निर्मल पांडे नहीं रहे
कठफोड़वा, गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010बेमतलब कि शोहरत क्या होती है?
कठफोड़वा,जिसने इस बार के तहलका का हिंदी संस्करण पढ़ लिया होगा उसे जरूर पता चल गया होगा लेकिन जिन लोगों ने नहीं पढ़ा उनके लिए तो थोडा बात का सन्दर्भ समझाना ही होगा
बेमतलब कि शोहरत क्या होती है?
अच्छा सन्दर्भ तो हो गया मैं मुद्दे पर आता हूँ आखिर बेमतलब कि शोहरत होती क्या है? वर्ष १९४६ में कुरुर्तुल-एन-हैदर की "आग का दरिया" को PEN USA Translation Fund Award दिया गया था उसके एक लम्बे अन्तराल के बाद कहीं २००५ में यह अवार्ड फिर किसी हिंदी लेखक को दिया गया और यह उदय प्रकाश कि "पीली छतरी वाली लड़की" थी यह बेवजह हो सकता है जरूरी नहीं कि कोई अवार्ड किसी पुस्तक को पर्याप्त वजहों के बाद ही दिया जाए और वैसे भी अवार्ड किसी पुस्तक के उत्कृष्ट होने का प्रमाण नहीं होते है नहीं तो हर दिन जो अवार्ड के लिए मारामारी होती है वह ना होती आमिर का शिगुफ़ा
कठफोड़वा, बुधवार, 17 फ़रवरी 2010राहुल बाबा आप एक बार फ़िर आईये और देखिये आपके दौरे के बाद भी विदर्भ का क्या हाल है!पानी अभी से खत्म हो रहा है और बिजली उसका भी भगवान ही मालिक है!
कठफोड़वा,सप्ताह भर विदर्भ घूम कर कल वापस छत्तीसगढ लौटा हूं।विदर्भ मे अलग राज्य की मांग फ़िर से ज़ोर मार रही है लेकिन अभी कंही तोड़-फ़ोड़ नही हुई,रेल नही रूकी और कंही आगजनी नही हुई इसलिये शायद खबर नही बन पा रही है।वैसे भी इस देश मे खबर तो बनती है धमाकों से,ठाकरे बन्धुओं से,सोनिया जी से,खान से,हिंदू-मुसलमान से और राहुल बाबा से ये राहुल बाबा भी विदर्भ मे किसानों की आत्मह्त्या से द्रवित होकर वंहा का दौरा कर चुके हैं,द्रवित हो चुके हैं।उसके बाद उन्हे शायद याद ही नही रहा है कि इस देश मे विदर्भ नाम की कोई जगह है।मैं ये सब राहुल बाबा से इसलिये कह रहा हूं कि महाराष्ट्र की सरकार तो कठपुतली है और उसके मंत्री तो राहुल बाबा की चप्पलें तक़ उठाते हैं,तो चप्पले उठाने वालों से कहने की बजाय मैने सीधे राहुल बाबा से ही कहना उचित समझा।और रहा सवाल मराठियों के ठेकेदारों का तो उनके लिये मराठी माने मुम्बईकर बस्।विदर्भ के नाम से तो वैसे ही चिढ है,वे अलग होने की बात कर रहे है इसलिये उनके बारे मे सोचना ही उनके लिये पाप है।फ़िर वेसे भी उनके पास फ़िल्म का प्रदर्शन रोकना,खिलाड़ियों को रोकना,एक दूसरे को टोकना और आमना-सामना खेलेने से फ़ुरसत नही है।
ऐसे मे सिर्फ़ राहुल बाबा ही एक नेता हैं जो गरीबी की ब्राण्डिंग मे अपनी दादी इंदिरा जी के रास्ते पर चलते नज़र आ रहे हैं।गरीबी सुनते ही उनके आंसू निकले या ना निकले उनके मुख से डायलाग बरसने लगते हैं।और आनन-फ़ानन मे भी वे उधर दौरे पर भी निकल पड़ते हैं,जैसे पिछ्ली बार घूम आये थे।अरे उसके बाद वंहा का क्या हाल है पूछा भी है कभी?या सिर्फ़ पब्लिसिटी स्टंट करने को ही राजनिती मानते हैं।
मीडिया भी राहुल बाबा से कम नही है।वंहा के लोकल अख़बार चीख-चीख कर कह रहें है कि विदर्भ पर भीषण जलसंकट है।अभी से 6000 गावों में जलसंकट छा गया है।नागपुर संभाग के तीन हज़ार और अमरावती संभाग क तीन हज़ार गांव मे अभी से पानी की मारा-मारी शुरू हो गई है।इसके अलावा अकोला का हाल तो और भी खराब है।जिन गांवों मे पानी मे पानी की आपूर्ती नलों से होती थी वंहा अभी से सप्ताह में दो-दिन,या तीन दिन ही पानी दिया जा रहा है।जिन गांवों मे मैं पहले भी जा चुका हूं और जंहा पानी भरपूर रहा है,वंहा भी पानी खरीदने की नौबत आ गई है।
सिंचाई तो बहुत दूर की बात है अब तो पीने और नहाने के लाले पड़ते नज़र आ रहें हैं।अण्डर ग्राऊण्ड वाटर का लेवेल अभी से एक से तीन मीटर नीचे जा चुका है।अभी फ़रवरी चल रहा है और ये हाल है तो मई-जून की कल्पना करके ही हालत खराब हो रही है।
पानी के अलावा बिजली भी विदर्भ के लोगों के लिये दुर्लभ चीज़ होती जा रही है।सालों से कटौती झेल रहे लोगों ने इस साल थोड़ा राहत पाई थी मगर नागपुर मे हुई एक उच्चस्तरीय सरकारी बैठक में ये बात साफ़ हो गई कि बिजली का संकट भी भीषण ही होगा।चंद्रपुर की दो उत्पादन इकाईयों का बंद होना लगभग तय ही है।वंहा के बांध मे पानी आधा भी नही रह गया है।यही हाल दूसरी जल-विद्युत परियोजनाओं का है।कोयना के भरोसे पूरा प्रदेश चल नही सकता।और सरकार इस संकट से मुंह छिपाने के लिये अभी से बरसात को ज़िम्मेदार ठहरा रही है।उसका कहना है कि बरसात मे कम पानी गिरने का रोना रो रही है।
अब बताईये! पानी नही,बिजली नही!ऐसे में जीना कितना मुश्किल हो जायेगा।भीषण गर्मी और भीषण जलसंकट,भीषणसंकट बिजली संकट आम आदमी जीयेगा तो कैसे जियेगा?
राहुल बाबा आप एक बार फ़िर आईये और देखिये आपके दौरे के बाद भी विदर्भ का क्या हाल है!पानी अभी से खत्म हो रहा है और बिजली उसका भी भगवान ही मालिक है!
http://anilpusadkar.blogspot.com/2010/02/blog-post_17.html
वैसे आजकल मैं भी तो अपना एक ब्लॉग चलाता हूँ
गुड्डा गुडिया, शनिवार, 13 फ़रवरी 2010मैं एक ब्लॉग चलाता हूँ ,
राहुलमय मीडिया
भागीरथ, सोमवार, 8 फ़रवरी 2010राहुल गांधी के दौरे हमेशा सुर्खियों में रहे हैं। उनके हर दौरे में मीडिया की एक बहुत बड़ी जमात उनके आगे पीछे ऐसे डोलती है जैसे राहुल बाबा उनके तारणहार हों। राहुल बाबा ने क्या खाया, क्या पिया, किससे मिले, कहां गए, किस दलित के घर रात बिताई, किसके साथ खाना खाया, किस विश्वविद्यालय में छात्रों से मुखातिब हुए, सब पर मीडिया की पैनी नज़र रही।
मुम्बई में तो मीडिया ने राहुल बाबा के गुणगान की सारी हदें तोड़ दीं। चैनलों ने राहुल बाबा की पल-पल की खबर दी, हर पल की खबर दी और खबर हर कीमत पर दी। राहुल ने एटीएम से पैसे निकाले, लोकल ट्रेन में सफर किया। लोगों से बात की। उनकी परेशानियों के बारे में पूछा। लगभग सभी छोटे-बडे़ चैनलों पर राहुल बाबा के भजन चल रहे थे। इन भजनों को देखकर लगा जैसे राहुल बाबा कोई ऐतिहासिक पुरूष हों बहुत बड़े मिशन पर निकले हों। भारत के एकमात्र ऐसे व्यक्ति हों जिन्हें भारत की सचमुच बहुत चिन्ता हो। उस व्यवस्था में बदलाव लाना चाहते हों जो उनके पूर्वजों की देन है। उनके पीछे मीडिया की इतनी बड़ी जमात देखकर एक पल ऐसा भी लगता है जैसे कांग्रेस ने इन सभी चैनलों के साथ डील कर रखी हो। यह अलग बात है कि हमेशा यह बताने की कोशिश की जाती है कि राहुल ने मीडिया से दूरी बनाकर रखी या मीडिया से बचते रहे। लेकिन वे कभी मीडिया से नहीं बच पाते। देश के अति पिछले इलाकों में दौरों के दौरान भी नहीं बचे जहां मीडिया के दर्शन दुर्लभ होते हैं। राहुल बाबा गए तो मीडिया को भी मजबूरन पीछे-पीछे जाना पड़ा।
राहुल गांधी पिछले साल जब छत्तीसगढ़ दौरे पर थे, एक छात्र ने उनसे एक बहुत वाजिब सवाल पूछा कि भारत की आजादी के इतने बरस बाद भी कृषि मानसून पर क्यों निर्भर है, जबकि देश में आजादी के बाद से कुछेक सालों के आलावा कांग्रेस का ही राज रहा है। राहुल गांधी ने बहुत मासूमियत से इस सवाल को टाल दिया था। राहुल गांधी अक्सर ऐसे चुभने वाले सवालों को ऐसी ही मासूमियत से टाल देते हैं।
राहुल गांधी को सचमुच देश की फिक्र है। गरीब-गुरबों की चिंता है। छत्तीसगढ़ दौरे से पहले साल 2008 में सूखे की मार झेल रहे बुन्देलखण्ड दौरे पर भी गए थे। लोगों से मिले, उनसे बात की। यह साबित करने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी कि वे ही उनके सच्चे हितैषी हैं, मायावती सिर्फ उनका वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। उन्होंने बुन्देलखण्ड की प्यासी जमीन पर खूब पसीनें की बून्दे गिराईं।
दूसरे दिन शायद बुन्देलखण्ड दौरे की थकान मिटाने के लिए आईपीएल के मजे लूटते नज़र आए। सहसा लगा कि क्या ये वही राहुल गांधी है जो कल तक बुन्देलखण्ड के किसानों और दलितों के घर में उनके हालात पर दुखी और चिन्ता जाहिर कर रहे थे। उनके सच्चे और एकमात्र शुभचिन्तक होने का दावा कर रहे थे। किसानों के मुरझाए झुर्रीदार चेहरों और दो वक्त की रोटी के लिए भगवान से दुआ मांगने वाले लोगों की तस्वीरें इतनी जल्दी उनकी दृष्टि से ओझल हो जाएंगी? क्योंकि अगर आप विदर्भ बनते जा रहे बुन्देलखण्ड के किसानों के घर में घुसकर देखें तो आपको एक अजब से बैचनी होगी। उनसे बात करते वक़्त हो सकता है कि यह व्यवस्था से कोफ्त होने लगे। अगर आपको सचमुच उनकी चिन्ता है तो उनकी हालत देखकर आपकी रातों की नीन्द उड़नी तय है। अगर ऐसा नहीं है तो आप उनके हमदर्द होने का जो दावा करते हैं, वह झूठा है, खोखला है। आपकी बातें सिर्फ कागजी हैं।
पर इससे मीडिया को क्या? जो बिकता है वो दिखता है। अब तो जो बिकता नहीं उसे भी बेचने की तमाम कोशिशें मीडिया कर रहा है। पेड न्यूज का जमाना है। कहीं ऐसा तो नहीं पेड न्यूज के जरिए देशभर में राहुल बाबा की ऐसी छवि और माहौल बनाया जा रहो हो ताकि आने वाले सालों में वे बिना कोई परेशानी आसानी से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर चढ़ बैठें?
रियलिटी शो के बहाने
भागीरथ,
एक बूढ़ा अभिनेता जिसके दिन शायद लद चुके थे अचानक से बुद्धू बक्शे पर लोगों को करोड़पति बनाने का नुस्खा लेकर अवतरित हुआ। भले ही करोड़पति बनाने का यह फार्मूला विदेशों से चुराया गया हो लेकिन भारत में टीवी के इतिहास में यह एक नए युग की शुरूआत थी। असल में दर्शक छोटे पर्दे पर लहराती और झिलमिलाती तस्वीरें देखकर ऊब गए थे, लेकिन भला हो केबल क्रान्ति का जिसने लोगों को घर-घर की कहानी दिखाई। लेकिन कितने दिन! धीरे-धीरे लोग इस घिसे-पिटे फार्मूले से भी भर आए थे। जिस चैनल पर जाओ वहीं अच्छे खासे परिवार को तोड़ने का किस्सा सुनाया जा रहा था। पुजी जाने वाली नारी ने धीरे-धीरे खलनायिका का और फिर पूंजी का रूप ले लिया था। 'कौन बनेगा करोड़पति' की अपार सफलता के बाद तो जैसे बाढ़ ही आ गई। हालाँकि 'विवा' भारतीय इतिहास का पहला रिअलिटी कार्यक्रम था।
साठ के दशक में कैलिफोर्निया में 'नाइटवाच' के नाम से एक सीरीज आती थी जो एक तरह का अनूठा प्रयोग था। इसमें कैलिफोर्निया पुलिस की गतिविधियों एवं उसकी बातचीत को रेडियो पर प्रसारित किया जाता था। 1973 में 'एन अमेरिकन फैमिली' जो 12 भागों में विभाजित एक टीवी सीरीज था, ने पहली बार दर्शकों को वास्तविक घटनाओं को हूबहू देखने का मौका दिया। इस धारावाहिक में एक दंपत्ति और परिवार के अन्य सदस्यों के सात महीनों के रहन-सहन को कैमरे में कैद किया गया जिसमे दंपत्ति तलाक लेता है। और शायद टेलीविज़न पर पहली बार कोई 'गे' दिखाया गया था। टेलीविज़न इतिहास में पहली बार यह एक वास्तविक घटनाओं पर आधारित वृत्तचित्र शैली में सच्चे पात्रों के साथ फिल्माया गया सीरियल था और इसने रियलिटी शो की एक नई विधा को जन्म दिया। धीरे-धीरे इस विधा पर कई प्रयोग हुए। तरह-तरह के टीवी सीरियल बनाए गए। 1977 में स्वीडिश टीवी द्वारा दिखाए गए 'एक्सपेडिशन रोबिन्सन' की अपार सफलता के बाद रियलिटी टीवी को सनसनीखेज और दर्शकों को बांधे रखने का अचूक तरीका हाथ लग गया। इसे कई और अन्य देशों ने अलग-अलग नामों से (जैसे सरवाईवर) प्रदर्शित किया। इसमें एक प्रतिभागी दूसरे प्रतिभागी को अपने चकमे-चालाकियों और खेल के नियमों के तहत पछाड़ने की कोशिश करता था और कमजोर प्रतिभागी धीरे-धीरे एक-एक कर प्रतियोगिता से बाहर होते जाते और आखिरी बचने वाला विजेता घोषित कर दिया जाता। यह 'एलिमिनेशन तकनीक' थी, जिसमें दर्शकों को बड़ा मजा आता था। तकनीकी आधुनिकीकरण ने इस खेल को और मंनोरंजक बना दिया। मोबाइल सन्देशों के माध्यम से दर्शकों को सीधे-सीधे कार्यक्रम से जोड़ दिया जाने लगा। कोई भी दर्शक अपने मनचाहे प्रतियोगी को अपना वोट एसएमएस के माध्यम से भेज सकता था। कार्यक्रम की टीआरपी बढ़ती और हर सन्देश के बाद दर्शकों के मोबाइल का पैसा घटता जाता। कमाई जोरों पर थी। कार्यक्रम भी तो पैसा कमाने के लिए ही बनाया गया था।
एक दूसरा शो जो लगातार पांच सालों तक लोकप्रियता के शीर्ष पर रहा, उसने भी रियलिटी शो के एक नई विधा को जन्म दिया। हालांकि 'एलिमिनेशन तकनीक' ने यहां भी अपना रंग दिखाया। यह शो 'अमेरिकन आयडल' था जिसने पहली बार एक आम आदमी को उसकी प्रतिभा के आधार पर मंच उपलब्ध कराया। भारत भी कहां पिछड़ने वाला था। भारत में 'इंडियन आइडोल' नामक शो बनाया गया जिसकी सफलता से प्रेरित होकर धडाधड रियलिटी शो बनने लगे। जिस चैनल पर देखो उसी चैनल पर कोई-ना-कोई रियलिटी शो चलने लगा। यहां तक की कई रियलिटी शो वाले चैनल भी खुल गए। जिस पर दिन-रात सब कुछ रीयल दिखाने का दावा किया जा रहा है लेकिन असली असलियत क्या है?
अभी हाल ही में एक चैनल ने राखी का स्वयंवर रचाया। बहुत धूम-धाम से तैयारियां की गईं। देश-विदेश से दूल्हों ने ऑडिशन दिया और आखिरकार एक दूल्हा फाइनल भी हो गया। राखी ने उस दूल्हे के साथ अच्छा-खासा वक़्त गुजारा। दूल्हा एनआरआई था और करोड़पति भी। इससे बढ़िया दूल्हा कहां मिलता। सब कुछ प्रोग्राम के मुताबिक चलता रहा। लेकिन स्वयंवर में स्वयंवर तो हुआ ही नहीं। राखी का आरोप था कि मेरे साथ धोखा हुआ है। लड़का तो कंगला है और मैं कंगले से शादी नहीं कर सकती। तो फिर ये नाटक क्या था? असल में यह एक धारावाहिक था रिअलिटी के नाम पर। राखी जो एक मंझी हुई अभिनेत्री है और कार्यक्रम में कुछ नए चेहरों को अभिनय का मौका दिया गया और स्वयंवर दिखाया गया। किसकी शादी और कौन दूल्हा? ये पहली बार नहीं हुआ है। कई ऐसे उदाहरण हम पहले भी देख चुके हैं लेकिन मामला आरोपों का नहीं है।
अभी हाल ही में तुर्की के अंकारा में पुलिसवालों ने नौ महिलाओं को जिसमें कुछ बालिग तक नहीं थी, उनको रियलिटी शो के माफियाओं के चुंगल से छुड़ाया। ये लड़कियां छोटी-मोटी मॉडल थीं और जल्दी प्रसिद्धि पाना चाहती थीं। इन्होंने एक रियलिटी शो के ऑडिशन में हिस्सा लिया और चयन भी हो गया। कुछ शर्तों पर साइन कराया गया जैसे इन्हें दो महीने तक बाहरी दुनिया से संपर्क नहीं रखना है। अगर बीच में शो छोड़कर जाना चाहें तो 33 हजार डॉलर हर्जाना भरना होगा। साथ ही उन्हें यह भी कहा गया था कि उन्हें एक-दूसरे से झगड़ा करना है। छोटे-छोटे कपड़े पहनने हैं। बाद में पता चला कि यह सारा ड्रामा था। उनके अधनंगे जिस्म को इंटरनेट पर बेचा जा रहा था। तो यह क्या एक किस्म का धंधा है? हां, यहां भी तो यही किया जा रहा है। 'बिग बॉस' जैसे सीरियल यही नंगापन और भौड़ापन तो खुलेआम टीवी पर बेच रहे हैं। चाहे क्लॉडिया का बिकनी-नाच हो या राजू श्रीवास्तव का छिछोरापन, राहुल का प्रेम-प्रसंग हो या कमाल खान का माँ-बहन की गाली। सब अपना धंधा कर रहे है। स्टेज पर बैठे दो महागुरू आपस में लड़ जाते हैं, गाली-गलौज पर उतारू हो जाते हैं। वे कहते हैं कि प्रतिभा तलाश रहे हैं। लेकिन कितनी प्रतिभा सालों की कड़ी मेहनत के बाद ये गुरूवर दे पाए, ये तो वही बताएंगे।
लेकिन बात अगर प्रतिभा तलाशने तक या मनोरंजन करने तक ही सीमित रहती तो ठीक था लेकिन बात आगे बढ़ चुकी है। बहुचर्चित 'चीटर्स' की तर्ज पर एक नया कार्यक्रम चालू हुआ है 'इमोशनल अत्याचार'। इस कार्यक्रम में दो पात्र होते हैं एक लड़का और एक लड़की जो आपस में बहुत प्यार करते हैं। अगर उन्हें अपने साथी मित्र के प्यार या ईमानदारी पर किसी प्रकार को कोई शक होता है या साथी मित्र का चरित्र-परीक्षण करना होता है तो वह 'लीड' के रूप में कार्यक्रम वालों के पास जाएगा और 'सस्पेक्ट' का 'लायलटी टेस्ट' कराएगा। लायलटी टेस्ट के नाम पर लड़का या लड़की जो भी सस्पेक्ट होगा, उसका गुप्त कैमरों (अभी पता चला है की असल में गुप्त कुछ नहीं है, सबको सब कुछ पता होता है) के सामने तरह-तरह से परीक्षण किया जाएगा। और यह जानने की कोशिश की जाएगी कि वह किस हद पर जाकर अपने साथी को धोखा दे सकता है। कार्यक्रम के दौरान 'क्रू मेंबर' ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं कि एक साथी दूसरे साथी को धोखा दे देता है। हालांकि प्यार, ईमानदारी और धोखा की परिभाषा काफी दुरूह है। कुछ-कुछ ऐसा ही 'सच का सामना' शो में किया जा रहा था। वहां वही सबसे अधिक कमाएगा जिसका जितना अधिक विवादास्पद या घटिया राज खोला जाएगा। हाँ! इसी के साथ याद आया 'राज पिछले जनम का', जिसके माध्यम से 'तृप्ति जी' लोगों को उनके पिछले जनम का राज बताती हैं। इस कार्यक्रम ने वह कर दिखाया है जो पिछले कितने सालों से 'आस्था' या 'संस्कार' नहीं कर पाया। लोगों को अब धीरे-धीरे पिछले जन्म में विश्वास होने लगा है।
अभी हाल ही में नीदरलैण्ड के बीएनएन चैनल पर प्रसारित एक रियलिटी शो काफी विवादास्पद रहा। इस कार्यक्रम में प्रस्तुतकर्ता पब में जाता है और वहां हेरोइन पीता है, एलएसडी खाता है। लड़कियों को पटाने की कोशिश करता है। उन्हें सेक्स के लिए तैयार करता है और यह भी जांचने की कोशिश करता है कि क्या ओरल सेक्स किसी भी मर्द या औरत से किये जाने वाले सेक्स से ज्यादा बेहतर है। कार्यक्रम का सह-प्रस्तुतकर्ता इनके अनुभवों को इंटरव्यू के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाता है।
तो क्या माना जाए कि भारत में भविष्य का रियलिटी कुछ इसी तरह का होगा। और अगर ऐसा होगा तो हमें यह भी सोचना होगा कि क्या इस जैसे कार्यक्रमों की हमें जरूरत है। यह मान भी लें कि 'इण्डियन ऑयडल', 'कौन बनेगा करोड़पति', 'सारेगामा', 'नच बलिए', 'झलक दिखला जा', 'ग्रेट इण्डियन लाफटर चैलेंज' जैसे कार्यक्रमों से कुछ लोगों को फायदा हुआ हो, दो-चार कलाकार जैसे सुनिधि चौहान, श्रेया घोषाल या एहसान कुरैशी जैसे कुछ कलाकार ने अगर अपना स्थान बना भी लिया तो हजारों ऐसे बदकिस्मत भी होंगे जो प्रतिभा के बावजूद किसी सिरफिरे जज का शिकार हो गए होंगे।
बाजार में बड़ी प्रतियोगिता है। हर तरफ टीआरपी की होड़ है। टीआरपी बढ़ाने के लिए कार्यक्रमों में प्रतिभागियों को गाली-गलौच के लिए उकसाया जाता है। मारपीट, चोरियां, बेशर्मी, अंगप्रदर्शन, घटिया एवं छिछोरी हरकतें आम बात हो गईं हैं। और ये सब एक अच्छे रियलिटी शो की विशेषता बनती जा रही है। सारे रियलिटी शो की एडिटिंग भी होती हैं चाहे वह 'बिग बॉस', 'रोडीज', 'स्पलिटविला', 'इस जंगल से मुझे बचाओ' या 'सरकार की दुनिया' हो लेकिन ध्यान रखा जाता है कि कोई भी गाली या फूहड़पन एडिट न हो जाए। सेंसर है तो थोड़ा बीप कर देंगे लेकिन ऐसा की देखने वाला समझ जाए। 'सच का सामना' जैसे कार्यक्रम में तो ऐसे सवाल जानकर पूछे जाते हैं। अवैध सम्बंध इस कार्यक्रम के लिए मजे की चीज हो गई है कि जो भी गेस्ट आएगा, उससे जरूर पूछेंगे। अरे अगर अवैध सम्बंध या अवैध सन्तान है तो अपने बीवी-बच्चों को बताओ, दर्शकों के सामने नोट कमाने के लिए तमाशा करने की क्या जरूरत है।
बुधिया , दर्शील और बुग्गी-वूग्गी
मुझे ठीक से याद नहीं आता की, बुधिया कब, कितने किलोमीटर लगातार दौड़ कर विश्व रिकोर्ड बनता है? कब मानवाधिकार वाले ५ वर्ष के बुधिया के ट्रेनर के ऊपर अवयस्क को दौड़ाने के जुर्म में मुकदमा कर देतें हैं? मुझे ये भी ठीक से नहीं याद आता की, कब "सूरज" जैसे २-३ वर्ष के और कितने बच्चे , कहाँ-कहाँ राजनैयतिक उथल-पुथल के शिकार हो कर ठीक उसे बोरवेल में जाँ गिरतें है की पूरा मीडिया जगत और सब काम छोड़कर आर्मी के जनरल सैनिकों सहित उसे निकलने जाँ पहुंचते हैं! ऐसे पहले हादसे के बाद मैंने बीसों ऐसे ही हादसे पेपर में बीच के पेजों में पढें होंगें ! पर ये हादसे पूरी तरह से राजनैतिक न होकर , आर्थिक कारणों पर निर्भर थे ! (आपको याद दिलाने के लिए मैं बता दूँ की, सूरज रातों-रात मालामाल हो गया था! ) मुझे ये भी याद नहीं आता की किस १५ अगस्त को लाल किले पर स्कूल के छोटे-छोटे बच्चे गर्मी से बेहोश हो कर गिर पड़े थे ! कम-से-कम भारत के प्रधानमंत्री को तो इस पर शर्मिंदा होना चाहिए था , पर ये परम्परा बदस्तूर जारी है !
तो दर्शील- एक फ़िल्मी बच्चा है ! जैसे बहुत से लोग मानतें है की जिन्दगी - इक जुआं है... खेल है...सफ़र,रास्ता है...सिधांत है... इतिहास है... वैसे ये फ़िल्मी भी है ! दर्शील , शाहरुख खान की तरह से परदे पर हमेशा खुश रहता है ! दर्शील की तरह बहुत सारे फ़िल्मी बच्चे और भी हैं जिनको सब लोग नहीं जानते !
गोरेगांव स्टेशन पर फिल्म शूट में ८ से १२ साल के १८-२० बच्चे थे ! जो शूट पर बुलाये गए थे ! वो सब शाहिद कपूर से मिलना चाहते थे ! पर इक चाभी वाले खिलौने की तरह हर इक "टेक" पर उन्हे ट्रेन में चढ़ाया जाता फिर उतारा जाता ! सुबहो ७ से लेकर शाम ७ बजे तक बच्चे सिर्फ ट्रेन में चढ़ते - उतरते रहे ! दोपहर लंच में मैं उनकी बोगी में गया ! सारे बच्चे थक कर काठ की बेंचों पर इधर -उधर सो रहे थे ! ये कहा जाँ सकता है की , किसी स्त्त्रग्लर की तरह वो कोई हीरो या दर्शील नहीं बनना चाहते थे , बल्कि भाड़े पर बुलाये गए थे ! ऐसे ही जैसे हम आर्ट डिपार्टमेंट के लोगों ने प्लेटफॉर्म पर लगाने के लिए कुछ दुकाने कुछ हाथ गाड़ियाँ मगवायें थीं ! भाड़े के लोग , भाड़े की दुकाने , भाड़े की जिन्दगी ! अब क्यूँ नहीं कोई मनावाधिकर्वाले इन सब बातों को देखते ? क्यूँ नहीं उन लोगों के खिलाफ याचिकाएं दायर की जाती हैं , जिनके बच्चे बूगी - वूगी में लगातार डांस करकर के लोगों की वाहवाही और पैसे बना रहें हैं ? क्यूँ नहीं उन विज्ञापनों पर प्रतिबन्ध लगाया जाता है , जिन में की बच्चा इक चमच चोकोलेट पीकर दिन भर दौड़ लगाता है ! और उनके माँ - बाप वही चोकोलेट ला कर पडोसी से कहते है की अब हमारा बच्चा भी "सुपर - स्ट्रोंग " बनेगा ! फिलहाल , समय की गति अजीब है और आजकल के बच्चों का वातावरण बदल रहा है तो जाहिर है की उनकी सोच के मायेने और उनके "एम्बलेम" भी बदल रहें हैं ; पर किस हद तक ये बात ध्यान देने लायक है !







