Visit blogadda.com to discover Indian blogs कठफोड़वा: May 2010

बबुआ ! कन्या हो या वोट

भारतीय संस्कृति में दान को बड़े विराट अर्थॊं में स्वीकारा गया है। कन्यादान और मतदान दोनों में अनेक समानताएं हैं। कन्यादान का दायरा सीमित होता है वहीं मतदान के दायरे में सारा देश आ जाता है। कन्यादान एक मांगलिक उत्सव है... मतदान उससे भी बड़ा मांगलिक उत्सव है। कन्यादान करना एक उत्तरदायित्व है.... मतदान करना बड़ा उत्तरदायित्व है। कन्यादान का उत्तरदायित्व पूर्ण हो जाने पर मन को अपार शान्ति मिलती है। मतदान के उत्तरदायित्व पूर्ण हो जाने पर भी आप अमन-शान्ति चाहते हैं। कन्यादान के लिए लोग दर-दर भटक कर योग्य वर की तलाश करते हैं परन्तु मतदान के लिए क्या शीलवान (ईमानदार) पात्र की तलाश करते हैं? यह एक बड़ा प्रश्न है इसका उत्तर आप अपने सीने में टटोलिए अथवा इस लोकगीत में खोजिए!                -डॉ0 डंडा लखनवी


बबुआ ! कन्या हो या वोट

बबुआ ! कन्या हो या वोट ।

दोनों की गति एक है बबुआ ! दोनों गिरे कचोट ।।


कन्या वरै सो पति कहलावै, वोट वरै सो नेता,

ये अपने ससुरे को दुहते, वो जनता को चोट ।।


ये ढूंढें सुन्दर घर - बेटी, वे ताकें मतपेटी,

ये भी अपनी गोट फसावै, वो भी अपनी गोट ।।


ये सेज भी बिछावै अपनी, वो भी सेज बिछावै,

इतै बिछै नित कथरी-गुदड़ी उतै बिछै नित नोट ।।


कन्यादानी हर दिन रोवे, मतदानी भी रोवे,

वर में हों जो भरे कुलक्षण, नेता में हों खोट ।।


कन्या हेतु भला वर ढूंढो, वोट हेतु भल नेता,

करना पड़े मगज में चाहे जितना घोटमघोट ।।

कैसे जिएं निगहबां?

ये वही इलाके हैं जहां लोग प्यास से मर रहे हैं। ये वही इलाके हैं जहां लोग बीमारी से मर रहे हैं। ये वही लोग हैं, जिन्हें विदेशी कंपनियों के लिए अपने घरों से उजाडा जा रहा है। ये वही लोग हैं, जिनकी याचना को सरकार हमेशा अनसुनी करती आई है। सरकार को ये बात समझनी होगी कि खून चाहे इधर बहे या उधर बहे, अपना ही है।

जवानों को एक साथ दो मोर्चों पर लडना पड रहा है। माओवादी तो समस्या हैं ही, कब कहां से आएं और दन-दनाकर फायरिंग शुरू कर दें। लेकिन एक और हमलावर है जो उनसे ज्यादा फुर्तीला और खतरनाक है, गुरिल्ला वार में तो वह दुनिया की तेज-तर्रार फौज के भी छक्के छुडा सकता है। ये हैं मलेरिया के मच्छर, जो सुनसान जंगलों में जानलेवा साबित होते हैं, जहां इलाज के लिए दूर-दूर तक कोई अस्पताल नहीं। साथ में कोई डॉक्टर नहीं, जो वक्त-बेवक्त इलाज के लिए आगे आए। बिल्कुल असहाय, उपलब्ध जडी-बूटियों से अनभिज्ञ, धीमे-धीमे बीमार और कमजोर होने के अलावा कोई चारा नहीं और जंगल का कानून है कि वह कमजोर लोगों का साथ नहीं देता।

जंगलों में रहने-खाने-जीने के अभ्यस्त माओवादी, कहते हैं जंगल में मलेरिया के मच्छर और सांप-बिच्छू से लेकर खूंखार जानवर तक इनके पास नहीं फटकते। आसपास कोई अस्पताल नहीं, तो भी कोई समस्या नहीं, इनके भाई-बंधु आदिवासी जडी-बूटियों से ही अपना इलाज करते हैं। पीने का पानी नहीं, चलो जंगल में प्रकृति का दिया तालाब तो है। कमांडो ट्रेनिंग ने इनकी मारक क्षमता को कई गुना बढा दिया है। जंगल ही देवता है, वही पालनहार और वही तारणहार, सरकार के गुड गवर्र्नेंस का नारा अभी इन जंगलियों तक नहीं पहुंचा है। आखिर शहरों की सभ्यता को चीरकर गुंजती मीडिया की चीख-पुकार भी जंगल की सरहदों को पार नहीं कर पाती। इन्हीं के बीच है एक ऐसी आदिम सभ्यता, जो सरकारी हस्तक्षेप के कारण विलुप्त होने के कगार पर है। अगर इनके पास शैंपू या ब्रेड जैसी कोई चीज हो, तो पुलिस एक झटके में इन्हें नक्सली मान लेती है। जरुर शहर में आना-जाना होगा और जो शहर के संपर्क में है, वह माओवादी तो होगा ही। ऐसे खतरनाक लोगों को मारने के लिए सीआरपीएफ के जवानों को जंगल की सरहदों में छोड दिया गया है। बिना जंगल के नियम-कानूनों को समझे, बिना विशेष प्रशिक्षण के, बिना उचित दवाओं और मच्छरदानियों के, माओवादियों से भी ज्यादा खूंखार जंगली जानवरों के बीच।

सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट, जिसके खिलाफ माओवादी समाज से लड रहे हैं, ही जंगल का कानून है। एक झटके में ही 76 सीआरपीएफ के जवान शहीद हो जाते हैं। ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाने वाली सरकार को क्या इस बात का अंदाजा नहीं कि जंगल की लडाई के क्या कायदे-कानून होते हैं? आखिर क्यों सरहद की रक्षा करने वाले जवानों को देश की सीमा के अंदर युध्द जैसी स्थिति पैदा कर मरने के लिए छोड दिया जाता है। 9 फीसदी की विकास दर पर मचलने वाले देश के पास क्या इतना भी पैसा नहीं कि अपने सैनिकों के लिए एक मच्छरदानी भी खरीद सके।

वीर जवानों की शहादत ने कई ऐसे अहम सवाल छोड दिए हैं, जो हमें शर्मसार करते हैं। अब जानकारी मिल रही है कि माओवादियों के पास लाईट मशीन गन भी था, स्वचालित हथियारों से लैस करीब 1000 माओवादियों ने हमले की योजना महज वारदात के कुछ घंटे पूर्व ही बनाई थी। गुरिल्ला वार में माहिर माओवादियों को इस बात की जानकारी थी कि ये जवान आने-जाने के लिए इन्हीं रास्तों का उपयोग करते हैं। त्वरित कार्रवाई करते हुए उन्होंने जवानों पर हमला बोला था। हमारे जवान भी गोला, बारूद खत्म होने तक हमले का जवाब देते रहे। एक लंबी लडाई के लिए जरुरी है कि हमारे जवानों के हौसले बुलंद हों। उन्हें यह महसूस हो कि उनकी शहादत के पीछे देश की इज्जत, प्रतिष्ठा के साथ ही लोकशाही का समर्थन भी है। अगर जंगल में हमलों के दौरान उनका ध्यान जंगली जानवरों, मच्छरों, पीने के पानी की तरफ रहा, तो युध्द में हार निश्चित है। हमारे जवानों का मनोबल ऊंचा रखने के लिए जरुरी है कि उनकी छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा किया जाए। उन्हें इलाके की पुख्ता जानकारी हो, माओवादियों की गतिविधियों पर पैनी नजर हो, साथ ही राज्य पुलिस भी खुलकर मदद करे। भूखे-प्यासे और आधे-अधूरे मनोबल से युध्द नहीं लडे ज़ाते।

जवानों को एक साथ दो मोर्चों पर लडना पड रहा है। माओवादी तो समस्या हैं ही, कब कहां से आएं और दन-दनाकर फायरिंग शुरु कर दें। लेकिन एक और हमलावर है जो उनसे ज्यादा फुर्तीला और खतरनाक है, गुरिल्ला वार में तो वह दुनिया की तेज-तर्रार फौज के भी छक्के छुडा सकता है। ये हैं मलेरिया के मच्छर, जो सुनसान जंगलों में जानलेवा साबित होते है, जहां इलाज के लिए दूर-दूर तक कोई अस्पताल नहीं। साथ में कोई डॉक्टर नहीं, जो वक्त-बेवक्त इलाज के लिए आगे आए। बिल्कुल असहाय, उपलब्ध जडी-बूटियों से अनभिज्ञ, धीमे-धीमे बीमार और कमजोर होने के अलावा कोई चारा नहीं। और जंगल का कानून है कि वह कमजोर लोगों का साथ नहीं देता। थके-हारे जवान माओवादियों से लडें या कमजोर साथियों को सहारा दें। कमोबेश जंगल में स्थित सभी कैंप कुछ ऐसे ही हालत से गुजर रहे हैं। तो ये है जंगल का सच, जो दुश्मन देशों के दांत खट्टे करने वाले सैनिकों के मनोबल को भी चकनाचूर कर देता है।

एक ऐसे युध्द में जहां जीत की कोई गुंजाइश नहीं, भूखे-प्यासे जवानों को भेजना कहां तक उचित है? सेना के लिए एक अलग से रसद-सामग्री ले जाने के लिए सैनिकों की टुकडी होती है। दिन में दुश्मनों से लडते समय भी उन्हें पता है कि चलो रात तो भूखे पेट नहीं सोना होगा। ड्राई फ्रूटस के अलावा कई तरह के पौष्टिक आहार सैनिकाें को दिए जाते हैं। लेकिन इस युध्द में क्या हमने उम्मीद लगाई थी कि सीआरपीएफ के जवान भूखे पेट लडक़र भी इन्हें चुटकियों में मसल देंगे। युध्द लडना ही है तो हमें जवानों को मूलभूत सुविधाएं देनी होंगी। जंगल में जवानों का तो ये हाल है कि प्यास लगने पर इन्हें मीलों दूर जाना पडता है। कैंप में पानी के लिए पंप तो लगे हैं, लेकिन बिजली रहे तब तो पानी मिले। जवानों को इस बात का अंदाजा भी नहीं होता कि पानी की तलाश में निकलने पर आगे कोई तालाब भी होगा। एक खतरा ये भी होता है कि माओवादी पानी की तलाश में निकले जवानों पर घात लगा सकते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि जंगल की भीषण गर्मी जवानों को पानी के ठिकानों की ओर जरुर खींच लाएगी। अगर कभी जलाशय मिलते भी हैं, तो जानवर उसे इतना प्रदूषित कर चुके होते हैं कि ऐसे पानी पीना खुलेआम मौत को आमंत्रण देना होता है।

गुरिल्ला वार से अनभिज्ञ जवान जिन गाड़ियां में थे, वे बारूदी सुरंग निरोधी नहीं थीं बल्कि महज बुलेट प्रुफ थीं। क्या सरकार को इस बात की जानकारी थी कि माओवादियों ने जगह-जगह पर बारूदी सुरंगें बिछा रखी हैं। फिर ऐसे वाहन में उन्हें भेजना, तो सीधे मौत के मुंह में भेजना ही कहा जा सकता है। जांच के दौरान पता चला है कि उस दिन माओवादियों ने जवानों को चारों तरफ से घेर लिया। माओवादी पहाड़ी पर थे और उन्होंने गांव को जोड़ने वाले रास्ते को भी बंद कर रखा था। ऊंचाई पर होने का फायदा उन्हें इस लडाई में मिला। अभी सरकार ने इस बात की घोषणा की है कि जवानों को जंगल में विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। इन्हें भारी हथियार लेकर पेड पर चढने की भी टे्रनिंग दी जाएगी। एकाएक हमला करने एवं हमले के बाद छुप जाने की ट्रेनिंग भी इसका एक हिस्सा होगा। लेकिन जंगल के चप्पे-चप्पे से वाकिफ माओवादियों से लड पाना जवानों के लिए फिर भी एक चुनौती होगी।

यों भी 76 जानें कोई मामूली नहीं, वीर जवानों की थीं, जिनके प्रशिक्षण पर देश के करोडाें रुपए लगे होते हैं। अगर एक व्यक्ति पर पांच लोग भी निर्भर थे तो इससे 380 लोगों के जीवन में अंधकार और दुख का साया मंडराने लगा है। सरकार को इस बात की तलाश करनी होगी कि आखिर इन इलाकों में माओवादी क्यों एकाएक बढ़े। ये वही इलाके हैं जहां लोग प्यास से मर रहे हैं। ये वही इलाके हैं जहां लोग बीमारी से मर रहे हैं। ये वही लोग हैं, जिन्हें विदेशी कंपनियों के लिए अपने घरों से उजाडा जा रहा है। ये वही लोग हैं, जिनकी याचना को सरकार हमेशा अनसुनी करती आई है। सरकार को ये बात समझनी होगी कि खून चाहे इधर बहे या उधर बहे, अपना ही है। इनसे लडने वाले कई जवानों की भी शायद वही पारिवारिक पृष्ठभूमि हो। जवानों को भी जानकारी है कि वे ऐसी लडाई में अपनी जान गंवा रहे हैं, जिसका कोई सैनिक हल नहीं। भूखों को बुलेट नहीं, रोटी चाहिए। ऐसे में देश के दुश्मनों से लडने वाला मनोबल उनके सामने नहीं होता। और जब मनोबल में दुश्मनों को मारने वाला जज्बा न हो, तब हथियार तो कुंद हो ही जाएंगे।

दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठकर युध्द के नियम बनाने तो आसान हैं, लेकिन जमीन पर लडने वाले जवानों की असली समस्याओं को समझ पाना मुश्किल। जवानों की शहादत पर घडियाली आंसू बहाने वाले राजनेताओं को इनके प्रति मानवीय रुख अपनाना होगा। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने युध्द लडने वाले सैनिकों के साथ भिखारियों की तरह व्यवहार करने के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजधानी के किसी हिस्से में भीख मांगकर गुजारा करने वाला व्यक्ति भी हर रोज एक हजार रुपए कमा लेता है, और हम दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर जंग लडने वाले सिपाहियों को एक हजार रुपए महीने भत्ता दे रहे हैं, जिसने इस जंग में अपने हाथ तक गंवा दिए हों। क्या बहादुर सैनिकों के साथ व्यवहार करने का सरकार का यही तरीका है? क्या कोर्ट की इस फटकार के बाद सरकार से अपने जवानों के प्रति संवेदनशील होने की उम्मीद की जा सकती है? अगर हालात यही रहे और देश पर जान देने वालों का जज्बा कम हो गया, तो यकीन मानिए, यह देश के अब तक के हुए बडे हादसों से सौ गुना अधिक होगा।

ममता मीडिया की कारस्तानी और सरडीहा का सच

पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में सरडीहा के पास हुई रेल दुर्घटना के तुरंत बाद देश भर में मचे बवंडर ने एक बारगी यह सोचने को मजबूर कर दिया था कि क्या वास्तव में भारत के नक्सलवादी नरपिशाच हैं? दुर्घटना स्थल पर पहुंची रेल मंत्री ममता बनर्जी ने जिस बेशर्मी और बेहूदगी से इसके लिए नक्सलवादियों को जिम्मेदार ठहराते हुए अपनी और अपने विभाग के निकम्मेपन से पल्ला झाड़ा और हमारे लोकतंत्र के तथाकथित चैथे स्तंभ बड़े पूंजीपतियों के टुकड़ों पर पलने वाले राष्ट्रीय मीडिया ने जिस निर्लज्जता के साथ इस दुर्घटना को नक्सली हमला करार दिया उसने मीडिया, नक्सलवाद और लोकतंत्र में नैतिकता के प्रश्नों पर एकबारगी फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है।

पहली बात तो नक्सलियों की ही की जाए। नक्सलवादियों के लाख दावे के बावजूद कि वह आम आदमी की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनके हथियारबंद संघर्ष को जायज नहीं ठहराया जा सकता। सिर्फ इसलिए नहीं कि भारत में लोकतंत्र नाम की कोई चीज सुनाई पड़ती है। बल्कि इसलिए भी कि नक्सली जिस क्रांति की बात करते हैं वह क्रांति उनके इस तरह के रास्ते से नहीं आ सकती है। क्रांति की भूमिका के लिए जो तीन चार प्रमुख कारण बताए जाते है,ं उनमें से कई महत्वपूर्ण कारण अभी भारत में मौजूद नहीं हैं और जब तक यह कारण नहीं होंगे क्रांति सफल नहीं हो सकती है। क्रांति की अनिवार्य षर्त है कि देश के अंदर गृह युद्ध के हालात होने चाहिए और राजनीतिक उठापटक का माहौल होना चाहिए, किसी बाहरी देश के आक्रमण का खतरा हो और राजसत्ता लाचार हो। लेकिन भारत में इस तरह के कोई हालात अभी तो नहीं हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की आर्थिक नीतियां एक सी हैं और उनमें नीतिगत कोई मतभेद नहीं है बल्कि दोनों एक ही हैं। वहीं देश के अंदर बड़ी तेजी से एक संस्कारविहीन, फर्जीवाड़े की अर्थव्यवस्था की कोख से एक ऐसा उच्च मध्य वर्ग पैदा हुआ है जो स्वयं को पढ़ा लिखा कहता तो है लेकिन है फूहड़। इस वर्ग को नरसिंहराव- मनमोहन- वाजपेयी की तिकड़ी ने फलने फूलने का अवसर दिया है। यह वर्ग राजसत्ता का हिमायती हेै और उसके हर जुल्म- औ- सितम का हिमायती है। ऐसे में गरीबों के हितों की खातिर की जाने वाली कोई भी सशस्त्र क्रांति फलीभूत नहीं हो सकती है।

तो क्या नक्सलियों को आम आदमी की लड़ाई लड़ना बंद कर देना चाहिए? बिल्कुल नहीं! लेकिन उन्हें अपना रास्ता बदल देना चाहिए। पहले आम जनता के बीच जाकर समझाएं कि वह करना क्या चाहते हैं और उनका आम आदमी से कोई बैर नहीं है और पूंजीवादी मीडिया उनके खिलाफ मिथ्या प्रचार कर रहा है। वरना यही होगा जो सरडीहा के मामले में मीडिया ने ममता बनर्जी के सहयोग से किया। ममता ने घटनास्थल पर जाकर कहा कि विस्फोट किया गया है। जबकि खुद गृह मंत्रालय और वित्त मंत्री इस आरोप से सहमत नहीं हैं। मीडिया में ही जो रिपोर्ट्स आईं उनके मुताबिक वहां पचास मीटर तक फिश प्लेट्स उखाड़ी गई थीं और मौके पर लगता था कि ट्रैक की कई घंटों से जांच नहीं की गई थी। लेकिन हमारे न्यूज चैनल्स ममता बनर्जी के बयान को ही ले उड़े। हर चैनल चिल्ला रहा था नक्सली हमले में 76 मरे, रेलवे पर लाल हमला। बताया गया कि घटनास्थल से नक्सली समर्थक पीसीपीए के पोस्टर मिले हैं जिसमें इस घटना की जिम्मेदारी ली गई है। लेकिन किसी भी समाचार वाचक ने यह रहस्य खोलने की जहमत नहीं उठाई कि पीसीपीए नक्सलवादी नहीं है, उसे सिर्फ नक्सलियों की हिमायत हासिल है। पीसीपीए मुखिया छत्रधर महतो बाकायदा तृणमूल कांग्रेस का पदाधिकारी था और पिछले विधानसभा चुनाव में पीसीपीए ने तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिया था। इस लिहाज से अगर यह पीसीपीए का काम है तब तो इसके लिए ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ही ज्यादा जिम्मेदार है। वैसे भी तृणमूल जब तब बंगाल में रेलवे ट्रैक पर हमला करती रहती है और फिश प्लेट्स उखाड़ने में उसे महारत हासिल है।

वैसे भी अभी तक की घटनाओं में जब भी नक्सलियों ने रेलवे को कोई नुकसान पहुंचाया है तो तत्काल नजदीक के केबिन और रेलवे स्टेषन को सूचना पहुंचाई है ताकि कोई दुर्घटना न हो। सवाल यह है कि क्या हमारा मीडिया सकलडीहा का ठीकरा नक्सलियों के सिर फोड़कर ममता बनर्जी को निर्दोष साबित करना चाहता है? क्या यह सही नहीं है कि मृतकों में से पचास से भी अधिक ने दुर्धटना के 48 घंटे बाद सरकारी अव्यवस्था के चलते दम तोड़ा है? क्या यह भी सही नहीं है कि राहत ट्रेन दुर्घटनास्थल पर दो धंटे बाद और क्रेन आठ घंटे बाद पहुंची? क्या यह भी सही नहीं है कि रेलवे के सभी बड़े अफसर दुर्घटना स्थल पर ममता बनर्जी के साथ ही अगले दिन पहुंचे ? क्या इसके लिए भी नक्सली ही जिम्मेदार हैं? कायदे से इस दुर्घटना के लिए ममता बनर्जी को ततकाल त्यागपत्र दे देना चाहिए और प्रधानमंत्री को भी चाहिए कि इस हादसे की जांच में ममता की लापरवाही और साजिष की भी निष्पक्ष जांच करवाएं। एक तरफ ममता का कहना है कि घटना स्थल पर फिश प्लेटें बैल्ड की गई थीं और पेंड्रोल क्लिप या फिश प्लेट उखाड़े जाने का कोई प्रश्न ही नहीं है जबकि हमारे मीडिया के साथी ही मौके से बता रहेे हैं कि फिश प्लेटें उखड़ी हुई थीं। फिश प्लेटें उखड़ना रेलवें के लिए कोई नई बात नहीं है। एक अखबार ने खुलासा किया है कि देश की राजधानी दिल्ली से बीस किलोमीटर दूर गाजियाबाद के रास्ते के ट्रैक पर वर्ष 2010 में ही पांच हजार फिश प्लेटें उखड़ी पाई गई हैं। इतना ही नहीं उखड़ी हुई फिश प्लेटों के ऊपर से राजधानी एक्सप्रेस गुजर जाने की भी खबरें पिछले दिनों आई थीं। जाहिर है दिल्ली में अभी नक्सली नहीं पहुंचे हैं ममता आपा!!

लगातार तीन दिन तक हमारे समाचारपत्रों ने सरडीहा की दुर्घटना पर तो दस बीस लाइनें ही लिखी होंगी लेकिन नक्सलियों पर कई कई पन्ने काले किए। हमारे बड़े पत्रकारों ने अपनी लेखनी का सारा कला कौशल नक्सलियो पर ही खर्च कर दिया। किसी ने लिखा- ‘नक्सलियों ने फिर ढाया कहर’, तो किसी ने लिख डाला- ‘ भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनते जा रहे नक्सलियों ने पं. बंगाल में ट्रेन को निशाना बनाकर 76 मुसाफिरों को मार डाला’। गोया भूख गरीबी अषिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अब भारत के लिए चुनौती रहे ही नहीं बस नक्सली ही रह गए हैं।

वह तो गनीमत है कि कुछ दिन पहले ही एयर इंडिया का विमान मंगलौर में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। कहीं इत्तेफाक से यह दंतेवाड़ा या मिदनापुर में दुर्घटनाग्रस्त हुआ होता तो हमारे मीडिया के धुरंधर इसका इलजाम भी नक्सलियों के सिर रखते। तमाषा यह है कि पूरे मीडिया ने नक्सलियों को दोष मढ़ने में तो कोई देरी नहीं की लेकिन भाकपा माओवादी के मयूरभंज-पूर्वी सिंहभूम बाॅर्डर एरियेा कमेटी के प्रवक्ता मंगल सिंह के इस बयान कि ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के विस्फोट में भाकपा माओवादी का हाथ नहीं हैं ऐसी घटनाओं से आम आदमी के साथ साथ माओवादी संगठन को भी नुकसान होता है ऐसी स्थिति में उनका संगठन ऐसी घटना को क्यों अंजाम देगा, को एक दो अखबारों ने ही कहीं कोने में लगाया। मीडिया के शोर में मंगल सिंह की यह आवाज कि ‘हम आम आदमी के हित में उनके अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करते हैं न कि उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए?’ दबकर रह गई।

सरडीहा दुर्घटना की एफआईआर में नक्सलवादियों का जिक्र न होने पर स्यापा करने वाले हमारे बड़े पत्रकार साथी क्या अपनी असली जिम्मेदारी पर भी ध्यान देंगे????

नो स्टोरी, ओनली यूजलेस फाइट्स इन काइट्स


कहा जा रहा है कि काइट्स की कहानी राकेश रोशन ने आसमान में कुछ पतंगों को उड़ते देख कर मन में लिख ली थी. वह कहानी बहुत अच्छी है लेकिन सौभाग्य से दिक्कत यह है कि वह अच्छी कहानी सिर्फ़ फिल्म के शुरूआती 30 से 40 सेकेण्ड में खत्म हो जाती है और दुर्भाग्य से उसके बाद फिल्म में कहानी नाम की चिड़िया उड़ती ही नहीं . हम यहां मान कर चलते हैं कि किसी भी फिल्म में कहानी ही सबसे महत्वपूर्ण चीज़ होती है बाकी बातें उसके बाद....
फिल्म में चूंकि कहानी है ही नहीं इसलिये हम अबोध दर्शक अन्य चीज़ों पे बातें करेंगे .बातें करेंगे क्योंकि और कुछ नहीं कर सकते। विदेशों में न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबारों और रोटनटोमैटो जैसी बेहतरीन वेबसाइट्स पर फिल्म के लिये जितनी शानदार समीक्षाएं लिखी जा रही हैं, उसमें हम सिर्फ अपनी कम अक्ल का रोना रो सकते हैं या उसे बढ़ाने के लिये रामगोपाल वर्मा की आग या फूंक जैसी टॉनिकनुमा फिल्मों का सहारा ले सकते हैं . इसमें कुछ कर नहीं सकते। फिल्म में कहानी के साथ-साथ अच्छे संगीत की भी ज़बरदस्त गुंजाइश थी जो सिरे से गायब है . राकेश रोशन ऐसे निर्देशक के रूप में जाने जाते रहे हैं जो कम से कम आगे की सीट वाले दर्शकों को भरपूर मनोरंजन देते रहे हैं . उनका इस रूप में भी मूल्याङ्कन किया जाय कि वह मसालेदार और मनोरंजक फिल्में बनाते हैं तो वह पूरी तरह से नाकाम नज़र आते हैं . उनकी पिछली फिल्में क्रिश कोई मिल गया और थोड़ा और पीछे जाएं तो करन अर्जुन अच्छी टाइम पास थी और एक खास तरह का मनोरंजन करने वालों के लिये पूरी तरह से मुफ़ीद थीं। इस फिल्म के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसका टारगेट ऑडियंस कौन है, यह न तो निर्माता को पता है न ही निर्देशक को . यह फिल्म किसके लिये बनायी गई है . फिल्म के एक्शन दृश्यों की बड़ी चर्चा है और वह निसन्देह बहुत सी विदेशी फिल्मों की कॉपी होने के बावजूद अच्छे हैं तो यहां पर यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब फिल्म इंग्लिश और स्पेनिश में है तो राकेश उस महाआम दर्शक को तो टारगेट आडियंस नहीं ही मान रहे हैं जो उनकी कोयला और करन अर्जुन जैसी फिल्मों के एक्शन दृश्यों पर ताली पीटता था तो उनका टारगेट आडियंस विदेशी दर्शक इससे बढ़िया एक्शन दृश्यों के लिये वह क्यों न हॉलीवुड के ही एक्शन दृश्य देखे जहाँ से उठा कर ये दृश्य यहाँ रखे गए हैं. करन अर्जुन में भी एक्शन था लेकिन वह कहानी से इस कदर जुड़ा हुआ था कि जब छत पर छिपे गांव वाले ईंट पत्थर और सामान फेंक कर अमरीश पुरी और अन्य खलनायकों को मारते हैं तो दर्शकों को यह ध्यान भी नहीं आता कि ये स्टंट बहुत आसान हैं और इनके लिये किसी बड़े विदेशी फाइट डायरेक्टर की जरूरत नहीं है . ज़ाहिर है एक्शन भी तभी मजा देता है जब वह कहानी के साथ जुड़ा हो. यहां फिर वही दिक्कत है कि जब कहानी ही नही तो जुड़ाव कैसा...?
सिनेमेटोग्राफी फिल्म का सबसे शानदार पहलू है और कुछ तथाकथित अनछुये लोकेशन फिल्म में बड़े प्यारे लगते हैं और वहां संगीत की बड़ी बढ़िया संभावना बनती थी लेकिन फिल्म की टीम दूसरी इंटरनेशनल चीज़ों में इतनी व्यस्त थी कि इस ओर ध्यान नही नहीं दे पायी और राकेश रोशन कि पिछली फिल्मों की तुलना में इस फिल्म का संगीत पासंग भी नहीं है।
फिल्म के सबसे ज्यादा प्रचारित किये जा रहे पक्ष सबसे कमज़ोर हैं और इसमें सबसे पहली चीज़ है अभिनेता और अभिनेत्री की केमेस्ट्री जो कि बिल्कुल उत्साहजनक नहीं है। असंवेदनशील हत्याओं और सिर्फ भागने और पीछा करने वाली इस फिल्म में अगर कोई गौर करने लायक बात है तो यह कि इतनी बोर करने वाली फिल्म में आप पूरी फिल्म देखने के लिये बैठे कैसे रह जाते हैं . रितिक का अभिनय ? नहीं, उनसे आप हर बार शानदार अभिनय और शानदार नृत्य की उम्मीद लेकर जाते ही हैं . उन्होंने बहुत भावप्रणय और बढ़िया अभिनय किया है और पूरी फिल्म को माइ नेम इज़ खान में जैसे शाहरूख अपने उम्दा अभिनय से उतनी तर्कहीन और बकवास फिल्म को खींच ले जाते हैं, वह भी लेकर चलने की कोशिश करते हैं. लेकिन पूरी फिल्म हॉल में दो सौ की टिकट लेकर जाने के बाद घबराकर भागने की इच्छा होने के बाद भी कोई नहीं भागता तो यह अनुराग बसु का निर्देशन है जो आपको बिठाये रखता है. वह खराब कहानी के बावजूद और बिना कहानी के भी आपकों कुछ देर बिठाने की क्षमता तो रखते ही हैं, यह उन्होंने साया से साबित कर दिया था. अनुराग इस महंगी फिल्म, जो कि बिना किसी ठोस कारण के महंगी है, के असली नायक हैं और गले लगाकर बधाई दिये जाने के हकदार हैं . अभिनय की बात करें तो रितिक के दोस्त की भूमिका में जागो विज्ञापन से चर्चा पाने वाले आनन्द तिवारी ने सबसे सहज और उम्दा अभिनय किया है।

इस फिल्म से एक अच्छी बात हो सकती है कि रितिक की पहुंच अब हॉलीवुड के साथ-साथ स्पेन और अन्य कई देशों के दर्शकों के दिलों पर राज कर सकते हैं। मेरे जैसे कुछ दर्शकों को ज़रूर शुरू से ही लगता रहा है कि रितिक की तैयारी, उनका व्यक्तित्व उनकी सम्पूर्णता और उनका अभिनय भारतीय दर्शकों के लिहाज से कुछ ज्यादा ही है . हम इतने परफेक्ट चीज़ें देखने के आदी नहीं हैं। हमारे लिये ऐसा नायक जो बेटर दैन द बेस्ट है, वह बड़े मार्केट में पहुंचेगा और अन्य देश भी उसकी प्रतिभा से परिचित होंगे। विदेशी पैसे के अलावा पापा रोशन का दूसरा मकसद भी यही रहा होगा .
हां एक बात जो फिल्म देखते वक्त आ रही थी कि यार डब फिल्म को हिन्दी बता कर क्यों दिखवा दिया ? अभी छूटते छूटते एक पत्रकार मित्र ने बताया है कि बिहार के किसी वितरक ने राकेश रोशन ओर बिग पिक्चर्स पर इसी कारण को लेकर केस कर दिया है।
देसी दर्शकों को चूतिया समझते हुये विदेशी माल खींचने की कोशिश करती हुयी एक और दुखी करने वाली फिल्म . किसी विद्वान ने अभी कहा है कि इस फिल्म को देखने से बेहतर है कि आप घर पर कुछ पतंगें लाकर उड़ा लें . यह कहने के बाद मैं पतंगे लेकर छत पर उड़ाने जा रहा हूं . आप भी उड़ा ही लीजिये .

-विमल चन्द्र पाण्डेय

मिर्चपुर का दर्द

खाप पंचायतों के बीस साल पहले के 'बंद' का भय भी अब इन्हें परेशान नहीं करता। ऐसे 'बंद' के दौरान भूपति श्रमिकों का बहिष्कार करते थे। अब दलित ही बहिष्कार करने की हिम्मत दिखा रहे हैं। ऐसे में एक सभ्य कहा जाने वाला समाज आखिर इन चीजों को कब तक बर्दाश्त करता? मिर्चपुर का दलित समाज राजधानी के जंतर-मंतर पर इकट्ठा है ताकि सरकार को अपना दुख-दर्द सुना सके। इनके चौपाल में राजधानी के बुध्दिजीवियों की चहलकदमी भी देखी जा रही है। मिर्चपुर के बहाने दलित फिर अपने अधिकारों के लिए एकजुट होते दिख रहे हैं। वे इस बात को जानते हैं कि वह दिन दूर नहीं, जब गांव में उनके भगवान का मंदिर होगा, जो दबंगों के विरोध के कारण अभी बारिश के थपेडे झेलने को मजबूर हैं
दिल्ली से महज डेढ सौ किलोमीटर की दूरी पर बसा है हरियाणा का मिर्चपुर गांव। बहुसंख्यक आबादी दबंग जाति जाटों की है, करीब दौ सौ घर वाल्मिकी समाज के हैं, जो भारत के दूसरे गांवों की तरह ही गांव के बाहर बसे हैं। इस देश की सामासिक संस्कृति ने विदेशी हमलावरों को तो गले लगाया, लेकिन दलितों को अछूत ही मानता रहा। इस गांव में गरीबी अगर कहीं दिखती है, तो इन दलितों के झोपडियाें में ही। गांव की जोत बहुसंख्यक जाटों के पास है और दूसरे लोग इनकी खेतों में ही खेती-मजूरी कर जिंदगी गुजारते हैं। जाट समुदाय के बच्चे गांव के अंग्रेजीदां स्कूलों में पढते हैं, तो दलितों के बच्चे सरकारी स्कूलों में। गांव में करीब 400 सरकारी शिक्षक हैं, जिनमें 380 के करीब जाट शिक्षक ही हैं। पुलिस विभाग में भी यहां के जाट बिरादरी के लोग भरे-पडे हैं। गांव में सामाजिक विभाजन स्पष्ट रूप से दिखता हैएक तरफ जाट तो दूसरी तरफ दलित एवं पिछडी ज़ातियां। वाल्मिकी समाज के लोग बाबू जी के रहमो-करम पर गुजर-बसर करते हैं, पर गांव के आवारा कुत्ते इस सोशल इंजीनियरिंग से अनभिज्ञ किसी पर भी भौंकने का दुस्साहस करने से बाज नहीं आते। इनका अकारण भौंकना इतने बडे हादसे को जन्म देगा, इसका अंदाजा लोगों को न था।
हुआ यूं कि वाल्मिकी समाज की ओर से गुजर रहे जाट युवकों को देखकर ये भौंकने लगे। इन युवकों को असमय इन कुत्तों का भौंकना रास नहीं आया। आम दिनों की तरह ही मामला गाली-गलौज से होता हुआ मार-पीट तक जाकर रुका। कर्णपाल और वीरभान नामक दलित युवक इनके हमलों में बुरी तरह जख्मी हो गए। मामला यहीं तक होता, तो गनीमत थी। गांव में अशांति को देखते हुए पुलिस की एक टीम आ चुकी थी। लेकिन जाटों का गुस्सा इनकी मार-पिटाई के बाद भी शांत नहीं हुआ था। पुलिस की मौजूदगी में ही 400 के करीब जाट समुदाय के लोगों ने दलितों के घरों को चारों ओर से घेर लिया। दलित भी आत्मरक्षा के लिए घरों की छतों पर चले गए और हमलावर भीड पर ईंट-पत्थर बरसाने लगे। पुलिस ने, जिसमें अधिकांश गांव के जाट परिवार के लोग ही थे, दलितों को बहला-फुसलाकर पंचायत के लिए चौपाल ले आए। जाटों को मौका मिल चुका था और उन्होंने दलितों के घरों को चारों तरफ से घेरकर आग लगा दी। बच्चे एवं महिलाएं चीखने-चिल्लाने लगीं। तब चौपाल में इकट्ठे दलितों को यह समझ में आया कि उनके साथ क्या साजिश रची गई थी। जाट युवक नंग-धडंग़ उन महिलाओं के आगे नाच रहे थे, जो दलित महिलाओं एवं लडक़ियों को अपमानित करने का उनका नायाब नुस्खा था। दलितों के छोटे-छोटे बच्चे और असहाय महिलाएं जलते हुए घरों की चहारदीवारियों में कैद थीं। इन्हीं जलते घरों में एक सोलह साल की विकलांग बच्ची थी सुमन, जो बचकर निकल भागने में असमर्थ थी। जब उसके पिता ताराचंद विकलांग जलती हुई बच्ची को बचाने के लिए दौडे, तो उपद्रवी भीड में से कुछ लोगों ने उन दोनों पर पेट्रोल छिडक़ दिया। कुछ ही समय में तडपते बाप-बेटी ने लोगों के सामने दम तोड दिया। बीस से ऊपर घर धू-धू कर जल रहे थे और उन्हें बुझाने वाला कोई न था।
सत्तारूढ क़ांग्रेस पार्टी इस बात में उलझी रही कि कहीं यह मामला राजनीतिक रंग न ले ले। दलितों के हिमायती कांग्रेस महासचिव एक बार फिर लाव-लश्कर के साथ दलितों के बीच थे। कुछ दिनों पहले ही दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बिल गेटस के साथ चार्टर्ड प्लेन से अमेठी के गांवों के दौरे पर उनका जाना सुर्खियों में रहा था। उनका मकसद जो भी रहा हो, लेकिन मिर्चपुर की यात्रा के कई दिन बाद भी दलितों में आक्रोश है और प्रशासन इस मामले को रफा-दफा करने में लगा है। खाप पंचायतों ने अपने स्वभाव के अनुकूल आस-पास के गांवों में फरमान जारी कर दिया है कि कोई भी गांव इन्हें अपने यहां शरण नहीं देगा। दरअसल इस विवाद की जड में जाएं तो वहां भी इन पंचायतों का खौफ ही नजर आता है। अस्सी के दशक में खाप पंचायत ने एक जाट परिवार का हुक्का-पानी बंद करवा दिया था। इसकी अनदेखी करते हुए दलितों ने उस परिवार के फंक्शन में जाकर बैंड बजाने की हिमाकत की थी। यह एक तरह से सशक्त जाट समाज को चुनौती थी, जिसे वह आज तक नहीं भूल सका है। इसके पहले भी दबंग जाति के लोगों ने सांसियों एवं चमारों को मार-पीट कर इस गांव से भगा दिया था। सामंती व्यवस्था के टूटने से तिलमिलाया यह वर्ग अब गांव में दलितों-पिछडों की मौजूदगी को बर्दाश्त नहीं करना चाहता। दलित अब खेतों में काम नहीं करते, साफ-सफाई नहीं करते, मैला नहीं ढोते। अब युवा दलित दकियानूसी सामंती विचारों को ठुकराकर शहरों में मजदूरी करना ज्यादा पसंद करता है। बचे लोग नरेगा के तहत गांव में रोजगार कर रहे हैं, ऐसे में बाबू जी का यह आधार तो टूटना ही था। अब वे बराबरी की मांग करने लगे हैं। गुपचुप तरीके से अपने हक की बात करते हैं। खाप पंचायतों में जहां दबंग जातियों का दबदबा है, में शामिल किए जाने की मांग करने लगे हैं। खाप पंचायतें के बीस साल पहले के 'बंद' का भय भी अब इन्हें परेशान नहीं करता। ऐसे 'बंद' के दौरान भूपति श्रमिकों का बहिष्कार करते थे। अब दलित ही बहिष्कार करने की हिम्मत दिखा रहे हैं। ऐसे में एक सभ्य कहा जाने वाला समाज आखिर इन चीजों को कब तक बर्दाश्त करता?
मिर्चपुर का दलित समाज राजधानी के जंतर-मंतर पर इकट्ठा है ताकि सरकार को अपना दुख-दर्द सुना सके। इनके चौपाल में राजधानी के बुध्दिजीवियों की चहलकदमी भी देखी जा रही है। मिर्चपुर के बहाने दलित फिर अपने अधिकारों के लिए एकजुट होते दिख रहे हैं। वे इस बात को जानते हैं कि वह दिन दूर नहीं, जब गांव में उनके भगवान का मंदिर होगा, जो दबंगों के विरोध के कारण अभी बारिश के थपेडे झेलने को मजबूर हैं। गौरतलब है कि गांव के शिव मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित है। डर है कि कहीं दलित समुदाय हिंदुओं के भगवान को ठुकरा अपने भगवान न गढ लें। ऐसा ही कुछ साल पहले साउथ अफ्रीका के कांगो में हुआ। अश्वेतों को बताया गया था कि भगवान श्वेत हैं और स्वर्ग में केवल श्वेत लोग ही जा सकते हैं। अश्वेतों ने अपना अलग चर्च बनाया, जिसमें अश्वेत भगवान की पूजा होने लगी और देखते-देखते इस चर्च के अनुयायियों की संख्या डेढ क़रोड पार कर चुकी है। दलितों पर आए दिन हो रहे अत्याचारों के खबरें भी राष्ट्रीय अखबारों में जगह बनाने में सफल रही हैं। कभी अंबाला में दलित दुल्हे को घोडे से उतार अपमानित किया जाता है, तो कभी तमिलनाडु में दलितों को अपमानित करने के लिए मुंह में विष्ठा भर दिया जाता है। कहीं दलित महिलाओं को नंगा कर गांव में घुमाया जाता है, तो कहीं खेत में काम करने गई दलित महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है। ऐसी कई घटनाएं हैं, जो हमें अब चौंकाती नहीं, हमारे संवेदनाओं को नहीं झकझोरती। लेकिन एक समुदाय है जो इन खबरों पर पैनी नजर रखता है और हर ऐसी घटना के बाद जार-जार रोता है। कहीं न कहीं मानवता के प्रति उसका सदियों का भ्रम जो टुकडे-टुकडे होकर बिखरता है।
जिस देश के इतिहास पर हम फूले नहीं समाते, उसी ने इन दलितों के गले में नगाडा बांधा था, ताकि सडक़ों पर इस बात की डुगडुगी बजाते चलें कि वे अछूत हैं और हमारा भद्र समाज इनसे दूरी बना सके। अपने गौरव ग्रंथों में हम आर्य विजेताओं को आज भी सम्मान देते हैं, जिन्होंने अनार्य कहे जाने वाले दलितों, आदिवासियों को उनके जमीन से उजाडा। रक्त शुध्दता बरकरार रखने के लिए समाज में मनुवादी ढांचा खडा किया। दलित वर्ग की इस पीढी क़ो अपने समाज और संस्कृति का ज्ञान होने पर निराशा ही हाथ लगती है, वह अपने इतिहास पर बौखलाता है और गैर दलितों के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करता है। मायावती लाख कडक़डिया नोटों की माला पहने, वह उन्हें जातिगत स्वाभिमान से जोडक़र देखता है। दलितों में लोकतंत्र की बढती चेतना से राजनीतिक पार्टियां बौखला गई हैं। तभी तो कभी कलावती, कभी शशिकला, तो कभी किसी और दलित महिला के यहां भोज का आयोजन होता है, तो अगली रात पंचसितारा होटलों के स्वादिष्ट व्यंजनों का रसास्वादन करते बीतती हैं।
दलित वर्ग आक्रोशित है। राहत के नाम पर मिर्चपुर के दलितों को दो बोरी गेंहू दी गई है। पिछले दिनों खाप पंचायतें एकतरफा समझौते करते हुए दलितों के साथ भाईचारापूर्वक गांव में रहने को तैयार हुए हैं। लेकिन दलित समुदाय इस कांड के दोषियों के लिए सजा की मांग कर रहा है। दलितों ने इस कांड में जान गंवाने वाले बाप-बेटी के अंतिम संस्कार से भी इंकार कर दिया है। सरकार चुप्पी साधे है। एक जागृत समाज में ऐसी बर्बर कार्रवाई करने का हौसला लोगों को कहां से मिलता है। जातीय उन्माद की स्थिति में सरकार और तंत्र इतने पंगु, असहाय क्यों हो जाते हैं, सोचने वाली बात तो यही है।

मगर उनका कहना.....

मुक्तक

किसी की तरक़्क़ी विरासत से होती॥

किसी की तरक़्क़ी सियासत से होती।

मगर उनका कहना हमारी तरक़्क़ी-

पुलिस महकमे में हिरासत से होती॥

                                                                                    -डॉ० डंडा लखनवी

हमार लल्ला कैसे पढ़ी ...................

रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ और शिक्षा हमारी मूलभूत आवश्यकताएं हैं। शिक्षा के सहारे अन्य आवश्यकताओं की पूर्ती हो सकती है परन्तु उस पर भी माफियाओं का कब्ज़ा होता जा रहा है। शिक्षा से वंचित रख कर किसी नागरिक को आजाद होने का सपना दिखाना बेइमानी है। इस सत्य को अनपढ़ औरत भी समझती .....उसका दर्द प्रस्तुत लोकगीत में फूटा है।

                          लोक गीत 
                                     
                                      -डॉ0 डंडा लखनवी

बहिनी!  हमतौ  बड़ी  हैं  मजबूर,  हमार  लल्ला  कैसे पढ़ी ?
मोरा   बलमा  देहड़िया  मंजूर,  हमार  लल्ला   कैसे पढ़ी ??

शिक्षा  से    जन   देव   बनत  है,   बिन   शिक्षा    चौपाया,
शिक्षा   से   सब  चकाचौंध  है,   शिक्षा   की   सब    माया,
शिक्षा  होइगै   है   बिरवा खजूर, हमार   लल्ला कैसे पढ़ी ??

विद्यालन     मा   बने      प्रबंधक    विद्या     के    व्यापारी,
अविभावक    का  खून     निचोड़ै,    जेब   काट  लें   सारी,
बहिनी  मर्ज़   ये बना है  नासूर, हमार  लल्ला   कैसे पढ़ी ??

विद्यालय    जब   बना   तो   बलमू    ढ़ोइन   ईटा  - गारा,
अब   वहिके    भीतर   कौंधत   है    होटलन   केर नजारा,
बैठे   पहिरे  पे   मोटके   लंगूर, हमार  लल्ला   कैसे   पढ़ी ??

बस्ता    और   किताबै   लाएन  बेचि    कै   चूड़ी  -  लच्छा,
बरतन - भांडा   बेचि  के लायेन,  दुइ  कमीज़   दुइ  कच्छा,
फिर हूं शिक्षा  का  छींका  बड़ी  दूर, हमार  लल्ला  कैसे पढ़ी ??

सरकारी    दफ्तर    के     समहे    खड़े   -    खड़े   गोहराई,
हमरे   बच्चन    के    बचपन      का    काटै    परे   कसाई,
कोऊ   उनका   सिखाय  दे  शुऊर,  हमार  लल्ला  कैसे  पढ़ी ??