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खतरनाक आदमी

ड्राइवर सीट पर एक खतरनाक
आदमी बैठा है
इस सीट तक वो बेहिसाब
तिकड़म भिडाकर पहुंचा है
उसे प्राप्त है आशीर्वाद
अपने आकाओं का
जिन्हीने अयोग्य होते हुए भी
उसे सौंप दी है चाबी
उसका पास न तो 'लाइसेंस' है,
न ही अनुभव
उसकी सारी डिग्री भी
फर्जी हैं
हालाँकि देखने में नहीं लगता
उसमे कोई कमी है.
बहुत चालाक है वो,
सीट के सभी दावेदार
उसने साज़िश के तहत
ख़त्म कर दिए हैं
गाडी में बैठी सवारियां
सलामत रहें
इसके लिए जरूरी है
उसे गाडी से उतारना ।

उनकी भूख

उनकी भूख
नहीं मिटती रोटी से
सब्जी-चावल-दाल खाकर
नहीं पेट भरता उनका
उनकी प्यास का पानी से
नहीं है रिश्ता
उन्हें जायका लग चुका है
ताजे गोश्त का
गरमागरम रक्त का
उन्हें पसंद आते हैं
ढेर लाशों के
भूख उनकी वोटों की है..


सिक्कों की खनकती आवाजें
और एक खास किस्म की कुर्सी
जिसके पाए हड्डियों के 

चूर्ण से बने हैं
उसके बीचोंबीच भरा है
मासूमों का मुलायम मांस
उनकी रूह से मवाद
रिसता है दिनरात
उनके हाथों में कानून की
किताबें है
और जेब में रिवाल्वर
रातें उनकी साजिशों में गुजरती है
और फिर धीरे-धीरे
दंगे की आग सुलगती है। 

चूल्हे की आंच

पिछले दिनों गांव जाना हुआ तो कल्लू दादा के घर थोड़ी देर के लिए रुका। घर में करीब दस साल की उनकी पोती संगीता चूल्हे पर रोटियां बना रही थी। उसके चार छोटे भाई-बहन भूख से बिलबिला रहे थे और रोटियों का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। दो साल पहले संगीता की मां का देहांत हो गया था। अब तक पता नहीं चल पाया है कि उसे क्या हुआ था। लोग बताते हैं कि उसे अचानक पेट में दर्द हुआ। पड़ोस के गांव में एक झोलाछाप डॉक्टर को उसे दिखाया और रात में ही उसकी सांसें थम गईं। मां की मौत के बाद संगीता पर ही घर के कामकाज की सारी जिम्मेदारी आ गई। उसका ज्यादातर वक्त चूल्हा चौका और नल से पानी लाने में ही गुजरता है। इतना करने के बाद भी जरा सी गलती पर बाप का कोप भी झेलना पड़ता है। उसकी हालत देखकर एक अजीब सी बेचैनी होने लगी। जिस उम्र में उसके हाथ में कलम-किताब होनी चाहिए, उस उम्र में चूल्हे की आंच से उसके तपते बचपन को देखकर मैं भीतर से कराह उठा।

कल्लू दादा के घर उस दिन मेहमान आए थे। संगीता ने घर में पड़े आलुओं की दो तरकारी बना दी। सब्जी अब उनके यहां कभी-कभी ही बनती है। चटनी के साथ रोटी खाकर ही उनका पेट भरता है। उस दिन सब्जी बनी देख संगीता के छोटे भाई-बहन जिद करने लगे। संगीता ने सबकी कटोरी में 1-2 आलू के टुकड़े और खूब सारी तरी डाल दी। बच्चे मजे से खाना खाने लगे। सबके खाने के बाद संगीता के लिए सब्जी नहीं बची। उसे चटनी रोटी खाकर ही पेट भरना पड़ा। कल्लू दादा की गिनती पहले गांव के सबसे रईस किसानों में होती थी। 40-45 बीघा खेत से इतना हो जाता था कि जिंदगी आराम से चलती थी और काफी बच भी जाता था। लेकिन पिछले कुछ सालों से पड़ रहे सूखे ने बुंदेलखंड के तमाम किसानों की तरह उन्हें भी दाने-दाने को मोहताज कर दिया है। अब उन्होंने अपनी ज्यादातर खेती गिरवी रख दी है और बांदा में चौकीदारी कर रहे हैं।

पूछने पर उन्होंने बताया कि बारिश न होने पर अब खेती से लागत निकालने में भी मुश्किल होती है। ऐसे में बच्चों को पालने के लिए उन्होंने खेतीबाड़ी छोड़ दी और चौकीदारी करना ही बेहतर समझा। उन्होंने बताया कि कुछ वक्त बाद वे गांव भी छोड़ देंगे और बांदा में मजदूरी कर बच्चों को पढ़ाएंगे। कल्लू दादा से बात करने के बाद मुझे अखबार में छपी एक खबर याद आ गई। खबर में बताया गया था कि एक किसान ने खेत में जाकर जब अपनी फसल की हालत देखी तो वह बेसुध हो वहीं गिर पड़ा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। कुछ चीजें बाहर से देखने में शांत नजर आती हैं लेकिन उनके भीतर अथाह लहरें हिलोरें मार रही होती हैं। बुंदेलखंड के गांव भी ऐसे ही हैं। बाहर से देखने में शांत लेकिन हर घर में दुखों का बेहिसाब सिलसिला। दिल्ली लौटने पर मेरे जेहन में कई दिनों तक संगीता का मासूम चेहरा घूमता रहा।

The feeding frenzy of kleptocracy - The Hindu

The feeding frenzy of kleptocracy - The Hindu

प्रेम की ये रात


प्रेम की इस रात में 
कल के चमकते उजालों के लिए
मैंने प्रेम किया
अपने सिरहाने रखे उस फूल से
जिसने रात भर की कसमसाहट को
अपने यौवन की सलवटों से बदस्तूर पिघलते देखा 






एक सरगोशी हम पर तारी है
जो न पिघलती है न टपकती है 
बस रात भर बरसती है 



शब्द शर्मिंदा हैं 
भाषा बेचैन है 
मौन है तो मौन ही बोलेगा 

मौन की भाषा है 
शब्द नहीं बोलेगा।

खेद


मै कौन हूँ, कहाँ जा रहा हूँ?
मै बेखबर हूँ, खबर किसे है-खबर किसी को नही
हर कोई इसी उहा-पोह में हैं कि मै कौन हूँ?
तुम कौन हो? और हम कहाँ जा रहे हैं?
जा रहे हैं-जाना कहाँ है?
नही पता, किसी को भी नही पता

आज मै यहाँ हूँ
कल जाने कहाँ हूँ
तुम मेरे साथ हो
आज यहाँ हो-कल जाने कहाँ होगे

हर एक भरे हुए दिल में
खुला-खुला आसमान है
खाली इतना कि भरा बहुत कम है
भरा-भरा ऐसा है ज्यूँ भरने से रह गया है
खुला-खुला ऐसा है ज्यूँ खुलने से रह गया है

नाहक ही तो ये सारे खोज रहे हैं
उस गुत्थी का सुराग
जिसमे सुराख़ नही है
एक दोस्त ने कहा खेद है
ओजोन में छेद है
कब तक लेते रहेंगे हम
इस ओजोन के छेद की आड़
हकीक़त खुल गयी है
वरना छेद किसने देखा है !

जिन्हें खेद है
वो बेख़ौफ़ हैं
दरअसल ओजोन में नही
उनके खेद में छेद है
और ये छेद इतना भयानक है कि आप इस छेद की आड़ में
कितने भी खेद प्रकट कर सकते है
और इस खेद के लिए भी आपको खेद नही है
क्योंकि जिस ओजोन में छेद है
वहां पर छेद
छेद नही
एक खेद है
जिसे हम सदियों से
एक खेद के बहाने टाले जा रहे हैं

बसों में लटका भविष्य

काफी दिनों के बाद उस रोज सुबह उठा और घूमने निकल गया। सुबह-सुबह कंधों पर बस्ता टांगे और सज-धज कर बच्चे स्कूल जा रहे थे। अलग-अलग यूनिफॉर्म उन पर खूब फब रही थीं। बस स्टैंड पर बच्चों की बहुत भीड़ थी। उनमें ज्यादातर सरकारी स्कूलों के बच्चे थे जो आमतौर पर पब्लिक बसों या कोई और वाहनों से स्कूल जाया करते हैं। सभी को बसों का इंतजार था। काफी देर बाद कोई बस आती और बिना रुके ही आगे बढ़ जाती। कई बस ड्राइवर तो बच्चों को देखकर स्पीड दोगुनी कर लेते। यह देख कुछ बच्चे गुस्से में आकर ड्राइवर की मां-बहन एक करते और अगली बस का इंतजार करने लगते।

कोई-कोई बस ड्राइवर दरियादिली दिखाते हुए बस रोक देता तो बस ठसाठस भर जाती। अंदर एक इंच जगह न बचने पर बसों के दोनों दरवाजों पर दर्जनों बच्चे लटक जाते और किसी तरह जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंचते। उन्हें लटका देखकर एकबारगी लगता कि अगर उनका हाथ छूट गया तो...। हर बार लड़कियां और छोटे बच्चे सुस्त पड़ जाते और बसों में नहीं चढ़ पाते। बड़े बच्चों के जाने के बाद ही उनका नंबर आ पाता। यह सब देखकर मुझे अपने स्कूल के दिन याद आ गए। करीब 15 साल पहले मुझे भी इसी तरह बसों में लटककर स्कूल जाना पड़ता था। और अगर स्कूल पहुंचने में देर हो जाती तो स्कूल के पीटीआई (अनुशासन सुनिश्चित कराने वाले शिक्षक) मुर्गा बना देते, फिर स्कूल की सफाई कराते। कभी-कभी तो दो-चार डंडों का प्रसाद भी देते। तब से अब तक एक लंबा अरसा गुजर गया है।

दिल्ली के एक कोने से दूसरे कोने तक, यहां तक कि दूसरे शहरों तक मेट्रो फर्राटे भर रही है। कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन कर दिल्ली अपने आपको धन्य समझ रही है। रफ्तार और रोमांच का खेल फॉर्म्युला-1 दिल्ली के पड़ोस में आयोजित हो चुका है। फ्लाईओवरों और चौड़ी सड़कों के बीच भागती दिल्ली ने इस दौरान विकास की कई इबारतें लिखी हैं। इन सबके बीच अगर नहीं बदला तो घर से स्कूल और स्कूल से घर आने का जोखिम भरा सफर। घर से महज तीन या चार किलोमीटर दूर स्कूल जाने की व्यवस्था दिल्ली अपने बच्चों के लिए नहीं कर पाई है। मुझे याद है कि एक बार स्कूल की छुट्टी होने पर बच्चों की भारी भीड़ थी। कोई ड्राइवर बस नहीं रोक रहा था। बस में बच्चे न चढ़ जाएं यह सोचकर एक ब्लूलाइन बस के ड्राइवर ने स्पीड बढ़ा दी। इस दौरान एक बच्चा उसके नीचे आ गया और अपने दोनों पैर गंवा बैठा। इस तरह की खबरें अब भी आती रहती हैं। उस रोज सुबह-सुबह मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि दिल्ली की प्राथमिकताएं कितनी अजीब हैं। बच्चे बसों में जिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए भले ही स्कूल जाएं पर दिल्ली वालों को तो मॉल्स चाहिए। स्कूलों में हालात बेहतर हों, इससे ज्यादा जरूरी है मेट्रो घर के पास से गुजरे। मैं सोचने लगा कि अगर बच्चे सचमुच देश का भविष्य हैं, तो यह भविष्य कब तक बसों में लटका रहेगा?

पागलपन

कुलबुला रहीं हैं
सारी समस्याएँ
अपनी उलझनों के साथ
और बड़बड़ाहट के रूप में 
बाहर आ रहा है 
मेरा खुद का पागलपन 

न जाने कब 
मैंने खुद से 
बातें करना सीख लिया    

नीरज कुमार
(१३/०७/०४)
(गोरखपुर रेलवे स्टेशन)  

गांव में मोबाइल टावर

जितनी बार गांव गया हूं, हर बार उसे एक जैसा पाया है। गांव को जोड़ने वाली करीब आठ किलोमीटर लंबी वही टूटी सड़क, दो मटकी सिर पर रखे और एक कांख में दबाए कुएं से पानी भरकर जातीं औरतें, कुएं के पास हमेशा एक ही मुद्रा में खड़ा बरगद का पेड़, खंभों पर लटके बिजली की राह तकते तार, चबूतरों पर बैठकर ताश खेलते लोगों का समूह- कुछ नहीं बदला।

बुंदेलखंड के बांदा जिले में बसे मेरे गांव की हमेशा यही तस्वीर जेहन में थी। गांव पहुंचने के लिए डग्गा (कई जगह इसे जुगाड़ भी कहा जाता है) से जाना पड़ता है। डग्गा की सर्विस बड़ी चुस्त-दुरुस्त है। यह हमेशा तय वक्त पर चलता है। इसे पकड़ने से चूके तो पैदल ही यात्रा करनी पड़ती है। लेकिन थोड़े दिनों पहले डग्गा से गांव गया तो वहां पहुंचते ही मेरे जेहन में बसी गांव की तस्वीरें टूटनी शुरू हुईं। पहला झटका गांव के बाहर खेत में खड़े मोबाइल टावर को देखकर लगा। बड़ा ताज्जुब हुआ कि जिस गांव में सरकार की तमाम योजनाओं ने पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया, जहां की सड़क लंबे अरसे से अपनी बदहाली पर रो रही हैं, जहां लोग मिट्टी के तेल की डिबिया जलाकर घरों में रोशनी करते हैं, वहां सूचना तकनीक ने दस्तक दे दी!

अपने गांव में वह टावर देखकर मैं सोच में पड़ गया कि आखिर इस उजाड़ और सूखे गांव में मोबाइल कंपनियों को क्या मिलेगा। लेकिन कुछ देर बाद ही पता चल गया कि मैं गलत था। मोबाइल कंपनी अपने मकसद में कामयाब हो गई थी। गांव के युवाओं के हाथों में सेलफोन देखकर यकीन हो गया कि बाजार मेरे दरिद्र गांव तक पूरी तैयारी के साथ पहुंचा है। गांव में मोबाइल क्रांति की वजह मोबाइल टावर ही था। पहले इक्का-दुक्का लोगों के पास ही मोबाइल फोन होता था। आसपास टावर न होने पर नेटवर्क नहीं आता था। गांव के बाहर या बगल के पहाड़ पर जाने पर फोन नेटवर्क पकड़ता था और बात हो पाती थी। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। टावर लगने पर ज्यादातर घरों में मोबाइल ने अपनी पैठ बना ली है। युवाओं के बीच अब चर्चा के विषय भी बदल गए हैं। अब अधिकतर बातें मोबाइल को लेकर ही होती हैं। मसलन, तेरा कौन सी कंपनी का फोन है, कैमरा है क्या, कितनी मेमरी है, कौन-कौन से गाने हैं आदि।

कई घरों में बात करने पर पता चला कि जब से मोबाइल टावर लगा है, युवा अपने गरीब मां-बाप पर मोबाइल के लिए दबाव बनाने लगे हैं। जिद पर अड़कर कई युवा मोबाइल हासिल भी कर चुके हैं। कुछ मां-बाप ने कर्जा लेकर बच्चों को मोबाइल दिलवाया है। हैरानी यह देखकर भी हुई कि मोबाइल टावर के लिए अलग से बिजली की लाइन पहुंची थी। गांव के घरों में भले ही अंधेरा हो लेकिन टावर की बिजली की खुराक में कमी नहीं आने दी गई थी। यह देखकर मैं सोचने लगा कि क्या प्राइवेट कंपनियां सरकारों के लिए उन लोगों से ज्यादा अहम हो गई हैं जिन्होंने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया है?

rail ki patriyaan

ट्रेन की पटरियों पर
दर्ज़नो जिंदगियां चलती हैं
कुछ सुलझी हुई कुछ उलझी सी
कुछ खुद में गुम लोगो की दुनिया
कुछ दुसरो में ढून्दते अपनी सी दुनिया

धक्के से चढ़ते धक्के से उतरते
जीवन की पटरी भी ऐसी ही लगती है
रुक रुक के चलने वाली
चलते चलते रुक जाने वाली


कुछ हँसते चेहरे, कुछ नम आँखें
कई चीखती आवाजें, कुछ गुदगुदाती किस्से
नए अजीब रिश्ते
रेल की पटरियों पर रोज़
चलती है दर्ज़नो जिंदगियां

एक बुरा दिन, एक सुहानी शाम
कुछ यहाँ की, कुछ वहां की
एक अनजान सफ़र पर
चंद जाने पहचाने चेहरों के बीच
यह दुनिया अपनी सी लगने लगती है

फिर हर दिन जीवन की पटरियां
रेल की पटरियों से मिल कर
एक नयी कहानी  लिख्ती हैं

और में इन सब के बीच
खुद को खड़ा देख सोचती हूँ
क्या में भी इन्ही में से एक हूँ?

क्यूँ है


कितना है बदनसीब “ज़फ़र″ दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में - बहादुर शाह ज़फ़र (1775-1862)

जो तू कर पाए ना, ऐ खुदा, वो तेरा काम क्यूँ है,
तुझसे होता नहीं रहम तो रहीम तेरा नाम क्यूँ है।

तुम जब गए थे मेरे घर से, सब कुछ ले के गए थे,
फिर आज कल इन कमरों में तेरा सामान क्यूँ है।

बड़ी महंगी पड़ी ये नज़र, जो तुमने देखा हमको,
ये तो बता कि तेरे हर तोहफे का कोई दाम क्यूँ है।

जब बात एक, साज़ एक, कलाम एक, आवाम एक,
सरहद आइना हो, तो हिंदुस्तान-पाकिस्तान क्यूँ है।

ज़फ़र, तस्सल्ली रख, यार तो सिर्फ दिल में रहता है,
फिर मानो तो रंगून भी दिल्ली है, तू परेशान क्यूँ है।

बातों-बातों में हि, अखिल, तुम सर दुखाये थे अपना,
तो उससे फिर से बातें करने का ये अरमान क्यूँ है।


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मुझे बस

मुझे बस इक लोहे का टुकड़ा बना दे, रब, 
मैं उसकी बेल्ट का बकल बन जाऊं,
मुझे उसके कमरे का आइना बना दे, रब,
मैं रोज़ उसकी हि शकल बन जाऊं

मुझे रुकने का इरादा बना दे, ऐ खुदा, 
जो मैं आऊँ तो वो खुदा-हाफिज़ कह न सके,
मुझे घुटनों कि नरमी बना दे, ऐ खुदा,
मैं गुदगुदाऊँ, तो वो खुद में रह न सके

मुझे मेरे यार का मोबाइल फ़ोन बना दे, रब, 
मैं उसकी पैंट कि जेब में बैठा गाता रहूँ, 
जो डाले कभी वो अपनी शर्ट कि जेब में मुझे,  
मैं उसके दिल के करीब युं आता रहूँ


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देर से ही सही -पर याद आये

'शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का येही बाकी निशाँ होगा' शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के ये शब्द भले ही कुछ देर से याद आये लेकिन आये हैं। और ये केवल शायद मेरे साथ ही नहीं हुआ होगा। कुछ ऐसे भी होंगे जिन्हें याद भी रहा होगा। तो क्या फिर अगर शहीद दिवस आया। यूँ भी न जाने कितने ही दिवस आते जाते रहते हैं। कहाँ तक कोई उन्हें याद रखे।एहले वतन खुश है और हमारा सफ़र भी जारी है। जब हर तरफ खुशहाली है, चैन है, विकास है, उन्नति है, रोटी है, पानी है, मुफ्त इलाज, इन्शुरन्स,गाडी, बीवी-बच्चे,इत्यादि हैं वहां शहीद दिवस मनाने की या शहीद दिवस को याद रखने की किसे पड़ी है?

लेकिन इधर सुनते हैं की तुनिशिया,मिस्त्र, यमन, लीबिया आदि मुल्कों में इस दिवस को याद किया गया है , मनाया है। खबर है या अफवाह पता नहीं। हमे क्या लेना जी ।

वैसे खबर ये भी है-शायद अफवाह हो, कि देश के दूरदराज इलाकों में, जो दिल्ली से दूर हैं, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु,चंद्रशेखर, बिस्मिल व कई अन्य नामों के व्यक्तियों कि तलाश चल रही है, उन्हें वहां देखा गया है।
दांतेवाडा में जो कुछ अभी कुछ दिन पहले हुआ वो उसी धर पकड़ का नतीजा है।

इसी धर पकड़ में कुछ इस किस्म के स्वर भी सुनाई दिए- " निसार मैं तेरी गलियों के एय वतन के जहाँ चली है रस्म के कोई सर उठा के चले ..... "

तेरा युं चले जाना भी तो इक निशाँ होगा

तेरा युं चले जाना भी तो इक निशाँ होगा

मेरा औरों को चाहना भी तो इक निशाँ होगा,

और जो अबस उदास रहा था मैं इतने दिन

युं हल्के से मुस्कुराना भी तो इक निशाँ होगा।


बात फिर से इस ज़माने से मैं करने लगा

तेरी नज़रों के पहर से मैं उभरने लगा,

जो गए दिन मैं दोस्तों से छूटा-छूटा सा था

युं फिर ये दोस्ताना भी तो इक निशाँ होगा।


वक्त कैसा जो उम्मीद का दूसरा नाम न हो

सज़ा कैसी जो फिर बन्दों पर रहमान न हो,

फिर से लिखने लगा जो मैं तेरी बातों के सिवा

कभी-कभी तुझे भूल जाना भी तो इक निशाँ होगा।


उस तरह कि मोहब्बत फिर कहाँ से कर पाऊंगा मैं,

इस शहर में अब दूसरा हि खेल आज़माऊंगा मैं,

ऐसा नहीं कि फिर बात कभी तुझसे करूंगा नहीं

बस अभी न कर पाना भी तो इक निशाँ होगा।



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तुम्हारा साथ ................!!!

सुबह हो गई है, चलो खेत मैं सोने चलें .......|
तुम सड़क ओढ़ लेना, मैं आसमान बिछा देता हूँ
ज्यादा सर्दी लगे तो गेंहू की हरी बालें भी हैं ओढ़ने के लिए
तुम माटी के ढ़ेले का सिरहाना बना लेना
मैं कुलापे मैं बहते पानी को ||
तुम्हारा साथ ................!!


पूरी कविता के लिए थोड़ी मशक्कत यहाँ करें | लिंक पर जाएँ |

http://atmadarpan.blogspot.com/2011/02/blog-post_14.html

मेरी नई ग़ज़ल

मैं अपने हाथ में रखता हूं अब चाबी मुकद्दर की ।

ये दौलत भी मेरे अजदाद ने मुझको थमाई है ।।


वो होंगे और जो मुश्किल में तुमको देखके चल दें ।

मेरे मां बाप ने मुझको अलग आदत सिखाई है ।।


दे देंगे जान लेकिन बाज हम फिर भी न आएंगे ।

ये ज़िद मेरी अभी तक की उमर भर की कमाई है ।।


मैं हूं जिस हाल में खुश हूं मुझे छेड़ो न तुम ज्यादा ।



ये दौलत जो तुम्हें बख्शी गई हमने लुटाई है ।।


सफर में जो गए बाहर वो फिर वापस नहीं लौटे ।

कि हमने गांव में टिककर ही ये इज्जत बनाई है ।।


हमारे साथ तू न थी तो यही अंजाम था मेरा ।

बताओ हाल-ए-दिल मेरा तुम्हें किसने सुनाई है ।।

अंधरे समय के विरुद्ध, मुश्किलों से जूझती रोशनी के लिए आईये एक दीप जलाएं

एक दो भी नहीं छब्बीस दिये

एक इक करके जलाये मैंने

इक दिया नाम का आज़ादी के
उसने जलते हुये होठों से कहा
चाहे जिस मुल्क से गेहूँ माँगो
हाथ फैलाने की आज़ादी है

इक दिया नाम का खुशहाली के
उस के जलते ही यह मालूम हुआ
कितनी बदहाली है
पेट खाली है मिरा, ज़ेब मेरी खाली है

इक दिया नाम का यक़जिहती के
रौशनी उस की जहाँ तक पहुँची
क़ौम को लड़ते झगड़ते देखा
माँ के आँचल में हैं जितने पैबंद
सब को इक साथ उधड़ते देखा

दूर से बीवी ने झल्ला के कहा
तेल महँगा भी है, मिलता भी नहीं
क्यों दिये इतने जला रक्खे हैं
अपने घर में झरोखा न मुन्डेर
ताक़ सपनों के सजा रक्खे हैं

आया गुस्से का इक ऐसा झोंका
बुझ गये सारे दिये-
हाँ मगर एक दिया, नाम है जिसका उम्मीद
झिलमिलाता ही चला जाता है

-कैफ़ी आज़मी

दिल्ली मैं है अब काम नहीं, काम न वेल्थ




सर पर गठरी |
हाथ में छोटे से बच्चे की छोटी छोटी उंगलियाँ, और एक बच्चा गोद में |
सूखा पड़ा गाँव मैं, जीने की कोई गारंटी नहीं |
खचाखच भरा प्लेटफार्म, दिल्ली जाने की होड़ |
पारा 40 पार, स्टेशन पर पानी नहीं |
असमंजस में माँ, कि पानी ढूंढे या रेल |
मैली, कुचैली सी एक थैली में एक छोटी सी पोटली |
पोटली में छिपा है एक खजाना |
40 रूपये के बंधे नोट और कुछेक सिक्के |
और साथ में है बासी रोटियों का खजाना |
जब जब बिलखेंगे बच्चे, देखेंगे माँ की और बड़ी ही आस से,
दे दी जाएगी चूसने को यही रोटी, लोलीपॉप की तरह |
रेल आई, वह कब चढ़ी, पता नहीं , भीड़ जो बहुत थी |
कहने को तो रेल बहुत बड़ी थी, 20 डिब्बे रहे होंगे
पर उसके और उसके जैसों के लिए तो 2 ही डिब्बे थे, एक इंजन से लगा और एक पीछे को |
जब झपकी खुली तो मथुरा में गिनती चल रही थी, लोगो की, सबको उतारा जा रहा है वहीँ पर
दिल्ली में अब काम नहीं है, वहां काम न वेल्थ है |
वह अब खड़ी है प्लेटफार्म पर
और सोच रही है कि, जाये तो जाये कहाँ ??????

प्रशांत कुमार दुबे

किस भाँति जगे जन चेतनता....









प्रसिद्ध साहित्यकार -डॉ० तुकाराम वर्मा
के स्वर में उनके दो छंदो का आस्वादन
कीजिए।


प्रस्तोता
-डॉ० डंडा लखनवी

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बाढ़ किसी भी वक़्त आ सकती है

इस कविता की हस्तलिखित प्रति मेरे पास सुरक्षित है और कवि का हस्ताक्षर है नाम नहीं है। जिस कवि की ये रचना हो वो कृपया सूचित करे जिससे उसके नाम पर इसे दुबारा प्रकाशित किया जा सके- सूर्या

देह की तलहटी में जमी हुई काई

और गुस्से के उपर

ठहरा हुआ रक्त

चरमराती हुई हड्डियों

से पूछता है

कब तक चलेगा बाँध?

बाढ़ किसी भी वक़्त आ सकती है.

कचरा सेठ

डायन

डायन है सरकार फिरंगी, चबा रही हैं दांतों से,
छीन-गरीबों के मुहं का है, कौर दुरंगी घातों से।
जिस तरह से एक समय में फिरंगी सरकार डायन थी उसी तरह से आज महंगाई डायन हो गयी है. उस फिरंगी सरकार और वर्तमान सरकार के बीच कई दशकों का फासला है लेकिन अभिव्यक्ति के स्वर और उनके आयाम नही बदले. आखिर इस सरकार और महंगाई के लिए कोई पुरुष उपमा भी तो दी जा सकती थी ?

यह पहली बार नही है जब डायन शब्द का इस्तेमाल समाज में व्याप्त किसी बुराई को दर्शाने के लिए किया गया हो. रांगेय राघव ने फिरंगी सरकार की फितरत बताने के लिए डायन का इस्तेमाल किया था लेकिन आज इस दौर में जब डायन प्रथा निरोधी अधिनियम को लागू किया जा रहा है वहां महंगाई को डायन का रूप देने से स्त्री की पहचान और छवि को गहरा आघात लग सकता है.

हमारे देश में जादू-टोना करने वाले पुरुष को ओझा कहा जाता है जिसको समाज में सम्मान की नज़रों से देखा जाता है लेकिन वहीँ ऐसी महिलाओं को डायन कहा जाता है और डायन की छवि ऐसी बन गयी है की वह किसी को भी अपने जादू-टोने से ख़तम कर सकती है पीपली लाइव के शब्दों में-सखी सैयां तो खूबे कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है. इस गाने की लोकप्रियता एक तरफ तो महंगाई की मार झेल रहे लोगों की आवाज बन रही है दूसरी तरफ उन सैकड़ों महिलाएं जिनका डायन के नाम पर पुरुष समाज शोषण कर रहा है उनके शोषण को बढ़ावा भी दे रहा है जो की सीधे-सीधे एक कुप्रथा और अन्धविश्वास को बढ़ावा देना है 

जिस तरह से एक समय में फिरंगी सरकार डायन थी उसी तरह से आज महंगाई डायन हो गयी है. उस फिरंगी सरकार और वर्तमान सरकार के बीच कई दशकों का फासला है लेकिन अभिव्यक्ति के स्वर और उनके आयाम नही बदले. आखिर इस सरकार और महंगाई के लिए कोई पुरुष उपमा भी तो दी जा सकती थी ? सवाल सिर्फ इतना ही नही है बल्कि मानसिकता का है. असल में हमारे पुरुष-प्रधान समाज ने अपने मतलब की खातिर डायन की ऐसी छवि विकसित की है जो गाँव के लोगों पर काला जादू करती है और उन्हें अपने वश में कर लेती है और उनसे अपना मनमाना काम कराती है लेकिन सच्चाई कुछ और है बिहार-झारखण्ड में हर साल सैकड़ों महिलाएं इसकी शिकार बनाई जाती है, किसी को नंगाकर गाँव में घुमाया जाता है, किसी को पेंड से बाँधकर पीटा जाता है, किसी को जिंदा जला दिया जाता है  और कितनो की तो मार-मारकर हत्या कर दी जाती है. 

रवीन्द्र केलेकर को श्रद्धांजलि

गाँधीवादी विचारक, कोकणी एवं मराठी के शीर्षस्थ लेखक और पत्रकार रवीन्द्र केलेकर का कल गोवा में देहावसान हो गया। कोंकणी भाषा के लिए दिए गए पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित रवीन्द्र केलेकर का जन्म सन १९२५ में हुआ था। उनकी अभी तक कोंकणी, हिन्दी व मराठी में विविध विधाओं के अंतर्गत बत्तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है।

केलेकर का लेखन संघर्षशील चेतना की अदभुत अभिव्यक्ति है। उन्होंने व्यक्तिगत जीवन की कथा-व्यथा न लिखकर जन-जीवन के विविध, पक्षों, मान्यताओं और व्यक्तिगत विचारों को देश और समाज के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है। अनुभवी विमर्श से अपने चिन्तन की मौलिकता के साथ ही विविध प्रसंगों के माध्यम से मानवीय सत्य तक पहुँचने की सहज चेष्टा है। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार के अलावा पद्मभूषण, भाषा भारती सम्मान, साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, गोवा कला अकादमी पुरस्कार, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय पुरस्कार, गोमन्त शारदा पुरस्कार आदि प्राप्त हो चुके हैं।

कैसे

यहाँ हर दिल में है दोज़ख की आग, उसको बुझायें कैसे,
ज़मीन की इस जन्नत को फिर से जन्नत बनाएं कैसे।

पत्थर कश्मीर कि सड़कों पर गिर कर भी घिसते नहीं,
हिन्दुस्तां हर पत्थर से आज़ादी का नाम मिटाये कैसे।

चाहते तो ये हैं कि बदल दें जो खुदा ने तकदीर में लिखा,
पर उसके कागज़ पर उसका हि दस्तख़त हम बनाएं कैसे।

ऐ तेहरीक के अजनबी, जो लब्ज़ लिखे थे तुम्हारी शहादत
के पहले, अब हर उस कसीदे को मर्सिया हम बनाएं कैसे।

फुरसत हो, ऐ नबी, तो फिर से आना हमारी दुनिया में,
ये न सोचना कि इतना होने के बाद अब हम जाएँ कैसे।

ख़त तो तुम लिखने बैठे, अखिल, पर इस वतन में डाकखाने

हि नहीं, अब अपना पैगाम उस मुल्क तक पहुँचवायें कैसे।




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लिखता हूं, ताकि कुछ तो हलचल हो-प्रेमपाल शर्मा

कहानी-लेखन का विचार सबसे पहले कैसे आया?
मैं पश्चिम उत्तरप्रदेश के एक गांव में पैदा हुआ हूं। घर का पुश्तैनी काम खेती करना था। अक्सर मेरा बचपन खेल में हल चलाते ही बीता है। हालांकि पिताजी प्राइवेट नौकरी में थे। घर में साहित्यिक पत्रिकाएं आती रहती थीं। कहानियों से मेरा पहला परिचय उन्हीं किताबों को पढक़र हुआ। प्रेमचंद को मन से पढा। मन्मथनाथ गुप्त के क्रान्तिकारी विचारों ने काफी प्रभावित किया। इसी मोड पर मेरी पहली कहानी 'ऊपरी व्याधा' आई, जिसमें पडाेस में रहने वाली एक भाभी का जिक्र है, जो काफी झगडालू स्वभाव की है। उसपर अक्सर गांव की भाषा में कहें तो भूत आ जाता था। ऐसा करने के पीछे कारण यह था कि उसे लोगों की सहानुभूति मिल जाती थी। उसके बाद कहानी आई 'दलित दोस्त'। वह एक बडे परिवार से आता था। मेरे घर उसका बराबर आना-जाना था। गांव के माहौल में ये चीजें अलग रूप न ले लें, इस बात से भी डरा रहता था। मैंने मां को कभी उसकी जाति के बारे में नहीं बताया। दरअसल दिमाग में ये था कि आखिर बताऊं भी तो क्यों बताऊं? तीसरी कहानी आई 'दोस्त' जो बाद में किसी और नाम से छपी। इसके बाद 'मां और बेटा' जिसमें एक ऐसे दोस्त का जिक्र है जो अपनी मां की मौत को भी बहुत ही हल्के रूप से लेता है। इसके बाद तो कहानी लिखने का लंबा सिलसिला चलता रहा।

साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने का सिलसिला कब शुरू हुआ?
'सारिका' में एक नियमित कॉलम छपता था 'आते हुए लोग' जिसमें मेरी पहली कहानी छपी 'तीसरी चिट्ठी'। तब तक मेरी नौकरी दिल्ली के रेल विभाग में लग चुकी थी। नौकरी के एक दो साल बाद जब गांव जाना हुआ, तो आस-पास के लोग कहने लगे- 'बेटा, अब तुम तो दिल्ली में सेटल हो ही गए हो, तो मेरे बच्चे को भी कहीं ढंग की जगह पर लगा दो।' हालांकि उन दिनों भी किसी के लिए नौकरी लगाने की स्थिति बडी विकट होती थी। बीच-बीच में नौकरी से जब समय मिलता, इधर-उधर हाथ भी मारता रहता था। लेकिन जब उसकी गांव में शादी हो गई, तो सोचा बुला ही लेता हूं दिल्ली। परिवार के लोगों ने कहा-भई, बुला तो लोगे, पर रखोगे कहां। उन दिनों किराए के छोटे से कमरे में रहना होता था। पत्नी की चिंता भी जायज थी। असमंजस में चिट्ठी का जवाब ही नहीं दिया। बाद में पता चला कि उसने पारिवारिक परेशानियों से आजिज होकर किसी सिंदूर फैक्ट्री में नौकरी कर ली, जिसके रासायनिक वातावरण में काम करने से उसको सांस की बीमारी रहने लगी और जल्द ही उसकी मौत भी हो गई। आज भी उस घटना को याद करता हूं तो सिहर जाता हूं। एक ही बात जेहन में रहती है कि काश, उसको दिल्ली ही बुला लिया होता। इस कहानी के बाद तो हंस, सारिका, दिनमान, आजकल में छपने लगा। लोग पूछते हैं कि गांव पर ज्यादा कहानियां क्यों नहीं लिखी। सोचता हूं, महानगर की भाग-दौड से फुरसत मिले तो इनपर जरूर लिखूं।


नौकरी की व्यस्तताओं के बीच कहानी-लेखन को साधना तो बडा मुश्किल होता होगा...
हां, कॉलेज से निकलते ही नौकरी में चला आया था। वो 77 का दौर था। इमरजेंसी के दौरान जेपी मूवमेंट से जुडने के कारण राजनीतिक और बौध्दिक स्तर पर सक्रियता बढ ग़ई थी। पहली प्रयास में ही आईएएस के इम्तिहान में सर्वोच्च स्थान पाने में सफल हुआ तो इसके पीछे वजह मेरी राजनीतिक सक्रियता को ही था, न कि कॉलेज की पढाई। पहले साहित्य मेरे लिए पहले स्थान पर था, नौकरी बाईप्रोडक्ट। लेकिन देखते-देखते प्राथमिकताएं बदलीं और नौकरी की आपा-धापी ने पहला स्थान ले लिया। लेकिन इन व्यस्तताओं के बीच थोडा भी समय मिलता है, तो उसे साहित्य-साधना में लगाता हूं।


आपने 'चूहा और सरकार' व्यंग्य में सरकारी अधिकारियों के विदेश यात्रा के बहाने तलाशने, भाई-भतीजावाद और इसमें सामाजिक न्याय का ख्याल रखने को प्रमुखता से उठाया है। क्या चूहे पकडने के मामले में भी हमें विदेशों से सीखने की जरूरत महसूस होती है?
मैंने विदेश यात्राओं पर कई कहानियां लिखी हैं। विदेश यात्राओं में जाने वाले सरकारी अधिकारियों में भी वरिष्ठ और कनिष्ठ का खास ख्याल रखा जाता है। मैंने इसके पीछे का सच भी देखा है। जब सरकारी अधिकारी विदेश दौरे पर जाते हैं, तो अपनी भूखी, अतृप्त इच्छाओं को दबा नहीं पाते। चाहते हैं कि तमाम विदेशी चीजों को घर में बटोर लें। इसपर मैंने एक कहानी 'मेड इन इंग्लैंड' लिखी है, जिसमें ऐसे अधिकारियों को ही ध्यान में रखकर लिखा गया है। दूसरी कहानी पेटू सरकारी अधिकारियों पर लिखा गया 'पिज्जा और छेदीलाल' जिसकी हजार प्रतियां देखते ही देखते रेलवे के अधिकारियों ने ही खरीद लीं। कहानी अप्रत्याशित रूप से चर्चा में रही। दरअसल ऐसी जगहों पर जाने के बाद प्रशिक्षण का ख्याल इनके मन में नहीं रहता। बस एक ख्याल होता है कि इसे अपने निजी टूर में कैसे बदलें। उनकी पत्नियां दूसरों पर विदेश यात्रा का रौब गांठने के लिए अक्सर चर्चा करती हैं। विदेश यात्रा बच्चों को बताने की चीज भर बनकर रह जाती है। इसमें ट्रेनिंग का अर्थ कहीं खो जाता है।


कथाकार संजीव जिनकी आर्थिक बदहाली का जिक्र कभी आपने अपनी रचनाओं में किया है, की तरह ही राजधानी के वैसे साहित्यकार नहीं रह रहे जिनके पास रोजगार का कोई दूसरा विकल्प नहीं।
संजीव की अच्छी याद दिलाई आपने, दोस्त। दरअसल साहित्य में कई ऐसे लोग हैं, जो अच्छा लिख-पढ रहे हैं, लेकिन उनको वो जगह नहीं मिल पाती। दिल्ली में कई ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो अबूझ कविताएं लिख रहे हैं, लेकिन किसी अकादमी के अध्यक्ष पद पर सुशोभित हैं, तो कोई संस्कृति मंत्रालय से फेलोशिप ले रहे हैं। क्या संजीव जैसा गंभीर लेखक प्रूफ रीडिंग कर एक छोटे से कमरे में जिंदगी गुजार देगा, जो राजनीति की चांडाल-चौकडी में अपने को असहज महसूस करता है। संजीव ने अपने एक कहानी में इस बात को गंभीरता से उठाया है कि कैसे डॉक्टरी की तैयारी करती नायिका संघमित्रा माओवादियों के संपर्क में आ जाती है? सामंतवादी व्यवस्था की चूलें हिलाने के लिए कॅरियर को भी दांव पर लगाने को तैयार दिखती है। कोई किन परिस्थितियों में माओवादी बनता है, इसका कच्चा चिट्ठा संजीव ने बहुत पहले ही अपनी रचनाओं में व्यक्त किया है।


आपने एक जगह कहा था कि स्वतंत्र भारत के यथार्थ से तो स्वतंत्रता के पहले का यथार्थ अच्छा था। क्या अभी भी ऐसा महसूस करते हैं?
हमारे यहां आजादी के समय गणेश शंकर विद्यार्थी, अज्ञेय, निराला, महादेवी वर्मा की लंबी परंपरा रही है। राष्ट्रीय मसलों में इनकी भागीदारी तो होती ही थी, साथ ही गांधी, नेहरू के संपर्क में निरंतर अपने को निखारते भी थे। राजमोहन गांधी का भाषण सुना जिसमें उन्होंने 'यूनिटी इन इनिमिटी' का जिक्र किया है यानी शत्रुओं के बीच एकता। इकट्ठे तो हो गए एक शत्रु को देखकर, लेकिन आगे क्या करना है, इसका पता नहीं। आजादी के बाद गांधी की कांग्रेस से दूरी बढती गई, तो नेहरू गांधीवादी खेमे से दूर अपनी गोटी बिठाने मे लगे रहे, पटेल अलग अपना राग अलापते रहे। सभी आदर्श लडख़डाकर बिखर गए। आज के दौर में 70 के बाद जो पतन हुआ या फिर ग्लोबलाइजेशन के बाद की बात करें तो समाज का अधोपतन ही हुआ है। हम गर्त में नीचे और नीचे गिरते जा रहे हैं।
छल-कपट समाज में हावी होता जा रहा है। संबंधों का ताना-बाना बिखर गया है। हम गरीबी पैदा कर रहे हैं। आज दुख के साथ कहना पड रहा है दोस्त, शायद देश की आजादी समर्थ हाथों में नहीं सौंपी गई, इसलिए हमारा यह हाल हुआ है।
आज कल आप क्या कर रहे हैं?
पिछले दिनों 'अजगर करे ना चाकरी' तीसरा कहानी-संग्रह छपा है, जिसकी नामवर जी ने एक चैनल पर काफी तारीफ भी की है। नए कहानी-संग्रह पर काम कर रहा हूं। हर उस विधा पर लिखना चाहता हूं, जिससे समाज में कुछ परिवर्तन की गुंजाइश बनती हो।
वरिष्ठ कथाकार प्रेमपाल शर्मा से चंदन राय की बातचीत पर आधारित