Visit blogadda.com to discover Indian blogs कठफोड़वा: June 2010

लडने वाला समाज अपनी भाषा भी गढ़ता चलता है- अनामिका


जब कोई समाज युध्दरत होता है, तो वह उसकी अस्मिता की लडाई होती है। उसकी भाषा में संघर्ष की चेतना होती है, एक तरह का ओज होता है। चाहे तो आप अफ्रीकी समाज की भाषा ही देख लें। वहां की बोली जानेवाली अंग्रेजी और ब्रिटिश अंग्रेजी या क्विन्स अंग्रेजी कह लें, में अंतर मिल जाएगा

कविता की ओर झुकाव आपने कब महसूस किया? घर के परिवेश का क्या असर आप महसूस करती हैं?
बचपन में पिताजी के साथ अंत्याक्षरी खेलती थी। पिताजी हमेशा मुझे हरा देते थे। मैं भी हार से बचने के लिए कुछ जोर-आजमाईश करने लगी थी। पिताजी ने भी लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। नई डायरी लाई गई और खेल-खेल में ही कविता शुरू हो गई।

बाल्यावस्था का दौर काफी राजनीतिक रूप से उथल-पुथल भरा रहा होगा। आपातकाल, जयप्रकाश नारायण और लोहिया का दौर था वह। क्या उस राजनीतिक माहौल का भी कुछ असर रहा?
वो समय ही कुछ और था। पडाेस के बच्चे भी क्रांतिकारी बन स्कूल-कॉलेज छोडक़र आंदोलन में कूद पडे थे। ऐसा लगता था मानो दूसरा स्वतंत्रता-संग्राम लडा जा रहा हो। जगह-जगह लोग सरकार के विरोध में नारे लगाते थे। उसमें ज्यादातर हमारी उम्र के बच्चे ही होते थे। घर में भी भाई इस आंदोलन में बढ-चढक़र भाग ले रहे थे। जेल जाने वालों में भी वे आगे रहते थे। मुजप्फरपुर में एक बार जेपी आए थे, तो उन्होंने मंच से रामायण की एक पंक्ति कही थी-अब लौं नसानि, अब न नसैंहों। यानी कि अब तक तो बर्दाश्त कर लिया, आगे नहीं करेंगे। इस पंक्ति का आंदोलन में कुछ अलग ही राजनीतिक अर्थ निकाला गया। जेपी के दिए भाषण को मैं आजतक भूल नहीं पाई हूं। लेकिन इस आंदोलन का सच भी लोगों के सामने आ गया। जैसा कि हरेक आंदोलन में होता है, ऊपर के लोग तो आंदोलन का लाभ उठा लेते हैं, लेकिन जो आंदोलन का झंडा उठानेवाले लोग होते हैं, वे कहीं पीछे छूट जाते हैं। मैंने देखा कि जिन बच्चों ने आंदोलन के दौरान स्कूल-कॉलेज छोडे, ज़ेल भी गए, आज बेरोजगारी की त्रासदी झेलने को विवश हैं। मैंने आंदोलन में शरीक ऐसे लोगों की जिंदगी को गहरे से महसूस किया और 'सारिका' में इनकी व्यथा पर एक कहानी भी लिखी। जैसे एक पौधे को उखाडक़र, दूसरी जगह बो देंगे, तब भी वह जड पकड लेता है। वही टेक्निक कुछ-कुछ रचनाओं के क्षेत्र में भी होती है। एक संदर्भ से दूसरे संदर्भ जुडते चले जाते हैं और वे अपने आप आपकी रचनाओं में आकार ले लेते हैं। लोक घटना, लोक कहावतों और मुहावरों को रचनाओं में पुनर्रोपित करने का भी अपने ढंग से प्रयास किया।

बचपन की कोई घटना जिसे आज तक भूल नहीं पाई हों।
स्कूल के दिनों में एक खूबसूरत सी लडक़ी पढती थी। किसी से बात नहीं करती, बस अपने में खोई रहती। सहपाठियों को ऐसा लगने लगा था कि वह स्वभाव से घमंडी है। पता चला कि उसकी मां नर्तकी है। बाजार से जब गुजरती थी, तो एक ऐसी जगह थी, जहां केवल महिलाएं ही दिखती थी। घर के बाहर नेमप्लेट पर केवल महिलाओं का ही नाम लिखा होता था। हारमोनियम-तबले और घुंघरू की सुमधुर आवाज बाहर आती रहती थी। बचपन में कुछ समझ तो थी नहीं, मुझे लगता था कि यह कलाकारों की कोई बस्ती है। एक दिन जब मैं यों ही वहां से गुजर रही थी, तो मैंने उस बस्ती में स्कूल की खूबसूरत लडक़ी को खडे देखा। संयोग से मेरी आंखें उससे मिल गई। उसके आंखों में जो पीडा मैंने देखी, वो कभी भूल नहीं पाई। लेकिन इसके बाद की एक घटना ने मेरी सोच को ही बदल दिया। उसी दिन से उस मासूम बच्ची ने स्कूल आना छोड दिया। वो कभी दिखी भी नहीं। बाद में जब मैंने उसके बारे में जानने का प्रयास किया, तो पता चला कि उसकी शादी हो गई और वह कहीं शहर से दूर चली गई। उन मासूम आंखों की पीडा मेरी जिंदगी का हमसफर बन गई। आज भी वेश्याओं के बच्चों को देखती हूं, तो दिल मायूस हो जाता है।

आप कविता में प्रवेश कैसे करती हैं? लिखने की शुरूआत कैसे होती है?
जब आप शांति से बैठे होते हैं, तो बहुत सी असंबध्द चीजें यादों में उभर कर आती हैं। समाज में, घर-परिवार में, हर जगह दुख, अभाव, पीडा का भाव तो टपकता ही रहता है। आस-पास के जीवन का कोई टुकडा, बस में चलते हुए, कुछ पढा हुआ या बात करते हुए बच्चों को देखकर भी कभी-कभी कविता अपना आकार लेने लगती है। जैसे बचपन में घर-आंगन में सेमल की रूई उडती आती थी और उसे पकडने सभी बच्चे दौड पडते थे। वैसे ही कविता का एक सिरा पकड में आ गया, तो फिर कविता बनते देर नहीं लगती। कभी एक पंक्ति बनी, तो बाकी का आह्वान करना पडता है। कुछ ऐसे ही जैसे गांव में महिलाएं आटा गूंथकर छोड देती हैं, तो रोटी का मजा ही कुछ और हो जाता है। कुछ ऐसा ही कविताओं के साथ भी होता है।

स्थानीयता आपकी कविता की धरोहर हैं। क्या आप ऐसा महसूस करती हैं कि राजधानी में यह कहीं खो-सी गई है?
जो जिंदगी आप नहीं जी पाते, वही कविता के रूप में जीने का प्रयास करते हैं। बचपन के जो दस-पंद्रह साल होते हैं, वही जिंदगी को स्थाई भाव देते हैं और आपमें भाषा का संस्कार भी गढते हैं। जैसे आप सफर पर निकले हों और मां ने एक पोटली में बांधकर चूडा, चना-चबेना, सत्तू और अचार दिया हो तो हंसते-खेलते सफर आसानी से कट जाता है।
लोकसंदर्भ, लोककथाएं और अपने जीवन की कथाएं भी जिंदगी भर के लिए साथ नहीं छोडती। जब आप मशाल जलाते हैं, तो कतारबध्द दीयों को जलाते चलते हैं और वही ज्योति दूर तक चली जाती है। कविता में भी कुछ ऐसा ही मसलसल सिलसिला चलता रहता है और कविता अपने रूप में बनी रहती है। यही कारण है कि राजधानी की भाग-दौड में भी मैं अपनी कविता के माध्यम से स्थानीयता को ही जी रही होती हूं।

आपने कभी कहा था कि मनोवैज्ञानिक युध्द में भाषा हथियार का काम करती है। जिसको भी हाशिए पर धकेल दिया जाता है, उसकी भाषा ओजपूर्ण रूप ले लेती है। तो क्या एक लडता हुआ समाज अपनी भाषा भी आंदोलन के साथ-साथ गढता चलता है?
जब कोई समाज युध्दरत होता है, तो वह उसकी अस्मिता की लडाई होती है। उसकी भाषा में संघर्ष की चेतना होती है, एक तरह का ओज होता है। चाहे तो आप अफ्रीकी समाज की भाषा ही देख लें। वहां की बोली जानेवाली अंग्रेजी और ब्रिटिश अंग्रेजी या क्विन्स अंग्रेजी कह लें, में अंतर मिल जाएगा। ब्रिटिश अंग्रेजी में औपनिवेशिक संस्कार दिखेंगे, जबकि एशिया, अफ्रीकी, जर्मन, पोलैंड या एशिया की भाषा, जो संघर्षशील जनों की भाषा है, में एक तरह के विरोध का भाव दिखता है, आक्रोश दिखता है, वहां शिष्टता का ज्यादा ख्याल नहीं किया जाता।

हे परमपिताओं, परमपुरूषों, बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो। ये आपकी कविता में किस तरह की बेचैनी है, छटपटाहट है आजादी की?
इस कविता में नए तरह के पुरूष गढने की कल्पना की गई है। पुरुष में जो पूर्वग्रह हैं, अहंकार हैं- चाहे वे जाति, लिंग, संप्रदाय या किसी और सोच को लेकर हों-उसे बदलने की जरूरत है। ईसा मसीह हंसते-हंसते सूली पर चढ ग़ए थे, उन्होंने कहा-'हे ईश्वर इन्हें माफ करना,ये नहीं जानते कि ये क्या करने जा रहे हैं।' जब कोई औरत अपने जख्म दिखाती है, तभी पुरुष को इसका भास होता है। अगर ये नहीं जानते कि वे भूलवश क्या कर रहे हैं तो मैं कहूंगी कि वे जानें कि वे क्या कर रहे हैं? स्त्री शरीर ही नहीं आत्मा भी गढती है। पुरुष ही कहीं भाई है, पिता है, मित्र है, बुरे वे नहीं, बल्कि वह सोच है जो सदियों से स्त्रियों का शोषण करती रही है। आज का पढा-लिखा पुरुष कल के मर्दवादी सोच से कहीं अलग है।

'राम की शक्ति पूजा' के लेखक निराला ने 'गर्म पकौडी' क़ी रचना कर कविता के आतंक को मिटाकर आमलोगों को भी कविता-लेखन से जोडा। नई कविता छंद-मुक्त हुई। क्या इस चलन को आप सही मानती हैं?
देखिए, कविता में किसी प्रकार का आग्रह नहीं होना चाहिए। छंद तो कविता में आते-जाते रहते हैं। हमारे यहां कविता का एक रूप लोकगीतों के रूप में भी देखने को मिलता है जो विवाह या किसी उत्सव के अवसर पर गाए जाते रहे हैं। 'आग लगी झोपडिया में, हम गावईं मल्हार' तो गेयता में एक तरह का सेलिब्रेशन भी होता है। हमारे यहां तो सबकुछ एक साथ रहा है। बाबा नागार्जुन ने भी तो कहा है-'लय करो ठीक फिर फिर गुनगुनाओ, मत करो परवाह-क्या है कहना, कैसे कहोगे, इस पर ध्यान रहे, चुस्त हो सेंटेंस, दुरूस्त हो कडियां, पके इतमीनान से गीत की बडियां।' कहीं छंद-मुक्त तो कहीं छंद भी। कविता तो अंतरंगता की भाषा है, मेल-जोल की भाषा- आदेशात्मक स्वर में तो कविता नहीं हो सकती ना। फिर वहां राग नहीं रहेगा और राग नहीं हो, तो कविता गेय भी नहीं रह जाती। लोक गीत संस्कार में रचे-बसे हों, तो कविता में गेयता बनी रहेगी।

क्या आप ऐसा महसूस करती हैं कि कविता समकालीन परिवेश से कट सी गई है? यही कारण है कि कविता लोगों से दूर होती चली गई।
जीवन के दुख-दर्द कविता में शामिल हैं। हां, व्यस्तता के कारण लोगों के पास समय नहीं रहा फिर इतने बडे देश में शिक्षा भी कितने लोगों के पास है? कवि कहने से किसी को भी लगता है कि अपना व्यक्ति होगा, हमारे हित की बात करेगा, खिलाफ नहीं जाएगा। कोई भी आदमी विश्वास की नजरों से आपको देखेगा, तो यही अपनापन ही तो एक कवि की धरोहर है।

लेकिन कुछ लोग तो कविता के मौत की भी घोषणा करने लगे हैं। धर्मवीर भारती ने भी एक बार ऐसे लोगों को ललकारते हुए कहा था-'कौन कहता है कि कविता मर गई।' आप क्या सोचती हैं इसके बारे में।
'हम न मरें, मरिहैं संसारा।' आप बताएं, कविता कहां नहीं है? आप हंसकर किसी को सडक़ पार करा दें, वहीं कविता है। जब तक मनुष्यता में विश्वास है, धरती पर हरियाली है, संवेदनशीलता जीवित है, कविता बनी रहेगी। सिर्फ जो लिखी जाए, वही कविता नहीं है। कविता वह भी है जो महसूस की जाती है। जब तक लोगों में उम्मीद की किरण, प्रेम का भाव जिंदा है, कविता मर ही नहीं सकती। आए दिन हम किसी न किसी चीज की मौत की घोषणा करते रहते हैं। नदी बहती रहती है, आप तो आते-जाते रहेंगे। ऐसा ही कविता के प्रवाह के साथ भी है। आप आए दिन की जिंदगी में भी कविता को ही जी रहे हैं। कविता तो संबंधों की भाषा है। नामी-गिरामी कंपनियां भी जीवन की कविता को ही मार्केटिंग के जरिए भुनाती हैं।

आजकल रचनाएं कालजयी क्यों नहीं होती?
रचनाएं तो चरैवेति, चरैवेति अपना सफर तय करती हैं। समय तय करता है कि क्या ढह गया और क्या बचा रह गया? समकालीन रचनाओं को आप कैसे तय कर सकते हैं कि वे कालजयी हैं या नहीं। ये तो 50 साल बाद ही पता चलेगा ना।
हमसे बात करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

असली गांधी तो दक्षिण अफ्रीका में मिले


हासिम सीदास ने बताया कि देखिए, गांधी को तो हम लोगों ने तराशा है। जब वे भारत से यहां आए थे, तो एक अनगढ हीरे की तरह थे। हमने दुनिया को गांधी नाम का सबसे बडा हीरा दिया है। असली गांधी तो यहां हैं। अगर तुम्हें लिखना ही है, तो यहां के गांधी पर लिखो-
साक्षात्कार
गांधी पर लिखने का विचार कहां से आया? आपने अपने उपन्यास 'पहला गिरमिटिया' में भारत के गांधी से ज्यादा दक्षिण अफ्रीका के गांधी को महत्व दिया है? इसके पीछे क्या वजह रही होगी?
मैंने 1947 में गांधी को देखा था। हताश, निराश गांधी को, जो देश के विभाजन से दुखी थे। हुआ यूं कि गांधी जी दिल्ली से हरिद्वार जा रहे थे। मैं उस समय छठी कक्षा में पढ रहा था। स्कूल में अध्यापक महोदय ने कहा कि चलो, आज तुम लोगों को गांधी का दर्शन करवाते हैं। हम लोग लाइन लगाकर सडक़ के किनारे गांधी के इंतजार में खडे थे। उस समय तक गांधी के बारे में बस इतनी जानकारी थी कि उन्होंने हमें आजादी दिलाई है। लेकिन देखने की ललक थी। एक कार तेजी से गुजरी। पता चला कि वो महिला मीरा बेन थी। बाद में गांधी एक बस से आए। संयोग ऐसा था कि गांधी जिस खिडक़ी के पास से बाहर झांक रहे थे, वो मेरे सामने ही थी। बापू नीचे हमारी ओर ही देख रहे थे। बापू की वो तस्वीर, वो आवाज आज भी हमारे दिल में रिकाडर्ेड है। गांधी को सुस्त, उदास देखकर मन उदास हो गया था। विभाजन के बाद देश की राजनीति में बापू को लोगों ने अप्रासंगिक बना दिया था। मामा आचार्य जुगल किशोर गांधी के निकट रहे हैं। उनसे भी बापू के बारे में बहुत कुछ जाना-समझा। गांधी मेरी जिंदगी में ऐसे व्यक्ति थे, जो हमेशा अपनी ओर आकर्षित करते रहे। इस किताब को लिखने में मुझे आठ साल लगे। जब मैं दक्षिण अफ्रीका गया, तो वहां हासिम सीदास नाम के एक व्यक्ति ने बताया कि देखिए, गांधी को तो हमने तराशा है। जब वे भारत से यहां आए थे, तो एक अनगढ हीरे की तरह ही थे। हमने दुनिया को गांधी नाम का सबसे बडा हीरा दिया है। तब असली गांधी तो यहां हैं। अगर तुम्हें लिखना ही है, तो यहां के गांधी पर लिखो। देश-विदेश भटकते हुए मैंने गांधी के बारे में जानकारियां बटोरी और तब पहला गिरमिटिया लोगों के सामने आया।
आईआईटी कानपुर के परिवेश की क्या भूमिका रही इस उपन्यास-लेखन में?
हिन्दी का होने की वजह से लोग शुरू से ही मुझे नापसंद करते थे। वहां का माहौल ही अंग्रेजियत भरा था। वहां की अमरीकन फैकल्टी मुझे बार-बार परेशान करती रही। कभी सस्पेंड किया, तो कभी कुछ और। ऐसे समय में मुझे बापू की दक्षिण अफ्रीका की पीडा याद आती थी, जब उन्हें वहां उपेक्षित, प्रताडित किया जा रहा था। वहां के परिवेश और संघर्ष में मुझे गांधी का प्रतिबिंब ही दिखा, जिसने मेरी रचना को निखारने के लिए अंर्तदृष्टि दी।
एक बार आपने मुलायम सिंह यादव के बारे में कहा था, 'एक बार मैंने चंदन का वृक्ष देखा तो मुझे सांप याद आया। लेकिन आज मुझे सचमुच का चंदन का वृक्ष याद आया।' तो क्या आज भी आप इन बातों को मानते हैं?
स्व. मित्र जनेश्वर मिश्र ने मुलायम सिंह से मिलवाया था। उस समय मुझे पैसे की जरूरत थी। उन्होंने मुझे 75 हजार रुपए दिए जिसके कारण मैं दक्षिण अफ्रीका जा सका, नहीं तो इस किताब के आकार लेने में काफी मुश्किलें आती। जनेश्वर मिश्र के जन्मदिन के अवसर पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया था, जिसमें अध्यक्षीय भाषण देते हुए मैंने समाजवादियों की खूब खबर ली थी। समाजवादी धीरे-धीरे सामान्य जनों से दूर ग्लैमर की दुनिया में खोते जा रहे थे। जनता के बीच पकड दूर होती चली गई थी। मेरे जैसे लोग भी मुलायम सिंह से नहीं मिल पाते थे। सिक्यूरिटी वाले इधर का उधर दौडाते रहते थे। मुझे बडा अफसोस होता था कि गांधी के देश में यह कैसी स्थिति है कि नेता लोगों से मिलना तो दूर, सुरक्षा के घेरे में चलने में ही अपनी शान समझते हैं।
लोहिया जी हमेशा आपको लिखने के लिए प्रेरित करते रहे। उनका क्या प्रभाव मानते हैं अपनी रचनाओं पर?
इलाहाबाद के कॉफी हाउस में मैं अक्सर जाता रहता था। लोहिया जी भी वहां पर आते थे। वे हमेशा पूछते थे-क्या कर रहे हो? क्या लिख-पढ रहे हो? वे अक्सर समझाते हुए कहते थे कि जैसे हमारे लिए राजनीति जरूरी है, उसी तरह साहित्यकारों के लिए लिखते-पढते रहना जरूरी है। जैसे मैं राजनीति में किसी से नहीं डरता, उसी तरह तुम भी निडर होकर खूब लिखो। ये सब बातें आज भी जब कलम उठाता हूं, याद आती हैं।
बाजार जब अपना प्रभाव बढाती है तो खुद की भाषा भी गढती चलती है, क्या आप इससे सहमत हैं?
यह एक दुखद घटना है। हमारे देश में जो भी भाषा रही, वो राजा-महाराजों की भाषा रही या उनके माध्यम से होकर आई। बाजार अपने साथ एक सभ्यता भी लेकर आती है। गांधी ने इसे ही शैतानी सभ्यता कहा है। आप कल्पना करें कि भारत के गांव में जैसे कोई यूरोपियन महिला चली आए, कुछ ऐसा ही दुर्भाग्य रहा हिंदुस्तान में कि राजा की भाषा यहां चली आई। गांधी ने देश के हरेक गांव को समृध्द और आत्मनिर्भर बनाना चाहा। लेकिन नेहरू इस बात को मानने को तैयार नहीं थे। वे कहते थे कि मैं नहीं मानता कि गांव में कोई उजाला है। गांव तो अंधेरे में डूबा है, फिर वे क्या रास्ता दिखलाएंगे। अगर नेहरू ने गांधी की बात मान ली होती, तो कई समस्याएं जो आज विकराल रूप लेती जा रही हैं, नहीं होती। इसी में भाषा की समस्या भी शामिल है। देशी एवं ग्रामीण बाजार से स्थानीय भाषा का ही भला होना था।
आपके उपन्यास में एक जगह एक छात्र के आत्महत्या की बात आई है। ऐसा ही संदेश थ्री इडियटस फिल्म के माध्यम से भी दिया गया। क्या आप इसमें कुछ समानता पाते हैं?
नहीं, बात ही दूसरी है। मेरे उपन्यास में परीक्षा के तनाव की चर्चा नहीं है। इसमें दलितों के दाखिले को लेकर आईआईटी कैंपस में किस तरह लोग सोचते हैं, इसको लेकर है। दरअसल आईआईटी कानपुर में मेरी लडाई की शुरुआत भी यहीं से हुई। उस समय मैं वहां पर रजिस्ट्रार था। वहां दलित छात्रों को बहुत अपमानित किया जाता था। जिस लडक़े ने आत्महत्या की थी, वो अन्य छात्रों की तरह ही कंपटीशन पास कर आया था। स्वभाव से विद्रोही था, किसी की नहीं सुनने वाला। पता नहीं क्या हुआ, कि इनके तनावों से उबकर एक दिन उसने आत्महत्या कर ली। इंक्वायरी हुई। लेकिन देश में जैसा दूसरे तरह के जांच का नतीजा होता है, वही यहां भी हुआ। आठ-दस साल बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है।
पहला गिरमिटिया और आज के मॉडर्न गिरमिटिया में आप क्या अंतर पाते हैं?
पहले गिरमिटिया को दस पाउंड मिलता था सालाना। जबकि आज के लोग लाखों डॉलर लेते हैं। पता नहीं इनका देश के प्रति क्या कमिटमेंट है, लेकिन यहां रह गए मां-बाप को पैसे भेजकर ये अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। गिरमिटिया समाज को दक्षिण अफ्रीका से निकाला जा रहा था, जिसकी लडाई बीस सालों तक गांधी ने लडी। अाज ओबामा भारतीय, चीनी छात्रों का भय दिखाकर अमरीका में यही करने जा रहे हैं। आईआईटी फैकल्टी की शिक्षा पध्दति भी अमरीका-केंद्रित है। वहां के सिलेबस और उदाहरण देकर छात्रों को पढाया जा रहा है। फिर तो वे धन कमाने की मशीन ही बनेंगे, अच्छे नागरिक, सुपुत्र नहीं। पहला गिरमिटिया जब यहां से गया था, तो अपने साथ रामायण का गुटका, माला और गंगा जल लेकर रोजी-रोटी के लिए वहां गया था। वे चाहे हिंदू थे, मुसलमान, तमिल या पारसी। लेकिन आज के गिरमिटिया तो सब कुछ यहीं छोडक़र जाते हैं, भारतीयता को भी और वहां से अंग्रेजियत लेकर आते हैं। हमारे समाज में मजदूर 100 रुपए भी कमाता है, तो 5 रुपए बचा लेता है। जबकि वहां सबकुछ वीजा कार्ड पर चलता है। अमरीकन दिवालिएपन का कारण यही वीजा कार्ड ही रहा, जिसने कर्ज लेकर लोगों को मकान, गाडी ख़रीदना सीखाया।
एक अंतिम सवाल, कवि भवानी सिंह ने एक बार साक्षात्कार के दौरान कहा था कि 'मुरारजी भाई की ऐसी की तैसी, गांधी से लोगों का काम हल नहीं होगा, तो मार्क्स तक जाने में उन्हें कोई रोक नहीं पाएगा।' क्या आप इससे सहमत हैं?
जहां तक मार्क्स की बात है, उनका सिध्दांत बहुत ही उपयोगी है। लेकिन भारत में स्थितियां दूसरी रही। यहां मजदूर से ज्यादा किसानों की हालत खराब थी। कम्यूनिस्ट भाई तो केवल मजदूरों की बात करते थे। गांधी ही थे जिन्होंने मजदूरों, किसानों को एकजुट किया। मार्क्स आज सब जगह से बाहर किए जा रहे हैं। पार्टी वर्कर भी जनता से कट रहे हैं, ऐश कर रहे हैं। आजादी के समय पुराने मार्क्सवादियों में कुछ लोग ही थे जो इसे कैपिटलिस्ट की लडाई न मान सीधे आंदोलन में शरीक हुए। जब तक गरीब, संघर्षशील लोग रहेंगे, गांधी लोगों को रास्ता दिखाते रहेंगे। आज दुनिया के लोग गांधी को स्वीकार कर रहे हैं। आज के मार्क्सवादी तो जनता की राजनीति से ही कट गए हैं। एक बात तो तय है कि नेताओं को देश के लोगों से जुडना होगा, चाहे आप गांधी, मार्क्स, गोलवलकर को स्वीकार करें या नहीं।

हमसे बातचीत करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

(साहित्यकार गिरिराज किशोर से चंदन राय की बातचीत)

लो क सं घ र्ष !: अपसंस्कृति


दुनिया की आप़ा धापी में शामिल लोग
भूल चुके है अलाव की संस्कृति
नहीं रहा अब बुजुर्गों की मर्यादा का ख्याल
उलझे धागे की तरह नहीं सुलझाई जाती समस्याएं
संस्कृति , संस्कार ,परम्पराओं की मिठास को
मुंह चिढाने लगी हैं अपसंस्कृति की आधुनिक बालाएं
अब वसंत कहाँ ?
कहां ग़ुम हो गयीं खुशबू भरी जीवन की मादकता
उजड़ते गावं -दरकते शहर के बीच
उग आई हैं चौपालों की जगह चट्टियां
जहाँ की जाती ही व्यूह रचना
थिरकती हैं षड्यंत्रों की बारूद
फेकें जाते हैं सियासत के पासे
भभक उठती हैं दारू की गंध -और हवाओं में तैरने लगती हैं युवा पीढ़ी
गूँज उठती हैं पिस्टल और बम की डरावनी आवाज़
सहमी-सहमी उदासी पसर जाती हैं
गावं की गलियों ,खलिहानों और खेतों की छाती पर
यह अपसंस्कृति का समय हैं |

-सुनील दत्ता
मोबाइल- 09415370672

यह निवेश किस काम का...




इस देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि वही यूनियन कार्बाइड, जो भोपाल के लोगों का सबसे बडा गुनहगार है, धड़ल्ले से गुजरात में कारोबार कर रहा है। अगर इस कंपनी के गुनाहों को धोना है तो एंडरसन का इस देश में प्रत्यर्पण कराने के बाद देश के कटघरे में खडा करना होगा। जनता को यह भी ध्यान रखना होगा कि फिर कोई जस्टिस अहमदी इनकी मौत को अदालत में कम आंकने की तिकडम न करे। फिर कोई देश का सौदा करने वाला राजनेता एंडरसन को बचाने के लिए सरकारी गाडी में मेहमान न बनाए
धीरे-धीरे मौत के आगोश में दम तोडता हुआ मध्यप्रदेश का एक शांत शहर भोपाल। पुराना भोपाल के छोला इलाके के पास ही है जेपी नगर जहां सैकडाें एकड में फैला है यूनियन कार्बाइड का कारखाना। एकाएक टैंक नंबर 610 के दैत्य ने जहरीली गैस उगलना शुरू किया। पल भर में भोपाल शहर एक गैस चैंबर में बदल चुका था जिसमें हर भोपालवासी तडप-तडप कर मरने को विवश था। कुछ ही दिनों में करीब पंद्रह हजार बच्चे, जवान, बुजुर्ग, स्त्रियां सभी इसकी जद में थे और चारों ओर बिखरा था अपनों का शव। सरकार ने अलग-अलग नंबर उन लावारिस लाशों पर टांग दिए थे, ताकि मरे हुए लोगों की पहचान हो सके। भोपाल शहर का हर वाशिंदा चारों तरफ पसरे मौत के सन्नाटे को नजदीक से महसूस कर रहा था और अपनों की तलाश में भटक रहा था। अभी भी 26 साल पहले हुए मौत का तांडव फिजाओं में चारों तरफ पसरा है। अमीया बानो कि एक ही चाह है कि उसकी ढाई साल की पोती रेशमा दूसरे बच्चों की तरह दौडती हुई आए और उसके गले से चिपट जाए। न जाने कई विकलांग रेशमाओं का दोषी एंडरसन अमरीका के एक आलीशान कोठी में अपनी बची-खुची जिंदगी गुजार रहा है। अंधाधुंध विकास की कीमत चुका रहे हैं भोपालवासी। कभी माओत्से तुंग ने कहा था कि अगर चीन पर साम्राज्यवादी देशों का हमला होता है, तो कुछ लाख लोग मरेंगे, लेकिन जितने लोग बचेंगे वही समाजवाद लेकर आएंगे। कुछ ऐसा ही तर्क आज 'ग्लोबलाइजेशन' के दौर में भी गढा जा रहा है, जहां विकास की कीमत चुकाने के लिए कुछ लाख या करोड लोग भी मर जाएं, तो बचे हुए लोग ही उदारीकरण की असली संतान के रूप में पेश किए जाएंगे। इस बुलंद इमारत की नींव में तो कुछ लाख आदिवासियों, किसानों, मजदूरों और गरीबों को तो दफन होना ही होगा। इस मामले में आला दर्जे के नेता चुप्पी साधे हैं, दूसरे स्तर के नेता मैदान में हैं, जिन्हें पता है कि ऊपर के लोगों को कब बोलना है और कब मौन धारण करना है। मामला एंडरसन का हो या क्वात्रोची का, देश के विदेशी गुनहगारों के लिए हर खून माफ है। बस शर्त एक ही है वे यहां निवेश करें और मुनाफे में कुछ हिस्सेदारी भी दें और चाहें तो उसका एक बडा हिस्सा अपने देश ले जाएं। विदेशी कंपनियां भी भारत की मजबूरी समझती हैं और समय पर सरकार की बांह मरोडने में परहेज नहीं करती। भारत अभी भी उनके लिए सोने की चिडियों वाला देश है, जो रोज उनके लिए सोने के अंडे देती है। ये दुनिया का सबसे बडा औद्योगिक हादसा था, जिसने करीब ढाई लाख लोगों को किसी न किसी बीमारी की चपेट में ले लिया। अभी भी जन्म लेते बच्चे जहरीली गैस के प्रभावों से अछूते नहीं हैं। बच्चे अपने पैरों पर खडे नहीं हो पाते, बोलते हैं तो हकलाकर, कितने बच्चे तो मानसिक विकलांग पैदा हो रहे हैं, जहरीली गैस की घुटन उन्हें तिल-तिल कर मार रही है। अभी भी वहां की सरकार आंखें मूंदकर लोगों को खनन के पट्टे दे रही है, पर्यावरण मानकों को धत्ता बताते हुए। इसके कारण यहां के जलाशयों में लेड, कैडमियम, आर्सेनिक की मात्रा बढ ग़ई है। ये तो वही मिसाल है कि बोझ से दबे जानवर के ऊपर चार मन का बोझ लादो या दस मन का, क्या फर्क पडता है? पर भोपाल के लोग आखिर करें भी तो क्या? भारत का पूरा तंत्र जिस अपराधी को बचाने में लगा हो, उसके आगे इन बेबसों की क्या बिसात? कहते हैं, इस त्रासदी की धमक अमरीकी सत्ता गलियारें में भी सुनी गई थी। अमरीकी सरकार परेशान हो तो क्या केंद्र, क्या राज्य, सबों के लिए अमरीका की सलाह निर्देश के रूप में लेने की होड लग जाती है। इस आपाधापी में इन्हें यह ख्याल भी नहीं रहता कि पांच साल बाद उन्हें जनता को मुंह भी दिखाना है।
विदेशी कंपनियों का अपने देश में स्वागत है, चाहे वे मॉरीशस के रास्ते आएं या दुबई से, सरकार का एक ही मकसद है कि वे निवेश के साथ लोगों को रोजगार भी दें। लेकिन निवेश और रोजगार के लोभ में लोगों की जिंदगियों से तो समझौता नहीं किया जा सकता। देश की सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। निवेश के बहाने अगर बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश की राजनीति में हस्तक्षेप करें, तो यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए जरूरी है कि मल्टीनेशनल कंपनियों से सियासी दल चंदा लेना बंद करें। आप चंदा लेंगे तो वे राजनीति में दखल देंगे ही। क्या भारत की जनता को इतनी समझ नहीं कि इन चंदों का सच क्या है? सीमित संसाधनों की लूट में छूट मिले तो कुछ करोड ड़ॉलर का चंदा भला उनके लिए क्या मायने रखता है। आने वाली सदी में वही देश शक्तिशाली होगा, जिसके पास अधिक से अधिक आर्थिक संसाधन होंगे। अफ्रीका से लेकर एशिया एवं लातिन अमरीकी देशों के संसाधनों पर कब्जे की होड में विदेशी कंपनियां जाल बिछाने में लगी हैं। जो कंपनियां 'कंपनी सोशल रिस्पांसिबिलिटी' यानी सीएसआर के नाम पर कुछ लाख डॉलर खर्च कर सरकार से तमाम करों से रियायत लेने में लगी होती हैं, वे भला मुफ्त में चंदा क्यों देंगी? इन कंपनियों के लिए दूसरे देशों में रास्ता तलाशने के लिए खतरनाक खुफिया एजेंसियों मोसाद, सीआइए का नेटवर्क भी होता है, जो इनके इशारों पर किसी भी देश में तख्ता पलट के लिए तैयार होती हैं। लातिन अमरीका हो या अफ्रीका या फिर अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान तक, लोकतंत्र के नाम पर दूसरे देशों में सरकार पर हमला बोलना, उन्हें हराकर कठपुतली सरकार बिठाना और फिर कंपनियों को लूटने की खुली छूट देना। इसमें खुफिया एजेंसियां और कंपनियां सरकार की शह पर दूसरे देशों में उखाड-पछाड क़ा खेल खेलती रही हैं। भारत में विदेशी कंपनियों का इतिहास फिर से दोहराया जा रहा है। सरकार के पास जनता को फुसलाने के लिए विकास का नारा है। विदेशी कंपनियां अपनी कही जाने वाली सरकार के कान में मंतर फूं क चुकी है। परमाणु करार का ही अगला चरण लायबिलिटी बिल के रूप में जनता के सामने पेश किया जा रहा है। जिम्मेदारी सरकार की, मरें देश के नागरिक और माल उडाकर ले जाएं विदेशी कंपनियां। फिर एंडरसन की तरह हमें उनके प्रत्यर्पण की मांग करने का अधिकार भी तो नहीं होगा। वे कुछ लाख चुकाकर तमाम जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाएंगे। इस देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि वही यूनियन कार्बाइड, जो भोपाल के लोगों का सबसे बडा गुनहगार है, धड़ल्ले से गुजरात में कारोबार कर रहा है। अगर इस कंपनी के गुनाहों को धोना है तो एंडरसन का इस देश में प्रत्यर्पण कराने के बाद देश के कटघरे में खडा करना होगा। जनता को यह भी ध्यान रखना होगा कि फिर कोई जस्टिस अहमदी इनकी मौत को अदालत में कम न आंकने की तिकडम करे। फिर कोई देश का सौदा करने वाला राजनेता एंडरसन को बचाने के लिए सरकारी गाडी में सरकारी मेहमान न बनाए। फिर देश-सेवा की कसमें खाने वाला सरकारी अधिकारी राजनेता को देश से ऊपर मानने की गुस्ताखी न करे। हाल में आंध्र प्रदेश सरकार जॉर्जिया टेक यूनिवर्सिटी को अपने यहां बुलाने के लिए रियायती दरों पर जमीन उपलब्ध कराने के लिए बिछी जा रही थी। विदेशी यूनिवर्सिटी उस जमीन का ज्यादा कीमत देने के लिए तैयार थी, लेकिन सरकार ने सदाशयता दिखाते हुए एक करोड प्रति एकड क़ी जमीन एक से डेढ लाख प्रति एकड में ही देने की पेशकश की। एक विदेशी यूनिवर्सिटी अगर जमीन का अधिक पैसा देने के लिए तैयार हो और रियायत की मांग भी न करे, तो क्या जरूरत है कि उन्हें छूट देने के लिए हम गिडग़िडाएं ही। इस बात का खुलासा लोगों को सूचना के अधिकार से मिला। क्या कारण है कि हमारे यहां का पूरा तंत्र और राजनैतिक नेतृत्व विदेशी कंपनियों के सामने वफादारी दिखाने की होड में लग जाता है। नियम-कायदों को ताक पर रखकर सारी सुविधाएं देने की होड लग जाती है। यहीं से इन विदेशी कंपनियों को यह संदेश जाता है कि भारत जैसे देश में सबकुछ चलता है। जनता हर घटना पर प्रतिक्रिया देने के लिए सामने नहीं आती और जब लोकतंत्र के चुनावी दंगल में जवाब देती है, तो फिर सरकार औंधे मुंह मैदान पर धूल चाट रही होती है। एक ईस्ट इंडिया कंपनी के जख्म को सहलाते हमारी कई पीढियां गुजर चुकी, फिर एक यूनियन कार्बाइड के घाव भला इतनी जल्दी कैसे भरेंगे? भोपाल में जो हो गया, उन मासूमों की जान को वापस तो नहीं लाया जा सकता, लेकिन इससे मिले सबक को हमेशा याद रखना होगा कि विदेशी कंपनियां भारत को चारागाह न समझ सकें।

स्वर्ग में पहुँच संभव

स्वर्ग में अधिकार अपार हैं और कर्तव्य नहीं के बराबर। भोग के एक से एक उत्तम साधन भी वहाँ मुफ़्त में सुलभ हैं। रमण के लिए चारों ओर रमणीक वातावरण भी है। ऐसी आम जनों की धारणा है। इस संबंध में मेरी अवधारणा से अवगत होने के निम्न मुक्तक पढ़िए।

"चेन्नई में पहुँचना, गुलमर्ग में पहुँचना।
उपसर्ग में पहुँचना, संसर्ग में पहुँचना॥
सारी पहुँच के ऊपर बस एक पहुँच यारो-
सुवर्ग में पहुँचना, है "स्वर्ग" में पहुँचना॥"

असंतोष से ही सर्जनात्मक लेखन संभव : चित्रा

चित्रा मुद्गल से चंदन राय की बातचीत

आपने बचपन में एक बार अम्मा से शेर की खाल मांगी थी, लेकिन मिला आपको बप्पा का लिखा हुआ नाटक और कुछ कविताएं। तो क्या साहित्य-लेखन में इस घटना का भी कोई योगदान आप महसूस करती हैं?
आश्चर्य से...अरे, आपको कैसे पता। हां, सफाई तो नहीं, रिनोवेशन हो रहा था, बप्पा के न रहने पर मैं उनकी याद अपने पास रखना चाहती थी। बप्पा के शिकार किए कई शेर की खालें और बारहसिंगा की झाडीदार नुकीली सिंगें ड्राइंगरूम में लगी रहती थी। अम्मा ने देने से मना कर दिया था। घर का माहौल तो था ही, साथ ही आस-पास के परिवेश से प्रभावित होकर ही लिखने की ओर उन्मुख हुई। उस समय समाज सामंतवादी माहौल की जकडन में था। औरतों की स्थिति को देखकर मन खटकता था। साथ ही इस बात पर अफसोस भी होता था कि दूसरे लोगों को भी क्यों इनके हालात पर गुस्सा नहीं आता। गांव की स्थितियां शहरों से और भी बदतर थी। शहर में तो एक तरफ का खुलापन होता था, लेकिन गांव का वातावरण तो संकीर्ण था। महिलाओं को घर के पिछवाडे बनी खिडक़ी से ही घर में आना-जाना होता था। इस सवाल ने बचपन से परेशान किया कि अगर भैय्या और अन्य लोग घर के मुख्य दरवाजे से भीतर आ सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? एक बात और भीतर तक कचोटती थी- यह करना है, यह नहीं करना है-के निर्देश खासकर घर की महिलाओं के लिए। जबकि भैय्या कुंवर कमलेश प्रताप सिंह के लिए कोई रोक-टोक नहीं। इसी तरह के असंतोष और टूटन ने लिखने को प्रेरित किया।
आपकी रचनाओं में समाज के छोर पर खडे व्यक्ति की आवाज सुनाई पडती है, जिन लोगों की सत्ता के गलियारों में आवाज कभी नहीं सुनी गई। क्या जुडाव महसूस करती हैं आप उस वर्ग से?
मैं बचपन से ही इनसे एक प्रकार का अपनापन महसूस करती रही हूं। हंसते हुए...पिछले जन्म में मैं जरूर इसी वर्ग से रही होऊंगी। हुआ यूं कि जब मैं स्कूल से घर लौटी, तो दत्ता सावंत को घर में पाया, जो किसी बात पर जोर-जोर से बहस कर रहे थे। हमारे घर के पास से ही मजदूरों के आने-जाने का रास्ता था। कुर्ला से लेकर मुलुंड तक जहां से पहाडी ड़ॉकयार्ड शुरू होती है, तक पत्थर का दीवाल बनाया जा रहा था। इस तरफ अफसरों की बस्तियां थी, दूसरी तरफ मजदूरों की बस्ती, जो इधर के औद्योगिक इलाकों में काम करने जाते थे। इन्हीं के घर के पास से छोटा सा रास्ता गुजरता था, जहां से सुबह-शाम मजदूर अपनी ही मस्ती में खोए, फावडा-कुदाल लिए गुजरते थे। अफसर शाम को बंगले के बाहर लॉन में अपने परिवार या मित्रों के साथ कुर्सी लगाकर बैठे होते थे। अफसरों की पत्नियां भी नाक-भौं सिकोडती थीं, जब मजदूरों का झुंड हु-हु करता हुआ मदमस्ती में गाते हुए बगल के रास्ते से गुजरता था। अगर यह दीवाल बनाई जाती, तो मजदूरों को 3-4 किलोमीटर सुबह-शाम आने-जाने में ज्यादा चक्कर लगाना पडता। मैंने कहा कि अगर मेरा बस चले तो मैं इस दीवाल पर फावडा चला दूं। दत्ता सावंत आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगे और अगले ही दिन से मुझे कुछ अशिक्षित मजदूर स्त्रियों को पढाने का काम सौंप दिया गया। सिर्फ शहरों में बदहाल मजदूर ही नहीं, बल्कि गांव की दुनिया को भी इससे जोडा। अनायास प्रतिबंध से चिढ क़े कारण ही इस वर्ग के दुख-दर्द में महिलाओं को भी शरीक किया। गांव में जब मेले या हाट में जाना होता था, तो अम्मा बैलगाडी में चादर डालकर पीछे के दरवाजे से आती थी। बैलों को घुमाकर आगे लाया जाता था, तभी महिलाएं घर से निकलती थी। गांव से बाहर निकलते ही दलितों की बस्तियां थीं, जिनसे होकर जाने की मनाही थी। इन सभी बातों का विरोध करते हुए मैंने हमेशा अपने को इस वर्ग के आस-पास ही पाया।
आप विचारों से लोहियावादी रही हैं। आप साहित्य में विचार को कितना महत्व देती हैं?
लोहियावादी तो नहीं, हां लोहिया जी के विचारों से प्रभावित जरूर रही हूं। बहुत कुछ सीखा है, पाया है, तो प्रभावित होना स्वाभाविक ही था। बराबर ट्रेड यूनियन के आंदोलन में शरीक होती रही, दत्ता अंकल का सहयोग भी मिलता रहा। हालांकि वे थे तो कांग्रेसी, लेकिन इससे लोगों के बीच काम करने पर कोई प्रभाव नहीं पडा। बाद में सीपीआई के संपर्क में भी आई। जगदंबा प्रसाद दीक्षित जी लोगों को विचारों से दीक्षित करने में ही लगे रहते थे, जिसका असर काम पर पडता था। पार्टी अनुशासन से ज्यादा रूचि मेरी लोगों के भले के लिए काम करने की थी। अहिल्या ताई के साथ हम लोगों से चंदा लेकर ही काम करते थे, कोई डॉलर या पाउंड के अनुदान से चलने वाली संस्था नहीं थी, हम लोगों की। आज दुख होता है जब चंदे के पैसे को लोगों को दारू, मीट पर खर्च करते हुए देखते हैं। क्रांति और शराब का भला कैसा संबंध। उतना ही दुखी होती हूं किसी मजदूर को देशी शराब की दुकान पर खडे देखकर। यही पैसा एक वक्त परिवार को भूखा सुलाता है। मैं लोहिया जी के देसी समाजवाद से प्रेरित रही। समाजवाद में भी तो भूगोल, इतिहास का ख्याल रखना ही होगा। क्या सीमोन द बउआर के देश में विधवा नारियों को चिता पर जलाया जाता था। अगर नहीं, तो नारी विमर्श के स्वरूप भी तो देश काल में बदलने स्वाभाविक हैं। आज राजनीति ने पूंजीपतियों के साथ मिलकर मजदूर-शक्ति का क्षरण किया है। जेपी के आह्वान पर पूरे देश में छात्रों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया था। साहित्य के केंद्र में विचार का तो अपना महत्व है ही।
आज के उग्र वामपंथ को आप किस रूप में देखती हैं?
हम लोगों का घर तो सबों के लिए खुला होता था, दूसरों के बारे में नहीं जानती। समाज में जब तक कुछ लोगों के पैसे कमाने की हवस के कारण अधिकांश हाशिए पर धकेले जाते रहेंगे, लोग सडक़ पर उतरेंगे या गुरिल्ला लडाई में शामिल होंगे ही। क्या हमने इन लोगों की बात सुने जाने के लिए लोकतंत्र में कोई स्पेस छोडा है? हालांकि नक्सल अपने शुरूआती दौर में जेनुइन था। बहुत बडे नाटककार गौतम घोष बराबर इन लोगों के बीच जागरूकता फैलाने का काम करते रहते थे। दुबले-पतले, मरियल-से दिखने वाले मिथुन चक्रवर्ती सहित उस समय के सभी नाटककार इफ्टा के तहत वहां प्रचार में लगे थे। लोग खुलकर चंदा देते थे, जबरदस्ती जेब में पैसा निकालकर डाल देते थे। लेकिन आज मजदूरों की शक्तियों को सत्ता ने पूंजीपतियों के साथ मिलकर तोड दिया है, यही कारण है कि ऐसे आंदोलन अब विकराल रूप लेते जा रहे हैं।
आज मिर्चपुर से लेकर तमाम जगहों पर दलितों पर अत्याचार बढे हैं, सत्ता का स्वरूप भी बदला है, अब वह कमजोर की बजाय ताकतवर के साथ खडी दिखती है, आपका क्या विचार है?
छत्तीसगढ हो या अमरीका, हर जगह सत्ता का एक ही चरित्र होता है। पूंजीपति सरकार के साथ मिलकर देश के संसाधनों को जमकर लूट रहे हैं। स्वराज को आकार-प्रकार देने वाली राजनीति का यह कैसा रूप है? हत्यारे एंडरसन को भगाने के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक पूरा अमला लगा था। अर्जुन सिंह चाहते तो जनता की जवाबदेही का हवाला देकर केंद्र के आदेश को मानने से इंकार कर सकते थे। ऐसे नेताओं को तो सरेआम चौराहों पर फांसी लगा देनी चाहिए। इसे छद्म राजनीति नहीं तो, और क्या कहेंगे?
एक अंतिम सवाल, आपको पाठक किस रूप में जानें-एक उपन्यासकार, कहानीकार, समाजसेविका या कुछ और...?
पाठकों के पास वही अनुभव पहुंचते हैं, जो उन्हीं के परिवेश से अर्जित किए गए हैं। यह सवाल मैं पाठकों पर ही छोडती हूं। हालांकि अब उनके पत्र कम ही आते हैं, हां फोन जरूर आते रहते हैं। पाठक ही तय करें कि वे मुझे किस रूप में अपने नजदीक महसूस करते हैं। हमसे बात करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद...

एक लापरवाह धार्मिक देश में...

आप किसी सुरक्षा चेक पोस्ट पर खड़े हो जाएं। किसी बढ़ी हुई दाढ़ी वाले को मुल्लाजी की तरह टोपी लगाए एवं घुटने तक पायजामा पहने देखकर ही सुरक्षा अधिकारी कुछ ज्यादा ही मुस्तैद नजर आने लगते हैं। उनकी बकायदे चेकिंग के समय ऐसा लगता है मानो उन अधिकारियों की नजर में ये पहले से ही आतंकवादी घोषित हो चुके हों। कुछ ऐसी ही छवि को लेकर हमारा समाज भी बड़ा होता है। यही कारण है कि एक समरस कहे जाने वाले समाज में मुसलमानों की बस्ती आज भी हिन्दू बहुल कॉलोनियों से दूर ही बसी होती है और शायद दूर रहकर ही वे अपने को सुरक्षित भी महसूस करते हैं। सबकुछ खेल हमारे मनोमस्तिष्क में छवि क्रिऐट किए जाने को लेकर है। आज सरकार के नुमांइदों की नजर में हरेक मुसलमान आतंकी है और हरेक आदिवासी माओवादी। इस तर्क को लेकर उनके लिए अपराधियों की तलाश करने में आसानी होती है। ऐसे में इस समुदाय की ओर से किए गए सार्थक पहल भी अखबारों की सुर्खियां नहीं बटोर पाते। कुछ ऐसा ही हुआ लखनऊ के एक मुसलमान बहुल इलाके में। मुसलमानों ने जल संरक्षण को लेकर एक मुहिम की शुरूआत की है, कहते हैं ना कि किसी नेक काम की शुरूआत घर से होनी चाहिए, कुछ ऐसे ही अंदाज में लखनऊ के ये मुसलमान मस्जिदों में वजू करने के लिए लोटे के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं। नेक मुसलमान खुदा की बंदगी में दिन में पांच बार नमाज अदा करता है। एक बार वजू करने में नल से करीब पांच लोटा पानी बर्बाद होता है, जबकि लोटे के इस्तेमाल से चार लोटा पानी बचाया जा सकता है। है न एक छोटी, लेकिन सार्थक पहल।
हम रोज शिवालयों में न जाने कई बाल्टियां शिवलिंग पर रोज उड़ेल आते हैं। कुछ इस सोच में कि जितना गंगा जल शिवलिंग पर चढ़ाया जाएगा, भगवान उतने ही प्रसन्न होंगे। ऐसे में अंधविश्वास का दौर चला तो इसी पानी की जगह दूध की नदियां बहाने में भी गुरेज नहीं करते। हो सकता है कि पड़ोस में बच्चा दूध के बिना छटपटा रहा हो, या कोई गरीब भूख से बेबस होकर दम तोड़ दे, लेकिन भगवान को खुश रखना जरूरी है। दुनिया का शायद ही कोई भगवान हो, जो भूखे बच्चे के हिस्से का दूध गटककर भी चैन से रह सके। भद्र समाज की कलियुगी लीलाएं देखकर तो किसी भी नेक इंसान का कलेजा मुंह को आ जाए। सड़क के बीचों-बीच चौराहे पर कई बार पूडिय़ां, चने, लड्डू, खीर के साथ सिंदूर और पता नहीं क्या-क्या पत्तलों पर बिखरे होते हैं। इस भूखे देश में चौराहे पर अनाज बिखेरकर न जाने किस भगवान की पूजा होती होगी। कुछ देर बाद ही उन प्रसादों पर कुत्तेां की फौज टूट पड़ती है। खैर इसी बहाने कुछ सड़कछाप कुत्तों की भूख तो मिट जाती है। लेकिन दुख तब होता है, जब इन्हीं के बीच अधनंगे बच्चे, बच्चियां भी प्रसाद में एक हिस्सा झपट लेने के लिए कुत्तों से संघर्ष करती दिखती हैं। हमारा भद्र समाज इन्हें एक भद्दी सी गाली देकर अपनी राह लेता है-स्स्स्...ाले, खिलाने की औकात नहीं, तो पैदा ही क्यों करते हैं? कोई इनके शहर आने पर ही लानत मलामत करते हुए सात पुश्तों को गाली से नवाजने में भी गुरेज नहीं करता। लेकिन इनमें शायद ही कोई ऐसा बंदा हो, जो किसी बच्चे का हाथ थामकर पास के होटल में ले जाकर एक रोटी ही खिला दे। हालांकि ये अभागे बच्चे आपके लाडले की तरह सोने का चम्मच लेकर नहीं पैदा हुए, लेकिन इनके मां-बाप को भी उतना ही दर्द होता होगा, जितना आप अपने बच्चे की कोई जिद पूरी करने में अपने को असमर्थ महसूस करते होंगे। लेकिन यहां जिद किसी हवाई जहाज या लग्जरी कार को लेकर नहीं होता, बल्कि एक सूखी रोटी के लिए होती है, जिसे सड़क पर बिखरा देखकर रोता हुआ बच्चा कुत्ते से भी झपट लेने के लिए तैयार होता है।
ब्लॉगर के लिए किसी एक विषय पर टिककर रहना बड़ा ही मुश्किल होता है। विचारों का ताना-बाना किसी बंधन को स्वीकार नहीं करता। अब देखिए, बात तो यहां हो रही थी वजू के लिए जल संरक्षण की और निकलते-निकलते अधनंगे बच्चों पर आ गई। क्या आपने गांव या आस-पास कभी सुना है कि पानी के लिए किसी ने पड़ोसी का गला काट दिया हो? आपका जवाब नहीं ही होगा, हालांकि वहां पानी के लिए एक दूसरी तरह की लड़ाई हो सकती है। सवर्णों के कुएं से अछूत मानी जाने वाली बिरादरी को पानी लेने पर रोक हो सकता है या फिर कुछ ऐसी विभत्स हिंसा का रूप देखने को मिल सकता है। लेकिन पानी की कमी को लेकर हिंसा तो कभी नहीं होती होगी। जैसे-जैसे मेट्रो सिटीज बसते गए, गांव का पानी शहरों की तरफ आने लगा, तब भी इन शहरातियों की प्यास नहीं बुझी। भला बुझती कैसे, सरकार ने शहर में पानी पर भी पहरा जो बिठा दिया था। पानी यहां कुओं की जगह बड़े-बड़े मशीनी टैंकरों में जो मिलने लगा था। फिर पानी के लिए लूट होनी ही थी, जिसमें दबंग लोग गरीबों के हक का पानी भी छीनने लगे। हालांकि मध्य वर्ग जो बिसलरी के पानी से ही नहाता था, उसके लिए शहर के हर मॉल, कॉलोनी के कोने वाली दुकान में बोतलबंद पानी उपलब्ध थी। कंपनियां लोगों की जरूरतों को आंकने में अव्वल होती हैं। यहां उनकी कल्पनाशीलता कवियों की रचना से भी तेज होती है। यही कारण है कि कभी रिलांयस को सब्जी के स्टॉल लगाने पड़ते हैं, तो कभी एमएनसीज को बोतलबंद पानी बेचना पड़ता है, तो कभी विदेशों में शुद्ध हवा लेने के लिए ऑक्सीजन बार में जाना पड़ता है। इनका बस चले तो अभी से चांद पर सब्जियां उगाने के लिए उन्नत प्रोद्योगिकी का दावा करने वाले बीज बेचना शुरू कर दें।
देश के राष्टï्रपिता बापू का कथन आज के राजनेताओं और पूंजीपतियों को तो नहीं याद रहा, लेकिन लखनऊ के इन मुसलमान भाईयों ने इसे आजमा कर समाज के सामने एक मिसाल कायम किया है। सचमुच प्रकृति सारे संसार का पेट भरने में समर्थ है, लेकिन कुछ लालची पूंजीपतियों का पेट भरने में नहीं। जल हमें प्रकृति ने एक विरासत के रूप में दिया था, ताकि हम अपने लिए इसका इस्तेमाल करते हुए आगे की पीढ़ी को सौंप सकें। लेकिन हमने प्रकृति के इस संदेश को किसी कोक बनाने वाली कंपनी या किसी बोतलबंद एमएनसी के हाथों एमओयू पर साईन कर उन्हें सौंप दिया। इन भद्र मुसलमान भाइयों का लक्ष्य महीने में सौ मस्जिदों में जाकर इस संदेश को फैलाना है ताकि लोग जल संरक्षण के लिए प्रेरित हो सकें। ऐसे में समाज में एक उम्मीद की किरण नजर आती है कि अभी भी समाज में कुछ लोग हैं, जो प्रकृति के अनमोल धरोहर को आने वाली पीढिय़ों के लिए बचाकर रखने के बारे में सोचते हैं।

मेरी नई ग़ज़ल


जिन
के साथ खेल गुजारा था जमाना,

उनकी नज़र में हम अब मेहमान हो गए।

जिन दोस्तों के साथ बचपन को गुजारा,
सिद्दत के बाद वे ही अनजान हो गए।

घर से तो गए दूर शहर काम के लिए,

हम गांव छोड़ खुद ही बेनाम हो गए।

गांव की वो हरियाली बाग घट गए,

अब गांव भी शहर से विरान हो गए।

बदली हुई है नज़रें बदला है ज़माना,
हम अबकी गांव आके हैरान हो गए।

पुछे न कोई मुझसे क्या हाल तुम्हारा ,
अपनों के बीच अपनी पहचान खो गए।

-राजेश कुमार

मोबाइल पे अब भीख मांगें भीखारी

मोहब्बत में बेकार अब डाकखाना।
नहीं प्रेम पत्रों का अब वो जमाना॥
जिसे देखिए वो मोबाइल लिए है।
मोबाइल के जरिए मरे है, जिए है॥

मोबाइल हुआ अब तो गाजर व मूली।
करें माफिया इससे हफ़्ता वसूली॥
मोबाइल पे कुछ हैं चुकाते उधारी।
मोबाइल पे अब भीख मांगें भीखारी॥

मोबाइल पे रोना मोबाइल पे हंसना।
मोबाइल से छुटना मोबाइल से फंसना॥
मोबाइल मोहब्बत का आधार है जी।
मोबाइल बिना अब कहाँ प्यार है जी॥

मोबाइल के जरिए मोहब्बत इजी है।
मोबाइल में हर एक बंदा बिजी है॥
मोबाइल भीतर लवर के हैं फोटो।
न लव हो, लवर हो मोबाइल पे लोटो॥

सोनिया मैडम को गुस्सा क्यों आता है

कांग्रेस की शक्तिपीठ माने जाने वाली सोनिया परिवार एक बार फिर विवादों में है। कांग्रेस के निचले स्तर के नेता गणेश परिक्रमा में लग गए हैं, सोनिया परिवार की मान की खातिर। आखिर क्यों सोनिया पर लिखी कोई किताब, उपन्यास या सिनेमा को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया जाता है? क्यों सोनिया नहीं चाहती कि वे भारत की राजनीति के केंद्र में आएं? क्या खतरा महसूस करती हैं वे सत्ता के सांप-सीढ़ी के खेल से? कई ऐसी जानी-अनजानी वजहें हैं, जिसके कारण यह परिवार मुख्यधारा की राजनीति से अलग होकर राजनीति की गंगोत्री ही बने रहना चाहता है। गंगोत्री पर खतरा महसूस होते ही कांग्रेस को ऐसा महसूस होने लगता है कि अब तो हमारी राजनीति की गंगा ही सूखने लगेगी। इसलिए इस पर आए खतरे को टालने के लिए कांग्रेस के दूसरे दर्जे के नेताओं को आगे कर लड़ाई लड़ी जाती है। अब कोई अभिषेक मनु सिंघवी बलिदान हो तो, अपनी बला से। लेकिन कांग्रेस अपने सिपाहसलारों की चारण-वंदना का पुरस्कार भी समय पर मंत्रिमंडल में जगह देकर अदा करती है। शर्त भी सिर्फ एक ही होती है कि वह अपनी निष्ठा इस शक्तिपीठ के प्रति राजनीति से संन्यास लेने तक बनाए रखे। जितनी बड़ी परिक्रमा करने वाला होता है, उसे राजनीति में उतने ही शीर्ष पद से नवाजा जाता है। जिसने भी इस परिवार की छत्रछाया को चुनौती दी, चाहे वे मराठा छत्रप हों या ममता बनर्जी, बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। ये बातें कांग्रेस पार्टी में नेहरू के दौर से ही शुरू हो गई थी, जिस परंपरा को इस पार्टी ने आज तक जीवित रखा है। ताजा विवाद प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉमिनिक लापियर के भतीजे जेवियर मोरो के उपन्यास 'एल सारी रोसोÓ यानी 'द रेड सारीÓ को लेकर है। इस उपन्यास को लेकर कांग्रेस के सिपाहसलार यह कयास लगा रहे हैं कि जरूर सोनिया के अनछुए पहलुओं की चर्चा भी इसमें होगी। सोनिया-राजीव के प्रेम-संबंधों से लेकर राजीव की हत्या के बाद वतन वापसी के मुद्दे को भी इस उपन्यास में उठाया गया है।
भारत के प्रबुद्ध वर्ग इस बात से अवगत होंगे कि सोनिया गांधी एक समय अपने बच्चों को लेकर इटली लौट जाना चाहती थीं। कांगे्रस के बुद्धिजीवियों के मान-मनुहार के बाद ही उन्होंने राजनीति में आने का फैसला लिया और देश में एक सशक्त राजनेता बनकर उभरी। कांग्रेस को इस बात का डर सालता रहा है कि सोनिया के कमजोर पहलूओं को जनता के बीच लाने से उनकी सशक्त छवि धूमिल होगी। इसलिए इस उपन्यास का अंग्रेजी संंस्करण भारत में आने से पहले ही वह चाहती है कि इस किताब को प्रतिबंधित कर दिया जाए। कुछ ऐसी ही गुस्ताखी हाल में फिल्म निर्देशक एवं राजनेता प्रकाश झा ने भी की थी। इस हिमाकत की वजह से उनकी फिल्म 'राजनीतिÓ को कड़े सेंसर के दौर से गुजरना पड़ा। कांग्रेस के सहयोगियों की एक कमिटी बना दी गई, जिसने अपनी मर्जी से फिल्म के दृश्यों की कांट-छांट की। आपात काल के दौर में तमाम फिल्म निर्माता-निर्देशकों पर भी इसी तरह का अघोषित सेंसर लागू था। अगर आप कांग्रेस की विचारधारा से सहमत हैं, तो फिल्म बेरोकटोक 'केवल व्यस्कों के लिएÓ होते हुए भी 'यूÓ सर्टिफिकेट से मुक्त। अगर आपने कांग्रेस के विचारों से अलग लाईन लेने की कोशिश की तो फिर आपकी खैर नहीं। सरकार का दिखाई नहीं देनेवाला डंडा इन निर्देशकों को हमेशा लाईन पर रखता था। कुछ ऐसा ही डर फिल्मकार जो राइट की रातों की नींद हराम किए है जिन्होंने लेडी माउंटबेटेन और नेहरू के संबंधों को लेकर इंडियन समर नाम से फिल्म बनाने की तैयारी कर ली थी। जिस डर ने उनकी नींद छीन ली थी, वही हुआ।
हमेशा सत्ताधारी पार्टियों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से अपने अस्तित्व पर खतरा महसूस किया है। ये राजनीतिक हमले पहले दबे-छुपे रूप में होते थे, अब खुलकर होने लगे हैं। राजनेताओं का छद्म आवरण इन दिनों जनता के आगे उतर चुका है। चाहे जसवंत सिंह की किताब को लेकर संघ परिवार में मचा तूफान हो या फिर कभी भाजपा अध्यक्ष रह चुके आडवानी के जिन्ना को लेकर पाकिस्तान की सरजमीं पर दिया गया बयान। राजनेताओं में 'सच का सामनाÓ करने की लोकतांत्रिक आदत इस देश का जाग्रृत समाज विकसित नहीं कर पाया है। यहां एक तरफ तो महामहिम होते हैं, तो दूसरी तरफ भूखी-नंगी जनता। एक तरफ सत्ता की नजदीकियों का मजा लेते पूंजीपति वर्ग हैं, तो दूसरी तरफ अपने हक के लिए सड़क पर उतरे किसान, मजदूर, आदिवासी । हम सशस्त्र नक्सली संघर्ष की हिमायत करने वाली अरुंधति राय की अभिव्यक्ति की आजादी के तर्क पर समर्थन करते हैं, तो वहीं स्पेनिश लेखक मूर के सोनिया गांधी के जीवन पर आधारित उपन्यास पर लाल-पीले हो जाते हैं। प्रकाश झा की 'राजनीतिÓ पर झल्लाने लगते हैं। क्यों? आखिर यह दोहरे मानदंड क्यों? अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही कसौटी है, तो अरुंधति और मूर में अंतर कैसे किया जा सकता है? हम मानते हैं कि अरुंधति के बयान से सुरक्षा बलों से लेकर देश का वह बड़ा तबका भी आहत हुआ, जो नक्सली हिंसा से ग्रस्त है। लेकिन फिर भी हमने बोलने-लिखने की आजादी के मूलभूत सिद्धांत का सम्मान किया। लेकिन मूर को तो कांग्रेस ने कानूनी नोटिस थमा दिया। जबकि मूर यह कह चुके हैं कि उनकी यह कृति सोनिया गांधी की जीवनी नहीं है,महज एक उपन्यास है। इस नाते उपन्यास में जिस कल्पनाशीलता के लिए अवकाश रहता है, वह यहां भी रहना चाहिए। एक बात और मूर ने इस पुस्तक की पांडुलिपि सोनिया की बहन के जरिए प्रकाशन से पूर्व सोनिया गांधी तक भिजवाई थी- इस अपेक्षा से कि अगर कुछ कहना हो तो कहें। लेकिन तब गांधी परिवार की ओर से कोई आपत्ति नहीं जताई गई थी।
क्या कारण है कि अरूंधति राय और महाश्वेता देवी जैसे लोगों को सशस्त्र क्रांति की वकालत करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इस सवाल में ही व्यवस्था के सारे दुख-दर्द का हल छुपा है। हम कह सकते हैं कि गांधीवादी तरीकों से विमुख होते समाज की पीठ सहलाने को सरकार ही उन्हें मजबूर करती है। लेकिन देश के तमाम बुद्धिजीवियों की मांग ठुकराते हुए हमारे गृहमंत्री माओवादियों पर किसी तरह का बहस नहीं चाहते। चाहेंगे भी क्यों, फिर तो विकास का मुद्दा आएगा, आदिवासियों को 'जल, जंगल, जमीनÓ से बेदखल करने की बात सामने आएगी, देशी-विदेशी कंपनियों को जंगल के खनिज संपदाओं के दोहन के लिए अवैध तरीके से एमओयू का मामला भी उठेगा, वनरक्षकों एवं स्थानीय पुलिस की आदिवासी महिलाओं पर अत्याचार की बातें सामने आएगी। सरकार बेवजह एक चर्चा को तूल देकर क्यों 'आ बैल मुझे मारÓ का खतरा घर बैठे मोल लेगी।
कई राज्य सरकारों का ध्येय तो 'माओवादी, माओवादीÓ चिल्लाकर ही केंद्र से पैसा ऐंठना होता है। नक्सलियों की खबरों को प्रमुखता दी जाती है, वहीं गुपचुप तरीके से जंगल में 'आपरेशन ग्रीन हंटÓ के नाम पर आदिवासियों को निशाना बनाया जाता है। कितने माओवादी मरते हैं और कितने आदिवासी, इसका आंकड़ा तो सरकार की फाइलों में भी नहीं दर्ज होता होगा। मरते तो आदिवासी ही हैं, नक्सलियों के साथ न जाओ, तो नक्सली मारते हैं, सलवा जुड़ुूम का साथ दो, तब भी उनकी बंदूकें तनी होती हैं और बाकि कोर-कसर वनरक्षक, स्थानीय पुलिस और आपरेशन ग्रीन हंट चलाने वाले पूरा करते हैं। सरकार को यह सोचना होगा कि आदिवासी डर कर नक्सलियों का समर्थन करते हैं या विकास की धारा वहां तक नहीं पहुंचने के कारण। उनका तो सरकार से एक ही आग्रह हैै कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। जंगलों में रहना उनके लिए वैसा ही है जैसे किसी जंगली जानवर को जंगल की सरहदें से बाहर निकालकर शहर में बसाना। उन्हें घर से उजाड़ेंगे, तब वे किसी का भी दामन थामने को तैयार होंगे, चाहे वे नक्सली हों या मिशनरी या फिर कोई संघी। शहरों में कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो आदिवासियों की कल्पना नंगे रहने वाले, मुंह से जंगली आवाज निकालने वाले, नरबलि देने वाले, अजीब से देवता की पूजा करने वाले समुदाय के रूप में ही करते हैं। ह्वïाईट मैन बर्डेन की तरह नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर तबके के साथ खड़े होने का साहस आज हमें दिखाना होगा और गांधी के अंतिम आदमी की तरह उसका हाथ थामकर चलना होगा। तभी माओवादियों के लाल गलियारे पर शांति के फूल बिखेरे जा सकते हैं। मुख्यधारा की पार्टियों को भी जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को महत्व देना होगा ताकि लोकतंत्र का नवजात पौधा इस देश की मिट्टी में जड़ पकड़ सके और हम गर्व से कहें कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं।

हम और सिनेमा

श्रीकाकुलम

(the gun is not in the hands of the peoples-JP)
एक आदमी-
दुसरे आदमी की गर्दंन
धड़ से
अलग कर देता है

जैसे एक मिस्त्री बलतू से
नट अलग करता है

तुम कहते हो- यह हत्या हो रही है
मै कहता हूँ- मेकेनिज्म टूट रहा है

नही इस तरह चेहरा
मत सिकोड़ो और ना कंधे ही
उचकाओ 
मुझे मालूम है- सबूत के लिए
तुम  कह सकते हो की खून
बह रहा है.
लेकिन इतना ही काफी नही है
और खून का रंग लाल है

असली सवाल है यह जानना
की बहता हुआ खून क्या कह रहा है

यह हत्याकांड नही है सिर्फ लोहे को
एक नया नाम दिया जा रहा है

और सबूत के लिए यदि तुम
देखना ही चाहते हो
तो चलो मेरे साथ
में तुम्हे दिखलाता हूँ भाषा के जंगल में
कविता का वह वर्जित प्रदेश
जहाँ कायरता
एक खाली तमंचा फ़ेंक कर
भाग गयी है और साहस 
चन्द पके हुए बालों के साथ
आगे भाग गया है-
अँधेरे में
धूमिल

हो कहीं भी शौचालय लेकिन शौचालय बनना चाहिए



वैसे ये कला मैंने रवीश जी से सीखी है कि जहाँ भी जाओ, वहां की कुछ चीजें कैमरे में कैद कर लाओ और यादगार बनाओ | इस तरह की अपनी पहली पोस्ट में दुष्यंत साहेब की ग़ज़ल का पोस्टमार्टम आपके सामने रख रहा हूँ |

दुष्यंत साहेब ने सोचा भी नहीं होगा की उनकी ग़ज़ल का ये हश्र होगा | आप इसे रचनात्मकता भी कह सकते हैं | बहरहाल जो भी है आप भी पढ़ें और अपनी टिप्पणियों से अवगत कराएं |

बोल की लब आजाद हैं तेरे

गालिब का सीने का नासूर साहित्यकारों की वही पीडा है जो मौन में उन्हें व्यक्त करने को कचोटती है-वह इश्क पर लिखी कोई रचना हो सकती है, या मजदूरों के वेदना पर या फिर मानवता पर लिखी कोई रचना। प्रसिध्द रचनाकारों से जब  आज के लोग प्रश्न करते हैं कि बहुत दिनों से आपकी कोई रचना नहीं आई, तब वे हंसकर मौन रह जाते हैं। रचना के लिए तो समाज के सरोकारों से जुडना होता है, गरीब, मजलूम की पीडा को खुद पर झेलनी होती है, तब जाकर कोई फैज आकार लेता है

ये चाहे तो दुनिया को अपना बना लें
ये आकाओं की हड्डियां तक चबा लें
कोई इनको अह्सासे जिल्लत दिला दे
कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे

फैज साहब की शायरी में गरीब मजलूमों की भूख तो मौजूद है ही, लेकिन इसमें क्रांति की आवाज को भी साफ महसूस किया जा सकता है। ये उम्मीद उनकी हर शायरी में बरकरार है कि हालात बदलेंगे जरूर। एक दिन जब ये जागेंगे, तो दुनिया का नक्शा ही कुछ और होगा। कहते हैं कि जब स्वयं साहित्य और समाज दोनों मिलकर अनंतकाल तक तपस्या करते हैं, तब जाकर कोई फैज जन्म लेता है, जो दुनिया को अपने नक्शे-कदम पर झूमने को मजबूर कर देता है।

रचनाकारों की जिंदगी में एक समय ऐसा भी आता है जब वो उकता कर कहता है-यार, अब बहुत हो चुकी शेरो-शायरी। फैज अपने पहले कविता-संग्रह 'नक्शे फरियादी' में भी कुछ ऐसी ही बातें कहते हैं- शेर लिखना जुर्म न सही लेकिन बेवजह शेर लिखते रहना ऐसी अक्लमंदी भी नहीं है। गालिब भी दिल में छिपे दर्द को कुछ यूं बयान करते हैं जब से मेरे सीने का नासूर बंद हो गया है, मैंने शेर कहना छोड दिया है।

गालिब का सीने का नासूर साहित्यकारों की वही पीडा है जो मौन में उन्हें व्यक्त करने को कचोटती है-वह इश्क पर लिखी कोई रचना हो सकती है, या मजदूरों के वेदना पर या फिर मानवता पर लिखी कोई रचना। प्रसिध्द रचनाकारों से जब आज के लोग प्रश्न करते हैं कि बहुत दिनों से आपकी कोई रचना नहीं आई, तब वे हंसकर मौन रह जाते हैं। रचना के लिए तो समाज के सरोकारों से जुडना होता है, गरीब, मजलूम की पीडा को खुद पर झेलनी होती है, तब जाकर कोई फैज आकार लेता है। तभी तो वे कहते हैं-'ऐसी सूरते-हालात पैदा होने से पहले ही जौक और मसलहत का तकाजा यही है कि शायर को जो कुछ कहना हो कह ले, अहले-महफिल का शुक्रिया अदा करे और इजाजत चाहे।'

इन दमकते हुए शहरों की फरावां मखलूक
क्यों फकत मरने की हसरत में जिया करती है
ये हसीं खेत फटा पड़ता है जोबन जिनका
किसलिए इन में फकत भूक उगा करती है,

जिसने भी अपनी रचनाओं के केंद्र में इस विषय को रखा, उसे जमाने ने महफिल से उठने नहीं दिया। इन्हीं साधारण प्रश्नों की तलाश ने उन्हें अहले-महफिल का शुक्रिया अदा करके उठ जाने से रोका। प्रेम जो संसार के ताने-बाने को जोडता है पर फैज ने बेबाक होकर लिखा। कई अर्सों तक वे गली-कूचों के मजनुंओं के पसंदीदा शायर बने रहे। आज के इंटरनेटी प्रेमी भी अपने प्रेम का इजहार कुछ यूं ही करते दिखते हैं-

रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए
जैसे सहराओं में हौले से चले बादे-नसीम
जैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए।

इसी तरह अयूब शाही के दिनों में लिखी उनकी एक मशहूर नम है- ''निसार मैं तेरी गलियों के ए वतन कि जहां। चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले। जो काई चाहनेवाला तवाफ को निकले। नजर चुरा के चले जामा ओ जां बचा के चले।'' फैज साहब ता-उम्र दुश्वारियों से जूझते रहे बावजूद फैज साहब ने कभी हालात से समझौता नहीं किया।

उस दौर में जब फैज साहब का लिखा शेर जैसे ही बाजार में आता तो पाकिस्तान की हुकूमत हिलने लगती थी। उनकी शायरी की दबाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने उन्हें नजर बंद भी किया। मगर जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि की आवाज को क्या किसी जमाने में शासक वर्ग दबा सका है।....दरअसल फैज में जो क्रांति है उसे उन्होंने एक इश्किया जामा पहना दिया है।

कुछ परंपराएं, चाहे वे साहित्य की हों, संस्कृति की हों या अन्य सामाजिक क्षेत्रों की, अपनी एतिहासिक भूमिका निभाने के बाद अपनी मौत आप मर जाती हैं। उन्हें नए सिरे से जिलाने का मतलब गड़े मुर्दे उखाड़ना और ऐतिहासिक विकास से अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना है। लेकिन फैज की रचनाएं दोनों युगों के संधिकाल पर ही नहीं खडी हैं बल्कि आज के रचनाकारों को रास्ता भी दिखाती हैं। आज का शायद ही कोई मशहूर शायर हो जो फैज की छाया से बाहर निकलने का साहस दिखा सके। उनके किसी शेर उनका नाम पढ़े बिना हम बता सकते हैं कि यह 'फैज' का शेर है। उर्दू के एक बुजुर्ग शायर 'असर' लखनवी ने शायद बिलकुल ठीक लिखा है कि '' 'फै ज' की शायरी तरक्की के मदारिज (दर्जे' तय करके अब इस नुक्ता-ए-उरूज (शिखर-बिन्दु) पर पहुंच गई है, जिस तक शायद ही किसी दूसरे तरक्की-पसंद (प्रगतिशील) शायर की रसाई हुई हो। तखय्युल (कल्पना) ने सनाअत (शिल्प) के जौहर दिखाए हैं और मासूम जज्बात को हसीन पैकर (आकार) बख्शा है। ऐसा मालूम होता है कि परियों का एक गौल (झुण्ड) एक तिलिस्मी फजा (जादुई वातावरण) में इस तरह मस्ते-परवाज (उड़ने में मस्त) है कि एक पर एक की छूत पड़ रही है और कौसे-कुजह (इन्द्रधनुष) के अक्कास (प्रतिरूपक) बादलों से सबरंगी बारिश हो रही है......................।''
अपनी शायरी की तरह अपने व्यक्तिगत जीवन में भी किसी ने उन्हें ऊंचा बोलते नहीं सुना। बातचीत के अतिरिक्त मुशायरों में भी वह इस तरह अपने शेर पढ़ते हैं जैसे उनके होंठों से यदि एक जरा ऊंची आवाज निकल गई तो न जाने कितने मोती चकनाचूर हो जाएंगे। वे सेना में कर्नल रहे, जहां किसी नर्मदिल अधिकारी की गुंजाइश नहीं होती। कॉलेज की प्रोफेसरी की, जहां कॉलेज के लड़के प्रोफेसर तक को अपना स्वभाव बदलने पर विवश कर दें। उन्होंने पत्रकारिता जैसा जोखिम का पेशा भी अपनाया और फिर जब पाकिस्तान सरकार ने इस देवता-स्वरूप व्यक्ति पर हिंसात्मक विद्रोह का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया तब भी मेजर मोहम्मद इसहाक ('फैज' के जेल के साथी) के कथनानुसार, ''कहीं पास-पड़ोस में तू-तू मैं-मैं हो, दोस्तों में तल्ख-कलामी हो, या यूं ही किसी ने त्योरी चढ़ा रखी हो, उनकी तबीयत जरूर खराब हो जाती थी और इसके साथ ही शायरी की कैफियत (मूड) भी काफूर हो जाती थी।''

फैज जिंदादिल इंसान हैं, उन्होंने ता-उम्र क्रांति की मशाल को हाथ में थामे रखा। हालांकि क्रांति सफल नहीं हुई। ऐसे में जो क्रांतिकारी कवि हैं वे निराश होकर बैठ जाते हैं। कई तो आत्महत्या कर लेते हैं और कई जमाने को गालियां देते हैं। लेकिन फैज वैसे नहीं हैं। वे कहते हैं कि अभी फख्र करो कि तुममें जान बची है

बोल कि लब आजाद हैं तेरे
बोल जबां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है

उनका एक शेर है- ''करो कुज जबी पे सर-ए-कफन, मेरे कातिलों को गुमां न हो। कि गुरूर इश्क का बांकपन, पसेमर्ग हमने भुला दिया।'' अर्थात कफन में लिपटे हुए मेरे शरीर के माथे पर टोपी थोड़ी तिरछी कर दो, इसलिए कि मेरी हत्या करनेवालों का यह भरम नहीं होना चाहिए कि मरने के बाद मुझ में प्रेम के स्वाभिमान का बांकपन नहीं रह गया है। ऐसे थे हरदिल अजीज शायर फैज अहमद फैज।