Visit blogadda.com to discover Indian blogs कठफोड़वा: April 2010

मैं खामोश रहा

जब नाजी कम्युनिस्टों के पीछे आए
मैं खामोश रहा
क्योंकि, मैं नाजी नहीं था
जब उन्होंने सोशल डेमोक्रेट्स को जेल में बंद किया
मैं खामोश रहा
क्योंकि, मैं सोशल डेमोक्रेट नहीं था
जब वे यूनियन के मजदूरों के पीछे आए
मैं बिल्कुल नहीं बोला
क्योंकि,मैं मजदूर यूनियन का सदस्य नहीं था
जब वे यहूदियों के पीछे आए
मै खामोश रहा
क्योंकि, मैं यहूदी नहीं था
लेकिन, जब वे मेरे पीछे आए
तब बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था
क्योंकि, मैं अकेला था

-पीटर मार्टिन जर्मन कवि

कर रहे थे मौज-मस्ती ............

                           -- -डॉ० डंडा लखनवी

कर  रहे  थे    मौज-मस्ती   जो  वतन को  लूट के।
रख  दिया  कुछ   नौजवानों ने उन्हें कल कूट के।।

सिर छिपाने की जगह सच्चाई  को मिलती नहीं,
सैकडों    शार्गिद    पीछे   चल   रहे  हैं  झूट   के।।

तोंद  का   आकार   उनका  और  भी बढता  गया,
एक   दल   से  दूसरे    में  जब गए  वे  टूट   के।।

मंत्रिमंडल  से उन्हें जब किक  लगी,  ऐसा लगा-
आशमा  से   भू   पे आये  बिन  वे  पैरासूट  के।।

ऊंट   समझे  थे बुलन्दी  में   न  उनसा   कोई भी,
पर्वतों  के   सामने  जा    होश   गुम  हैं  ऊंट के ॥

शाम    से     चैनल  उसे    हीरो   बनाने  पे  तुले,
कल सुबह आया जमानत पे जो वापस छूट के।।

फूट    के    कारण   गुलामी   देश  ये   ढ़ोता  रहा-
तुम भी लेलो कुछ मजा अब कालेजों से फूट के।।

अपनी  बीवी  से  झगड़ते  अब नहीं  वो भूल कर-
फाइटिंग में  गिर गए कुछ दाँत जबसे  टूट  के।।

फोन  पे  निपटाई  शादी  फोन ही    पे  हनीमून,
इस क़दर  रहते  बिज़ी  नेटवर्क  दोनों  रूट  के॥

यूँ   हुआ   बरबाद  पानी   एक  दिन  वो  आएगा-
पाँच  सौ  भी  कम  पड़ेंगे  साथियों   दो  घूंट के।।

फूट   के   कारण    गुलामी    देश ये   ढ़ोता  रहा-
तुम भी लेलो कुछ मजा अब कालेजों से फूट के।।

अब कहिये 'जय हो'!

प्रिय मित्रों,
यह अधूरा लेख जो एक लम्बे समय से लंबित पड़ा हुआ है जो हमारे महत्वपूर्ण योगदानकर्ता द्वारा लिखी जानी थी लेकिन पूरी नहीं हो पाई है. इस लेख को बिना किसी एडिटिंग या छेड़-छाड़ के आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ इससे पहले की लेख से जुड़ा मुद्दा ठंडा न पड़ जाए.
कठफोड़वा

अब कहिये 'जय हो'!
दीपक कुमार सिंह
महिला आरक्षण बिल राज्य सभा में भारी हंगामे के बावजूद पास हो गया। हंगामा हुआ, शोर मचा, सस्पेंशन हुआ लेकिन आखिर बिल पास हुआ। आह! क्या दृश्य था। सुषमा स्वराज-वृंदा करात गले मिल रही हैं। वामपंथ और दक्षिणपंथ एक है, जैसा लग रहा है। कोई राजनितिक व विचारात्मक अड़ंगेबाजी नहीं। आंखे छलछला आई हैं। 'sisterhood' फ़ैल रहा है। महिला आरक्षण के इस पूरे प्रकरण में मेरे एक मित्र बहुत परेशां रहे। मुझे 'सामाजिक अवसाद' शिकार बताया। उपरोक्त मित्र 'कोटा में कोटा' के हिमायती हैं। लेकिन मैं इस पूरे प्रकरण को एक किस्म की बेमानी ही मानता हूँ। बहरहाल, बिल अपने मौजूदा स्वरुप में ही पास हो गया, देश की अस्सी फीसद महिलाओं के साथ दगाबाज़ी करके। मेरे ये मित्र और अधिक परेशां हो गए होंगे। पिछले पंद्रह वर्षों से लंबित पड़ा ये मामला अब लगता है सुलझ जाएगा, महिलाओं का मुकद्दर संवर जाएगा?

मैंने अपने पहले लेख में एक बात स्पष्ट की थी जिसे मैं फिर से कहना चाहूँगा क्या की इस आरक्षण विधेयक के पास हो जाने और इसके कानूनी जामा पहन लेने से महिलाओं की हालत में कोई वास्तविक व सकारात्मक बदलाव आएगा? या कहीं ऐसा तो नहीं इसकी आड़ में 'राजनितिक सवर्ण ' फिर से सक्रिय हो गया है। कुछ लोगों का मानना है की आरक्षण से महिला उत्थान की अपेक्षा करना बेमानी होगी क्यूंकि आरक्षण महिलाओं कि व्यापक हिस्सेदारी का मामला है.

ऋषिकेश सुलभ को इंदु शर्मा कथा सम्मान

जाने-माने हिंदी लेखक ऋषिकेश सुलभ को उनके कथा संग्रह 'वसंत के हत्यारे' के लिए वर्ष 2010 के अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान के लिए चुना गया है। वह लघु कथाओं और बिदेशिया शैली के नाटकों के लिए पहचाने जाते हैं।

सुलभ को यह पुरस्कार इस वर्ष आठ जुलाई को हाउस ऑफ कॉमंस में दिया जाएगा। सुलभ (55) आकाशवाणी में काम करते हैं। ब्रिटेन के महासचिव तेजेंद्र शर्मा ने बताया कि पुरस्कार के तहत उन्हें दिल्ली-लंदन-दिल्ली का हवाई यात्रा खर्च, हवाई अड्डा कर, ब्रिटेन के लिए वीजा शुल्क, एक शील्ड, एक शॉल और लंदन में एक सप्ताह तक रुकने की सुविधा दी जाएगी। लंदन में उन्हें मुख्य ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण कराया जाएगा।

बिहार के सीवान जिले के लाहेजी में जन्मे सुलभ के स्वतंत्रता सेनानी पिता उन्हें कॉलेज की शिक्षा के लिए पटना ले आए। सुलभ हिंदी से स्नातक करने के बाद इसी विषय से स्नातकोत्तर करना चाहते थे, लेकिन आर्थिक बाधा के कारण वह ऐसा नहीं कर सके। अपनी रचनात्मक शक्ति की बदौलत उन्हें आकाशवाणी में नौकरी मिल गई।

अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान कवयित्री और लघुकथा लेखिका इंदु शर्मा की स्मृति में दिया जाता है, जिनका 1995 में कैंसर से निधन हो गया था। इसके पहले यह पुरस्कार चित्रा मुदगल, संजीव, डॉ़ ज्ञान चतुर्वेदी, एसआर हेरनोट, विभूति नारायण रॉय, प्रमोद कुमार तिवारी, नासिरा शर्मा और भगवान दास मोरवाल को मिल चुका है। (साभार: हिंदुस्तान)

नर्मदा क्रिकेट ग्राउण्ड बनती जा रही है : मेधा पाटकर


नर्मदा बचाओ आंदोलन ने विगत, दो दशकों में विकास को नये सिरे से परिभाषित करने का एक मार्ग प्रशस्त किया है। उसने इस बात को प्रतिपादित किया कि विकास केवल विकास शब्द के साथ ही नहीं देखा जाना चाहिये बल्कि विकास को विनाश के साथ भी जोड़कर देखना होगा। वतर्मान विकास को लेकर कुछेक सवालों को लेकर नर्मदा आंदोलन की तेज-तर्रार नेत्री सुश्री मेधा पाटकर से प्रशान्त कुमार दुबे ने बातचीत की।

मेधाजी, वर्तमान विकास को आप किस तरह से देखती हैं?

दर असल विकास को परिभाषित किये जाने की जरूरत है आज बड़ी नदियों पर बड़े बांध बनाने को भी विकास कहा जाता है लेकिन सवाल यह है कि नदियों को मारना क्या विकास है? और इसे भी ऐसा देखा जाना चाहिये कि इस कथित विकास पर कितने जनों की बलि चढ़ी है। सरदार सरोवर और महेश्‍वर बांध परियोजनायें इसके उदाहरण हैं। देश में ऐसे कई और उदाहरण है। मेरा मानना है कि विकास को पहले परिभाषित करने की आवश्‍यकता है। लेकिन इसकी न तो मंशा किसी की दिखती है और न ही तैयारी।

छत्तीसगढ़ में आप पर यह आरोप लगा कि आप नक्सलवाद समर्थित हैं और राज्य में हिंसा को बढ़ावा दे रही हैं?

देखिये, हम किसी भी तरह के सशस्त्र संघर्ष के विरोध में हैं फिर चाहे वह किसी वाद से सम्बन्धित है या फिर राज्य सत्ता से। सलवा-जुडूम भी इसी तरह की प्रक्रिया है, जिसका विरोध करने हम लोग छत्तीसगढ़ में थे। हमारा मानना है कि सशस्त्र संघर्ष कभी भी बुनियादी परिवर्तन का प्रतीक नहीं हो सकता है और जब हम यह मानते हैं तो हमारे द्वारा स्वयं हिंसा करना या हिसां की बात सोचना भी हास्यास्पद है।

आप पर या आप जेसे सवाल खड़े करने वाले लोगों पर हमेशा ही एंटी डेवलपमेंटल या ऐंटी पीपुल्स होने के आरोप लगते रहते हैं। तो क्या आपकी पूरी लड़ाई एंटी डेवलपमेंट ही है?

देखिये, जो बुनियादी सवाल खड़े करते हैं वे विकास विरोधी हैं यह राज्य का एक ड्रामा है। राज्य अपने पक्ष में बात न करने वालों को कुछ भी करार दे सकता है। नक्सलवाद भी कहीं न कहीं राज्य की विफलता का परिणाम है। लेकिन हम लोकतंत्र में जी रहे हैं और हमें अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। हम विकास के इस नवीन ढांचे को हर जगह पर चीर-फाड करके देखेंगे और राज्य को बाध्य करते रहेंगे कि वह लोगों के पक्ष में अपनी कल्याणकारी भूमिका निर्वाहित करे।

क्या ऐसा नहीं लगता कि मेधा पाटकर लड़ाई हार रही हैं?

नहीं, कदापि नहीं। आज भी सरदार सरोवर परियोजना का काम रूका हुआ है। दरअसल लोग संघर्षों को सीमित दायरों में देखते हैं इसलिये ऐसा लगता है कि लड़ाई हारी जा रही है। बल्कि नित नई लड़ाई जीती जाती है और दूसरी लड़ाई खड़ी हो रही है। आप पास्को का उदाहरण ले सकते हैं, आप सिंगुर का उदाहरण ले सकते हैं। आप नर्मदा का ही उदाहरण ले सकते हैं। इस पूरे दौर में भ्रष्टाचार की कलई खुली है। राज्य का चरित्र सामने आया है हम लोग आंदोलन में एक परिणाम मूलक लड़ाई नहीं लड़ते है। इसलिये वे लोग जो संघर्ष को बाहर से देखते उन्हें यह नही समझ में आता है, जबकि हम रणनीतियां बदलते हुये लड़ाई लड़ते हैं।

सिंगूर की बात आपने की, तो बात जेहन में आती है कि अधिकांश संघर्ष की बुनियाद में आम सोच रही है लेकिन सिंगूर प्रकरण में आम सोच धराशाई हो गई इस पर आपका क्या मत है?

वामपंथ टूटा नहीं है केवल मोर्चा टूटा है। हर एक पार्टियों में कमजोर लोग है। पश्चिम बंगाल में भी यही हुआ। पार्टी के कुछेक लोगों ने अपनी कमजोरी उजागर की। गांधीवादी या विवेकानंद के समर्थक कोई भी हो आज सभी के समक्ष तो है। यह मैं मानती हूं। लेकिन यह भी कहना चाहती हूं कि पश्चिम बंगाल में जो हुआ वह विचार की हार नहीं बल्कि कुछेक लोगों की हार है और हमारी जीत है।

नर्मदा समग्र जैसे कुछ प्रयास चल रहे हैं उन पर आपका क्या मत है?

देखिये, एक ओर तो नर्मदा क्रिकेट ग्राउण्ड बनती जा रही हैं और दूसरी ओर कहीं-कहीं पर इस तरह की खोखली कवायदें की जा रही हैं एक ओर इसी राज्य में नर्मदा एक छोर पर जीती जागती जिंदगियों का म्यूजियम बना डाला और दूसरी ओर वहीं राज्य नर्मदा समग्र जैसे प्रयासों को सहायता देता है। नर्मदा नदी का अध्ययन हेलीकॉप्टर में बैठकर तो संभव ही नहीं है। नर्मदा पर किये गये जिस अध्ययन में नर्मदा नदी के प्रभावितों का प्रश्‍न ही नहीं आया है यह नर्मदा नदी के साथ अन्याय है। इस तरह के कई संकट इस समय हमारे समक्ष हैं। वे नर्मदा नदी में प्रवाहित की जाने वाली प्लॉस्टिक तो साफ करना चाहते हैं लेकिन नर्मदा को साफ करने वाली गतिविधियों पर बात नहीं करते हैं।

न्याय व्यवस्था में भी लोगों का विश्‍वास उठता जा रहा है, विगत कुछ समय से लोगों को उच्चतम न्यायालय से ऐसे फैसले मिले है।

यह सही है कि न्याय व्यवस्था ने हमें निराश किया है। हम हतोत्साहित भी हुये हैं लेकिन ज्यूडिशियरी स्टेट का ही एक भाग है इसलिए यह होना स्वाभाविक है। हम विचलित नहीं होते हैं बल्कि हम इसे एक प्रक्रिया मानते हैं। हम न्याय व्यवस्था के साथ भी जूझ रहे हैं और यह हर दौर में होता रहेगा।

लगातार यह बात आ रही है कि अब संगठन के पास कार्यकर्ता नहीं है तो इसे यह मानें कि आपकी या आप जैसे साथियों की पकड़ कमजोर हो रही है।

देखिये जीने मरने का संकट जिनका है उन्हें संघर्ष के लिये प्रेरित करने की जरुरत नहीं होती है । हां इस संघर्ष में कुछ लोग जरुर साथ आते हैं और छोड़ते जाते हैं। वे पूर्णकालिक हैं भी नहीं । घाटी के लोगों का संघर्ष और मजबूत हुआ है, लोग तकनीकी रुप से भी समृध्द हुये हैं। अब वे अपने अधिकारों को पूर्ण रुप से जानते हैं और अपनी लड़ाई खुद लड़ रहे हैं।

खबर किसकी कीमत पर?

आशुतोष के इस article पर मैंने जब नीचे लिखा कमेन्ट उनके ब्लॉग पर भेजा तो कुछ ही देर बाद कमेन्ट गायब हो गया. शायद आशुतोष को अपना विरोध नही भाया. कई बार managing एडिटर जैसी पद पर पहुँच कर ऐसे ही होता है बहरहाल इस article पर भेजे गए कमेन्ट को पोस्ट कर रहा हूँ.
 
"आशुतोष का ये रूप आज ही नही आज से पहले भी लोगों के सामने आता रहा हैं और शायद वातानुकूलित कमरों में बैठकर खबर बांचते-बांचते ये अपने चैनल के पिट्ठू बन गए हैं. इनकी गलती नही है चैनल भी तो चलाना है. अगर इंटेलीजेन्स या चिदंबरम को पता चल गया की ये नक्सली या माओवाद समर्थक है तो इन लोगों का क्या हश्र होगा? वो AC में बैठकर नही समझा जा सकता है. कल विनोद दुआ को देखा वो भी यही राग अलाप रहे थे लगा की सब के सब मुखौटा लगाकर जी रहे है इंडिया का जाएका के नाम पर खा रहे हैं पी रहे हैं लेकिन इन सबको आम आदमी का दुःख-दर्द क्यों नही दिखाई देता, उनका रोना क्यों सुनाई नही देता, अपना बच्चा तो विदेश में पढ़ाएंगे लेकिन गरीब के बच्चे के लिए योजना चलवायंगे जहाँ कभी मास्टरजी नही आयेंगे. १०-२० लाख के package पर शानदार कमरे में बैठकर एक सिरे से आम आदमी के संघर्ष को खारिज कर देना कितना आसान होता है. आशुतोष को अपने चश्मे से दूर-दराज़ जंगलों में संघर्षरत आदिवासी नही दिखाई देते, होशंगाबाद में तीन-तीन बार विस्थापना का दंश झेलते आदिवासी नही दिखाई देते जहाँ संघी अपना भगवा agenda ले कर जाते हैं, missionery उनको ईसाई बनाने का agenda ले कर जाते हैं, सरकार सलवा जुडूम ले कर जाती है और अगर यही आदिवासी व्यवस्था से त्रस्त होकर आपका विरोध करता है तो आप उसे नक्सली, माओवादी, देशद्रोही, आतंकवादी करार देते हो.

प्रेस क्लब मैं बैठकर दारू की चुस्कियां लेते हुए सब कुछ ठीक लगता है, कुछ भी ख़राब नही लगता. असल में जब नशा टूटेगा तब ना तो खबर बांचने के लिए कुछ होगा ना ही कोई सुनने वाला होगा सब कुछ पूंजीवाद की भेंट चढ़ चुका होगा."

माओवाद-मार्क्सवाद की अत्रप्त शवसाधना

प्रिय मित्रों, 
कल का दैनिक भास्कर पढ़ रहा था उसी बीच आशुतोष के इस article पर नज़र पड़ी. सोचा की जैसे लोकतंत्र में चुनाव की लहर चलती है उसी तरह आज कल माओवादियों के खिलाफ एक लहर चली है लेकिन शाम होते-होते इसका ऐसे प्रचार किया गया जैसे आशुतोष ने इन माओवादियों को जड़ से उखाड़ फेकने का बीड़ा उठा लिया है. मैंने सोचा की आप तक ये article पहुँचाऊ .

1990 में आधिकारिक तौर पर मार्क्सवाद की मौत हो गयी लेकिन उसके शव को लेकर अभी भी कुछ लोग घूम रहे हैं। लेनिन के रूस ने इस शव को दफन कर दिया है और माओ का चीन इस शव को भूल चुका है लेकिन इस देश में कुछ सिरफिरों को अभी भी लगता है कि मार्क्स की तंत्र साधना कर के इस शव में जान फूंकी जा सकती है। इसलिये किशन जी 2011 में कोलकाता में सशस्त्र क्रांति का सपना संजो रहे हैं। और पिछले दिनों दंतेवाड़ा के जंगलों में 76 जवानों का कत्ल कर के ये सोचने भी लगे हैं कि अब क्रांति दूर नहीं है और बहुत जल्द ही दिल्ली पर भी उनका कब्जा हो जायेगा।
इन सिरफिरों के कुछ सिरफिरे दोस्त भी इसी यकीन पर कब्जा जमाये बैठे हैं और पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में जोर दे दे कर भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को बलात्कारी और कातिलों की जमात ठहराने के लिये अंग्रेजी और हिंदी के शब्दों का खूबसूरत इस्तेमाल भी करने लगे हैं। लेकिन ये भूल जाते हैं कि दिल्ली के आराम पंसद माहौल में रहकर नक्सलियों की वकालत करना आसान है लेकिन इस सचाई से रूबरू होना मुश्किल कि अगर य़े नक्सली वाकई में अपने मकसद में कामयाब हो गये तो सबसे पहले इनकी ही जुबान पर ताला लगेगा और अगर चारू मजूमदार की भाषा में बात हुई तो एनीहिलेशन थियरी के मुताबिक सबसे पहले कत्ल भी इन्हीं संभ्रांत लोगों का होगा जैसे रूसी क्रांति के सबसे बड़े अगुआ लियोन ट्राटस्की के साथ रूसी क्रांतिकारियों ने किया। चे गुवेरा बनने का ख्वाब देखना आसान है लेकिन ये समझना मुश्किल कि अगर वाकई मे नक्सली सत्ता में आये तो क्या होगा।
ये 'समझदार' लोग ये भूल जाते हैं कि 18 मई 1967 को जंगल संथाल ने जब नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआत की थी तो ये महज भूमिहीन किसानों को जमीन देने का आंदोलन नहीं था जैसे अब इस वक्त कुछ लोगों को ये भ्रम हो गया है कि माओवादी आदिवासियों और भूमिहीनों की लड़ाई लड रहे हैं। कुछ कहते हैं कि बड़ी-बड़ी कंपनियों के हितों की रक्षा के लिये ऑपरेशन 'ग्रीन हंट' किया जा रहा है और पी. चिदंबरम इन कंपनियों के सबसे बड़े पैराकार हैं क्योंकि वे मंत्री बनने के पहले ऐसी एक बड़ी कंपनी के वकील रह चुके हैं। आदिवासी और भूमिहीन दरअसल माओवादियों के लिये एक लबादा हैं जो इनके असली मंसूबों को छिपाने में मदद करता है। चारू मजूमदार के ऐतिहासिक आठ दस्तावेज को अगर ध्यान से पढ़ा जाये तो साफ पता चलता है कि नक्सलवादियों माओवादियों को भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास नहीं है। चारू मजूमदार के मुताबिक भारतीय राज्य एक बुर्जुआ राज्य है। इसका संविधान बुर्जआ है। और उनकी नजर में सीपीएम और सीपीआई रूपी मार्क्सवादियों ने भारतीय संविधान को मानकर साम्यवादी विचारधारा के साथ विश्वासघात किया है इसलिये ये उन्हें रिवीजनिस्ट यानी भटकाववादी कहते हैं जो मार्क्सवादी भाषा में एक भद्दी गाली है। मजूमदार की नजर में लोकतंत्र एक छलावा है और शांति के रास्ते पर चलकर सत्ता नहीं हथियाई जा सकती है। माओ उनके आदर्श हैं जो कहा करते थे कि सत्ता बंदूक की नली से निकला करती है।
चारू मजूमदार ने माओ से प्रभावित होकर ही 'एनीहिलेशन थियरी' का प्रतिपादन किया था जिसका मतलब था कि वर्गविहीन समाज बनाने के लिये अगर एक एक वर्ग शत्रु को मौत के घाट भी उतारना पड़े तो सही है। दिलचस्प बात ये है कि गिरफ्तारी के बारह दिन के अंदर जब पुलिस कस्टडी में चारू मजूमदार की संदिग्ध स्थिति में मौत हुई तो उनके समर्थकों को अचानक मानवाधिकार की याद आने लगी। इनमें नोम चोमस्की और सिमोन द बोउवा जैसे भी नामचीन लोग भी थे और ऐसे तमाम लोगों की नजर में सिद्धार्थ शंकर रे एक रक्त पिपासू मुख्यमंत्री हो गये थे। तब इन लोगों को ये याद नहीं आया कि चारू मजूमदार इंसानी गर्म खून बहाने के सबसे बड़े सिद्दांतकार थे।
आज के नक्सली माओवादी भी उसी रास्ते पर हैं। आदिवासियों, भूमिहीनों की लड़ाई की बात बकवास है। ये भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की साजिश है। ये वो लोग हैं जो भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई को भी नहीं मानते। इनके मुताबिक 1947 में सत्ता बदली। सत्ता का स्वरूप नहीं बदला। सत्ता अंग्रेज बुर्जुआ के हाथ से भारतीय बुर्जुआ के हाथ आयी। ये पहले भी दमनकारी थी और 1947 के बाद भी दमनकारी है, ये पहले भी सर्वहारा के खिलाफ थी और बाद मे भी। यही कारण है कि आजादी के फौरन बाद जब देश भयानक संकट के दौर पर जूझ रहा था तो सीपीआई के कुछ मार्क्सवादियों को इस संकट की घड़ी में एक मौका दिखा और तेलंगाना के बहाने सशस्त्र क्रांति का आहवान किया, इनको लगा यही मौका है साम्यवादी क्रांति का। भारतीय राज्य व्यवस्था कमजोर है एक झटका देने पर 1917 के रूस की तरह चरमरा जाएगी और वो सत्ता पर काबिज हो जाएंगे।
मैं आज भी मानता हूं कि मार्क्सवाद की शव साधना में लगे ये माओवादी अपने मकसद में कामयाब नहीं होंगे। मेरा बस इनसे और इनके समर्थकों से छोटा सा सवाल है कि अगर इन्हें वाकई गरीबों, आदिवासियों, भूमिहीनों की परवाह है और ये यकीन कि ये लोग उनके साथ हैं तो क्यों नहीं ये भारतीय लोकतंत्र में हिस्सा लेते, भारतीय संविधान के तहत अपनी पार्टी क्यों नहीं खड़ी करते, चुनाव क्यों नही लड़ते और जीत हासिल कर वो उन नीतियों को लागू क्यों नहीं करते जो ये चाहते हैं। क्योंकि लोकतंत्र में वही राजा है जिसके साथ लोग हैं और इनका दावा है कि लोग इनके साथ हैं। लेकिन ये ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि लोग कभी सिरफिरों के साथ नहीं होते। ऐसे में ये लोकतंत्र और चुनाव का रास्ता क्यों अपनाएंगे। ये तो बस अपने सिरफिरेपन में एक ऐसे प्रयोग को अंजाम देने में लगे हैं जो सिर्फ रक्तरंजित समाज की रचना कर सकता है, हमारी और आपकी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर सकता।
आशुतोष 

लो क सं घ र्ष !: लड़ते हो, और हाथ में तलवार भी नहीं

एक खबर पढ़िए, फिर एक चुटकुला भी सुन लीजिये- खबर यह है- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार ने सिगरेट, बीडी, गुटखा तथा अन्य तम्बाकू उत्पादों पर मूंह के कैंसर की तस्वीर छापने के आदेश पारित कर दिए हैंतम्बाकू कैंसर समेत 26 जानलेवा बीमारियों की जनक है, आगामी जून से इसके उतापदों पर सचित्र चेतावनी छापना आवश्यक होगा
अब चुटकुला- एक शहर बार-बार बाढ़ से प्रभावित होता था, भारी बर्बादी होती थी सरकारी अफसरों के उपाय बेकार चले जातेहल निकालने के लिए मीटिंग की गयी, बहुत से सुझाव पेश हुए, परन्तु एक हल ऐसा था जिसमें कोई वित्तीय भार भी था- वह यह कि बाढ़ का डेंज़र पॉइंट बढ़ा दिया जाए
अब यह भी देखिये कि शराब के सेवन से आये दिन सैकड़ो व्यक्तियों के मरने की खबरें रही हैं- समाज कल्याण विभाग अपने काम में लगा है, मध् निषेध विभाग की भी कुछ उपलब्धियां जरूर होगी- परन्तु उत्तर प्रदेश सरकार इस बात से अति उत्साहित है कि इस वर्ष शराब के उत्पादों की 22 प्रतिशत तक सेवन- वृद्धि हुई है जिससे वित्तीय लाभ बढ़ा
जनता और सरकारों-दोनों को सोचना चाहिए कि तम्बाकू, शराब, जुआ, प्रदूषण, प्लास्टिक का प्रयोग आदि जो भी मसले हैं - उन पर 'जागरूकता' के नाम पर अपना दामन बचाना ठीक नहीं हैअगर कोई बुराई है तो उसे दृढ़ता से रोकना चाहिए, वैधानिक उपाय करने चाहिए
सिगरेट पर बहुत समय से चेतावनी लिखी हुई हैक्या कभी कोई ऐसा अध्ययन हुआ जिसके द्वारा यह बताया गया हो कि अमुक काल-खंड में इतनी संख्या के सेवन कर्ता इस जागरूकता-अभियान से प्रभावित हुए ? समस्याओं को सुलझाने के यूरोपीय नुस्खें और भी दिलचस्प हैं - जब कोई जुर्म वह रोक नहीं पाते तो उसकी वैधानिक इजाजत दी जाती है
ढुलमुल नीति के लिए हम अपनी सरकार से यह जरूर कहेंगे - लड़ते हो, और हाथ में तलवार भी नहीं ?

डॉक्टर एस.ऍम हैदर

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1084 की मां: आततायी व्यवस्था का प्रतिरोध

हजार चौरासी की मां कहानी है एक ऐसी मां की जिसका सबसे प्यारा लाड़ला नक्सलबाड़ी आन्दोलन की भेंट चढ़ जाता है। यह कहानी है एक ऐसे लड़के की जो इस व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़ा होता है- तमाम सुख सुविधाओं के बाजवूद। यह कहानी है पुलिस उस बर्बरता की जो लोकतन्त्र का मजाक उड़ाते हुए आदमी के साथ जानवरों का सा सलूक करते हैं। यह कहानी है उस मध्यवर्ग की जिसके लिए उसका तुच्छ स्वार्थ की सबकुछ है।

मां सुजाता और उसका बेटा ब्रती एक दूसरे को बहुत प्यार करते हैं। मां दिल खोलकर ब्रती पर अपनी ममता लुटाती है। बेटा अक्सर ऐसी बातें मां को बताता जो मां के समझ से बाहर है। बेटा माओ की बातें बताता है। अचानक एक दिन फोन आता है कि तुम्हारा बेटा नक्सलबाड़ी आन्दोलन में मारा गया है। मां सन्न रह जाती है। ब्रती का बाप बड़ा रईस है। उसे डर है कि लोग उसे नक्सलवादी का बाप न बोलें। किसी तरह पुलिस को मैनेज करके वह अखबारों में अपने बेटे का नाम न छपने का बन्दोबस्त कर लेता है। और नक्सलवादी के बाप के कलंक से बच जाता है। ब्रती का लाश लावारिश हो जाती है। इसी लावारिश लाश का नंबर है हजार चौरासी। ब्रती का बाप खुद अनैतिक सम्बंध रखता है, अव्वल दर्जे का भ्रष्टाचारी है लेकिन अपनी पत्नी के बाहर जाने पर ऐतराज जताता है। मर्दों के दोहरे चरित्र को भी नाटक बेनकाब करता है।

ब्रती की मौत के दो साल बाद मां को असल कहानी पता चलती है। ब्रती के दोस्त की मां जिसका बेटा भी ब्रती के साथ मारा जाता है, मां को तमाम घटनाक्रमों की जानकारी देती है। ब्रती का दोस्त अपने बाप के डरकर रहने से आक्रोशित रहता है। उसके दिल में व्यवस्था से घोर नाराजगी है। अपनी मां से कहता है- जैसे वह कुत्ते का बेटा है। यही बाप बेटे के मरने के बाद पुलिस की चौखट में सरपटपटकर लहूलुहान हो जाता है लेकिन पुलिस खाने पीने का बंदोबस्त करने में व्यस्त रहती है। यह दृश्य देखकर गुस्सा और तकलीफ ह्रदय को भीतर तक कचोट देती है।

ब्रती नन्दिनी से बेइन्तहां मोहब्बत करता है। नन्दिनी भी नक्सलबाडी से जुड़ी है। नन्दिनी मां को पुलिस की बर्बरता की दास्तान सुनाती है। उस बर्बरता की जिससे नन्दिनी को दो चार होना पड़ा था। पुलिस वाले नन्दिनी की जांघों, गले और शरीर के अलग-अलग अंगों में किस तरह जलती हुई सिगरेट दागते थे, मां को बताती है। ये दृश्य झकझोर कर रख देने वाले हैं।

मां सुजाता अपने बेटे की मौत का जिम्मेदार उस समाज को मानती है, जिसकी बेहतरी का सपना उसके बेटे ने देखा था। उस समाज को दोषी मानती है जो अपने बनाए झूठे आदर्शों और मूल्यों पर टिका है, जिसे अपने तुच्छ स्वार्थों के आगे बड़ी-बड़ी कुर्बानियां बेकार नज़र आती हैं।

महाश्वेता देवी की इस मूल कृति पर आधारित इस नाटक में एनएसडी के दूसरे वर्ष के छात्रों ने गजब का अभिनय किया है। लगभग तीन घंटे लगातार अभिनय करना आसान नहीं होता। छात्रों ने इसके लिए कितनी मेहनत की होगी, पात्रों में ढलने के लिए कितना अभ्यास किया होगा, नाटक देखकर अन्दाजा लगाया जा सकता है। निर्देशक शान्तनु बोस ने कमाल का काम किया है। रौशन एनजी ने पात्रों का बढ़िया मेकअप किया है।
लाइट, सेट और ध्वनियों का बेहतरीन तालमेल है।

अब और मूर्ख तो नहीं बनायेगी ना सरकार.....?


‘’मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का कानून’’ लागू होने पर विशेष

सर, इस कानून में नया क्या होगा ! स्वतंत्र भारत में संविधान बनाते समय तो प्रत्येक बच्चे को वचन दिया गया था कि दस वर्ष के भीतर सारे बच्चे शिक्षित होंगे। लेकिन आजाद हुये भी 6 दशक बीत गये ! सर्व शिक्षा अभियान के समय भी तो सरकार ने यही सब वायदे किये थे, लेकिन मेरे पड़ोस में रहने वाली कल्ली तो अभी भी पन्नी बीनने जाती है। सर, समझ में यह भी नहीं आता कि सरकार जब राष्ट्रमण्डल खेलों पर 1 लाख करोड़ रूपये का व्यय करने को आतुर है तो फिर उसकी यह तत्परता शिक्षा के लिये क्यूं नहीं दिखती ! उस मासूम के एक और सवाल ने सबको चौंका दिया कि सर1 अप्रैल को कानून लागू होने जा रहा है और इस दिन मूर्ख दिवस है। क्या सरकार इस बार भी हमें मूर्ख तो नहीं बनायेगी। कल्ली पढ़ तो पायेगी ना सर !

भोपाल में बचपन परियोजना द्वारा आयोजित एक बाल चौपाल में ''शिक्षा का अधिकार '' विषय पर विमर्श के दौरान अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा का कानून लागू होने की बात करने पर आकाश ने बड़ी ही मासूमियत से सवाल किया कि क्या सचमुच में हमें शिक्षा का अधिकार मिलेगा? मंच पर उपस्थित पैनल के सदस्यों ने उसे 1 अप्रैल से लागू होने वाले मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून की बात की, उसने फिर सवाल किया कि हाँ वो तो मालूम है, लेकिन सर्व शिक्षा अभियान के समय भी तो सरकार ने यही सब वायदे किये थे, लेकिन मेरे पड़ोस में रहने वाली कल्ली तो अभी भी पन्नी बीनने जाती है। इस बार भी पैनल ने आकाश को दिलासा दी कि अब सभी को शिक्षा मिलेगी। लेकिन जो सवाल आकाश का है वह आज सभी का सवाल है कि क्या वाकई सभी को शिक्षा मिल पायेगी?

आकाश की चिंता को केन्द्र में रखकर यदि इतिहास को खंगालें तो गोपालकृष्ण गोखले ने 1915 में, महात्मा गांधी ने 1931 में और भगत सिंह ने भी आम शिक्षा पर जोर दिया था। माना तब भारत स्वतंत्र नहीं था लेकिन स्वतंत्र भारत में संविधान बनाते समय हमने प्रत्येक बच्चे को वचन दिया था कि दस वर्ष के भीतर सारे बच्चे शिक्षित होंगे। लेकिन अभी तक तो आजाद हुये भी 6 दशक बीत गये! और नतीजा वही । ज़रा और आगे बढें तो 1989 में संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौता हुआ, भारत ने 1992 में इसका अनुमोदन किया। इस समझौते के अनुच्छेद 28 29 में भी अनिवार्य शिक्षा की बात कही गई है। 1986 का बालश्रम अधिनियम भी शिक्षा की बात करता है । 1993 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण (उन्नीकृष्णन) फैसले में संविधान के अनुच्छेद 45में निर्देशित 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों की शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दे दिया था। इस फैसले के चलते ही6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को पूर्व प्राथमिक शिक्षा का अधिकार मिला। दरअसल यह तो शिक्षा के अधिकार के इस नये कानून की पृष्ठभूमि है । इस कानून की पृष्ठभूमि में या शिक्षा को बाजारवाद की जद में ले जाने और बाजारु करने हेतु'सबको शिक्षा' पर एक विश्‍वव्‍यापी सम्मेलन 1990 में थाईलैण्ड़ के जामेतियन में हुआ था। शिक्षा के अधिकार के इस ऐतिहासिक घटनाक्रम को समझने के बाद भी आकाश का सवाल तो जस का तस है ।

अब यदि कुछ समय के लिये यह मान भी लें कि सरकार संसद में बहुत बेहतर कानून लाई है तो क्या यह नया कानून आकाश की चिंता को हल कर देगा, जवाब है नहीं! बल्कि यह कानून तो चिंता को और बढ़ाने वाला है। दरअसल में इस कानून में केवल 6 से 14 आयुवर्ग तक के बच्चों को ही शिक्षा की बात कही है तो फिर उन्नीकृष्णन फैसले का क्या होगा?उन्नीकृष्णन फैसले से 6 वर्ष तक की उम्र के प्रत्येक बच्चे को संतुलित पोषणाहार, स्वास्थ्य देखभाल और पूर्व प्राथमिक शिक्षा का अधिकार दिया था। तो यूं कहें कि वर्तमान कानून देश के6 वर्ष तक के 17 करोड़ बच्चों को शिक्षा से दूर रखेगा। यह तब है कि जबकि यह सिध्द हो चुका हैं कि 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का 80 प्रतिशत मानसिक विकास इसी उम्र में होता है।

वहीं बात 14 वर्ष से 18 वर्ष तक के बच्चों की करें तो यह कानून उन्हें भी ठेंगा दिखाता है। वह इसलिये क्योंकि भारत जेसे देश में अभी तक बच्चों की परिभाषा पर एक राय नहीं है। सरकार जब संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते जैसी किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर करती है तो वह 18 वर्ष तक के व्यक्ति को बच्चा मानती है । लेकिन बालश्रम कानून में 14 वर्ष तक की उम्र वालों को बच्चा मानती है। किशोर न्याय अधिनियम 18 वर्ष तक के व्यक्ति को बच्चा मानता है। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का कानून भी 14 वर्ष तक के व्यक्तियों को इसके दायरे में लाता है तो फिर सवाल जस का तस है कि 15वर्ष से 18 वर्ष के बच्चों का क्या होगा? जबकि यह एक बड़ी जनसंख्या है।

बाल चौपाल में ही एक अन्य बच्ची ने यह कहा कि हमारे साथ स्कूलों में इसलिये भेदभाव किया जाता है क्योंकि हम दलित हैं। मंदसौर से आई बांछड़ा समुदाय की बच्ची कहती है कि हमसे स्कूल में शिक्षक और बच्चे दोनों की दूर रहने का प्रयास करते हैं। इन बच्चियों के इन सवालों का कानून में कोई जवाब नहीं है, क्योंकि यह कानून एक अलग तरह का भेदभाव करता है। निजी स्कूल बनाम् सरकारी स्कूल। सरकारी स्कूल के बच्चों को तो मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा मिलेगी लेकिन निजी स्कूल के बच्चे इससे वंचित रह जायेंगे। निजी स्कूल के बच्चो में वे बच्चे भी हैं जो 25 फीसदी कोटे का लाभ पाने वाले बच्चे हैं। कोठारी आयोग पहले ही कह चुका है कि ''यह शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि विभिन्न सामाजिक तबकों और समूहों को इकट्ठा लाए और इस प्रकार एक समतामूलक एवं एकजुट समाज के विकसित होने को प्रोत्साहित करे। लेकिन वर्तंमान में ऐसा करने के बजाय शिक्षा स्वयं ही सामाजिक भेदभाव और वर्गों के बीच के फासले को बढ़ा रही है। ......... यह स्थिति गैर-लोकतांत्रिक है और समतामूलक समाज के आदर्श से मेल नहीं खाती है।''

महत्वपूर्ण यह भी है कि किसी भी कानून के लागू होने के समय कम से कम सात वर्षों तक का बजटीय अनुमान व नियोजन किया जाता है लेकिन इस पारित बिल में इसका जिक्र ही नहीं है। हालांकि कोठारी आयोग तो बहुत पहले ही यह सुझाव दे चुका है कि सरकार कुल राष्ट्रीय आय के 6प्रतिशत की राशि शिक्षा पर खर्च करे, लेकिन यह आज तक नहीं हो पाया। वर्ष 01 में केन्द्र व राज्य सरकारों का शिक्षा खर्च कुल राष्ट्रीय आय का 3.19 प्रतिशत था और यह बढ़ने की अपेक्षा 07 में घटकर 2.84 प्रतिशत रह गया। विश्‍व के स्तर पर भारत राष्ट्रीय आय में से शिक्षा पर खर्च करने वाले देषों में115 वें नंबर पर है। सवाल फिर वही कि सरकार जब राष्ट्रमण्डल खेलों पर 1 लाख रूपये का व्यय करने को आतुर है,रक्षा के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाने को तैयार है तो फिर यह तत्परता शिक्षा के लिये क्यूं नहीं दिखती। मध्यप्रदेश सरकार ने तो कानून लागू होने के पहले ही 13000 करोड़ रूपये का व्यय होने की चिंता करते हुये केन्द्र सरकार से मदद के लिए हाथ फैलाने की बात कही है । यानी अब बच्चों की शिक्षा के बजट के लिये केन्द्र और राज्य सरकारें एक दूसरे पर दोषारोपण करती रहेंगी, राजनीति का एक नया अखाड़ा खुल जायेगा और बच्चे पढ़ नहीं पायेंगे।

ऐसा नहीं कि इस कानून में सब कुछ खराब ही है, कुछ अच्छे व महत्वपूर्ण प्रावधान भी हैं लेकिन बेहतर नियम व स्पष्टता के अभाव में इनका परिणाम सामने नहीं आ पायेगा जैसे कि इस कानून की धारा 3 में विकलांग बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ पढ़ाये जाने की बात तो कर दी लेकिन क्या ब्रेल लिपि की पढ़ाई हर एक स्कूल में उन बच्चों के लिए होगी? अब कोई भी बच्चा 8वीं के पहले तक फेल नहीं होगा बल्कि उसका मूल्यांकन किया जायेगा। यानी शिक्षा की गुणवत्ता का क्या होगा ? ऐसे ही केवल कुछ कामों को छोड़कर शिक्षकों की गैर शिक्षकीय कार्यों में डयूटी लगाने की मनाही को पूर्ण प्रतिबंध की बात इस कानून में कही गई है, लेकिन इस केवल कुछ को समझना होगा । यह केवल कुछ यानी सभी तरह के चुनाव,जनगणना और आपदा राहत तो सवाल यह कि फिर बचता क्या है !! छात्र शिक्षक अनुपात नि:शुल्क शिक्षा, आदि एसे कई प्रावधान हैं जो संशय पैदा करते हैं।

आकाश के एक और सवाल ने सबको चौंका दिया कि सर 1अप्रैल को अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा का कानून लागू होने जा रहा है और इस दिन मूर्ख दिवस है। क्या सरकार इस बार भी हमें मूर्ख तो नहीं बनायेगी। कल्ली पढ़ तो पायेगी ना सर ! आकाश तो पैनल सदस्यों की दिलासा पर शांत हो जाता है,लेकिन सवाल जस का तस है, कि क्या हमें फिर मूर्ख बना दिया गया है।


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