जितनी बार गांव गया हूं, हर बार उसे एक जैसा पाया है। गांव को जोड़ने वाली करीब आठ किलोमीटर लंबी वही टूटी सड़क, दो मटकी सिर पर रखे और एक कांख में दबाए कुएं से पानी भरकर जातीं औरतें, कुएं के पास हमेशा एक ही मुद्रा में खड़ा बरगद का पेड़, खंभों पर लटके बिजली की राह तकते तार, चबूतरों पर बैठकर ताश खेलते लोगों का समूह- कुछ नहीं बदला।
बुंदेलखंड के बांदा जिले में बसे मेरे गांव की हमेशा यही तस्वीर जेहन में थी। गांव पहुंचने के लिए डग्गा (कई जगह इसे जुगाड़ भी कहा जाता है) से जाना पड़ता है। डग्गा की सर्विस बड़ी चुस्त-दुरुस्त है। यह हमेशा तय वक्त पर चलता है। इसे पकड़ने से चूके तो पैदल ही यात्रा करनी पड़ती है। लेकिन थोड़े दिनों पहले डग्गा से गांव गया तो वहां पहुंचते ही मेरे जेहन में बसी गांव की तस्वीरें टूटनी शुरू हुईं। पहला झटका गांव के बाहर खेत में खड़े मोबाइल टावर को देखकर लगा। बड़ा ताज्जुब हुआ कि जिस गांव में सरकार की तमाम योजनाओं ने पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया, जहां की सड़क लंबे अरसे से अपनी बदहाली पर रो रही हैं, जहां लोग मिट्टी के तेल की डिबिया जलाकर घरों में रोशनी करते हैं, वहां सूचना तकनीक ने दस्तक दे दी!
अपने गांव में वह टावर देखकर मैं सोच में पड़ गया कि आखिर इस उजाड़ और सूखे गांव में मोबाइल कंपनियों को क्या मिलेगा। लेकिन कुछ देर बाद ही पता चल गया कि मैं गलत था। मोबाइल कंपनी अपने मकसद में कामयाब हो गई थी। गांव के युवाओं के हाथों में सेलफोन देखकर यकीन हो गया कि बाजार मेरे दरिद्र गांव तक पूरी तैयारी के साथ पहुंचा है। गांव में मोबाइल क्रांति की वजह मोबाइल टावर ही था। पहले इक्का-दुक्का लोगों के पास ही मोबाइल फोन होता था। आसपास टावर न होने पर नेटवर्क नहीं आता था। गांव के बाहर या बगल के पहाड़ पर जाने पर फोन नेटवर्क पकड़ता था और बात हो पाती थी। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। टावर लगने पर ज्यादातर घरों में मोबाइल ने अपनी पैठ बना ली है। युवाओं के बीच अब चर्चा के विषय भी बदल गए हैं। अब अधिकतर बातें मोबाइल को लेकर ही होती हैं। मसलन, तेरा कौन सी कंपनी का फोन है, कैमरा है क्या, कितनी मेमरी है, कौन-कौन से गाने हैं आदि।
कई घरों में बात करने पर पता चला कि जब से मोबाइल टावर लगा है, युवा अपने गरीब मां-बाप पर मोबाइल के लिए दबाव बनाने लगे हैं। जिद पर अड़कर कई युवा मोबाइल हासिल भी कर चुके हैं। कुछ मां-बाप ने कर्जा लेकर बच्चों को मोबाइल दिलवाया है। हैरानी यह देखकर भी हुई कि मोबाइल टावर के लिए अलग से बिजली की लाइन पहुंची थी। गांव के घरों में भले ही अंधेरा हो लेकिन टावर की बिजली की खुराक में कमी नहीं आने दी गई थी। यह देखकर मैं सोचने लगा कि क्या प्राइवेट कंपनियां सरकारों के लिए उन लोगों से ज्यादा अहम हो गई हैं जिन्होंने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया है?
गांव में मोबाइल टावर
भागीरथ, शनिवार, 14 जनवरी 2012rail ki patriyaan
Riddhiculuos, बृहस्पतिवार, 3 नवम्बर 2011दर्ज़नो जिंदगियां चलती हैं
कुछ सुलझी हुई कुछ उलझी सी
कुछ खुद में गुम लोगो की दुनिया
कुछ दुसरो में ढून्दते अपनी सी दुनिया
धक्के से चढ़ते धक्के से उतरते
जीवन की पटरी भी ऐसी ही लगती है
रुक रुक के चलने वाली
चलते चलते रुक जाने वाली
कुछ हँसते चेहरे, कुछ नम आँखें
कई चीखती आवाजें, कुछ गुदगुदाती किस्से
नए अजीब रिश्ते
रेल की पटरियों पर रोज़
चलती है दर्ज़नो जिंदगियां
एक बुरा दिन, एक सुहानी शाम
कुछ यहाँ की, कुछ वहां की
एक अनजान सफ़र पर
चंद जाने पहचाने चेहरों के बीच
यह दुनिया अपनी सी लगने लगती है
फिर हर दिन जीवन की पटरियां
रेल की पटरियों से मिल कर
एक नयी कहानी लिख्ती हैं
और में इन सब के बीच
खुद को खड़ा देख सोचती हूँ
क्यूँ है
Akhil Katyal, शुक्रवार, 2 सितम्बर 2011सत्तर एम एम (70 MM): वहाँ कौन है तेरा मुसाफिर जायेगा कहाँ
krishna murari, बृहस्पतिवार, 11 अगस्त 2011मुझे बस
Akhil Katyal, बुधवार, 6 जुलाई 2011मौत, इतना इतरा मत - जॉन डन
Akhil Katyal, शनिवार, 16 अप्रैल 2011अब तू आज़ाद है विनायक
गुड्डा गुडिया, शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011अब तू आज़ाद है विनायक atmadarpan.blogspot.com/2011/04/blog-post.html
ये तीस तारीख वाला मैच
Akhil Katyal, रविवार, 27 मार्च 2011मुल्क चाहे जो भी जीते
अंदाज़ तो एक हि जीतेगा
युं बातें चाहें जिसकी जीतें
अल्फाज़ तो एक हि जीतेगा
हम खेल खेल में कुछ देर
'इंडिया' 'पाकिस्तान' करें
हम गेंदों और बल्लों कि ओर
थोड़ी देर युं ध्यान करें, पर
इधर से खेलो, उधर से खेलो
बात तो एक हि है बनती है
साठ साल कि सरहद ये
युं सर का दर्द हि बनती है
अपनों में गर हम हारें भी
तो है बस दिल हारने जैसा
युं धुन चाहे जिसकी जीते
साज़ तो एक हि जीतेगा
देर से ही सही -पर याद आये
deepak k singh, शुक्रवार, 25 मार्च 2011लेकिन इधर सुनते हैं की तुनिशिया,मिस्त्र, यमन, लीबिया आदि मुल्कों में इस दिवस को याद किया गया है , मनाया है। खबर है या अफवाह पता नहीं। हमे क्या लेना जी ।
वैसे खबर ये भी है-शायद अफवाह हो, कि देश के दूरदराज इलाकों में, जो दिल्ली से दूर हैं, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु,चंद्रशेखर, बिस्मिल व कई अन्य नामों के व्यक्तियों कि तलाश चल रही है, उन्हें वहां देखा गया है।
दांतेवाडा में जो कुछ अभी कुछ दिन पहले हुआ वो उसी धर पकड़ का नतीजा है।
इसी धर पकड़ में कुछ इस किस्म के स्वर भी सुनाई दिए- " निसार मैं तेरी गलियों के एय वतन के जहाँ चली है रस्म के कोई न सर उठा के चले ..... "
तेरा युं चले जाना भी तो इक निशाँ होगा
Akhil Katyal, मंगलवार, 15 मार्च 2011तेरा युं चले जाना भी तो इक निशाँ होगा
मेरा औरों को चाहना भी तो इक निशाँ होगा,
और जो अबस उदास रहा था मैं इतने दिन
युं हल्के से मुस्कुराना भी तो इक निशाँ होगा।
बात फिर से इस ज़माने से मैं करने लगा
तेरी नज़रों के पहर से मैं उभरने लगा,
जो गए दिन मैं दोस्तों से छूटा-छूटा सा था
युं फिर ये दोस्ताना भी तो इक निशाँ होगा।
वक्त कैसा जो उम्मीद का दूसरा नाम न हो
सज़ा कैसी जो फिर बन्दों पर रहमान न हो,
फिर से लिखने लगा जो मैं तेरी बातों के सिवा
कभी-कभी तुझे भूल जाना भी तो इक निशाँ होगा।
उस तरह कि मोहब्बत फिर कहाँ से कर पाऊंगा मैं,
इस शहर में अब दूसरा हि खेल आज़माऊंगा मैं,
ऐसा नहीं कि फिर बात कभी तुझसे करूंगा नहीं
बस अभी न कर पाना भी तो इक निशाँ होगा।
akhilkatyalpoetry.blogspot.com
तुम्हारा साथ ................!!!
गुड्डा गुडिया, सोमवार, 14 फरवरी 2011सुबह हो गई है, चलो खेत मैं सोने चलें .......|
तुम सड़क ओढ़ लेना, मैं आसमान बिछा देता हूँ
ज्यादा सर्दी लगे तो गेंहू की हरी बालें भी हैं ओढ़ने के लिए
तुम माटी के ढ़ेले का सिरहाना बना लेना
मैं कुलापे मैं बहते पानी को ||
तुम्हारा साथ ................!!
पूरी कविता के लिए थोड़ी मशक्कत यहाँ करें | लिंक पर जाएँ |
http://atmadarpan.blogspot.com/2011/02/blog-post_14.html
......सवाल और बड़ा हो गया है
संजय भास्कर, बुधवार, 8 दिसम्बर 2010पैट्रोल-डीजल के दाम फिर बढऩे वाले हैं
रसोई गेस फिर महंगी होने वाली है
फिर से फटने वाला है बादल
आम आदमी के सिर पर
भरपेट गुजारा कैसे होगा
होगा या नहीं होगा
सवाल और बड़ा हो गया है |
मेरी मंजिल.................संजय भास्कर
संजय भास्कर, शनिवार, 27 नवम्बर 2010यहाँ हर किसी कि अपनी मंजिल अपने रस्ते
कोई कुछ नहीं करता किसी के वास्ते ,
हर कोई रहता अपने ऐशो आराम में ,
उन्हें कुछ नहीं दिखता फायदा दया के काम में ,
मैं दुसरो का भला करे कि सोचता रहूँ ,
पर मेरे पास दान के लिए कुछ भी नहीं
मैं किसी को क्या कहूं ,
मानव के दुखों को देखकर रोता हूँ ,
अकेले बैठ उन्हें , उनके दुखों से छुटकारा दिलाने कि सोचता हूँ ,
पर यु खाली सोचने से कुछ बनता नहीं ,
गरीबो के दुखों को दूर करने के लिए धन चाहिए ,
पढता हूँ इसी मकसद से कि कुछ बन सकूं ,
ताकि दीन दुखियो के लिए कुछ कर सकूं ,
मुझे दुःख कि बीमारी लगती है निकम्मी ,
इसीलिए बनना चाहता हूँ स्वावलंबी ||
चित्र :- ( गूगल देवता से साभार )
मेरी नई ग़ज़ल
RAJESH KUMAR, मंगलवार, 16 नवम्बर 2010





मैं अपने हाथ में रखता हूं अब चाबी मुकद्दर की ।
ये दौलत भी मेरे अजदाद ने मुझको थमाई है ।।
वो होंगे और जो मुश्किल में तुमको देखके चल दें ।
मेरे मां बाप ने मुझको अलग आदत सिखाई है ।।
दे देंगे जान लेकिन बाज हम फिर भी न आएंगे ।
ये ज़िद मेरी अभी तक की उमर भर की कमाई है ।।
मैं हूं जिस हाल में खुश हूं मुझे छेड़ो न तुम ज्यादा ।
ये दौलत जो तुम्हें बख्शी गई हमने लुटाई है ।।
सफर में जो गए बाहर वो फिर वापस नहीं लौटे ।
कि हमने गांव में टिककर ही ये इज्जत बनाई है ।।
हमारे साथ तू न थी तो यही अंजाम था मेरा ।
बताओ हाल-ए-दिल मेरा तुम्हें किसने सुनाई है ।।
अंधरे समय के विरुद्ध, मुश्किलों से जूझती रोशनी के लिए आईये एक दीप जलाएं
नीरज कुमार, शनिवार, 6 नवम्बर 2010एक दो भी नहीं छब्बीस दिये
एक इक करके जलाये मैंने
उसने जलते हुये होठों से कहा
चाहे जिस मुल्क से गेहूँ माँगो
हाथ फैलाने की आज़ादी है
इक दिया नाम का खुशहाली के
उस के जलते ही यह मालूम हुआ
कितनी बदहाली है
पेट खाली है मिरा, ज़ेब मेरी खाली है
इक दिया नाम का यक़जिहती के
रौशनी उस की जहाँ तक पहुँची
क़ौम को लड़ते झगड़ते देखा
माँ के आँचल में हैं जितने पैबंद
सब को इक साथ उधड़ते देखा
दूर से बीवी ने झल्ला के कहा
तेल महँगा भी है, मिलता भी नहीं
क्यों दिये इतने जला रक्खे हैं
अपने घर में झरोखा न मुन्डेर
ताक़ सपनों के सजा रक्खे हैं
आया गुस्से का इक ऐसा झोंका
बुझ गये सारे दिये-
हाँ मगर एक दिया, नाम है जिसका उम्मीद
झिलमिलाता ही चला जाता है
-कैफ़ी आज़मी


