Visit blogadda.com to discover Indian blogs कठफोड़वा: March 2010

शिक्षा एक सपना ही बना हुआ है


आजादी के छह दशक से अधिक समय गुजरने के बावजूद आज भी देश में सबके लिए शिक्षा एक सपना ही बना हुआ है। देश में भले ही शिक्षा व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने की कवायद जारी है, लेकिन देश की बड़ी आबादी के गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने के मद्देनजर सभी लोगों को साक्षर बनाना अभी भी चुनौती बनी हुई है। सरकार ने हाल ही में छह से 14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा प्रदान करने का कानून बनाया है, लेकिन शिक्षाविदों ने इसकी सफलता पर संदेह व्यक्त किया है क्योंकि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जद्दोजहद में लगा हुआ है।
सरकार के प्रयासों के बावजूद प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। इनमें बालिका शिक्षा की स्थिति गंभीर है।

संजय भास्कर 

लो क सं घ र्ष !: भारत सरकार का विज्ञापन है या निम्नकोटि के शोहदों का उवाच

पहले माओवादियों ने खुशहाल जीवन का वादा किया
फिर, वे मेरे पति को अगवा कर ले गए
फिर, उन्होंने गाँव के स्कूल को उड़ा डाला
अब, वे मेरी 14 साल की लड़की को ले जाना चाहते हैं
रोको, रोको, भगवान के लिए इस अत्याचार को रोको

यह विज्ञापन भारत सरकार के गृहमंत्रालय द्वारा जनहित में जारी किया गया है अब, वे मेरी 14 साल की लड़की को ले जाना चाहते हैं यह बात संभावनाओं पर है और इस तरह के आरोप प्रत्यारोप मोहल्ले के तुच्छ किस्म के शोहदे किया करते हैं। भारत सरकार के विज्ञापनों में इस तरह के अनर्गल आरोप लगाने की परंपरा नहीं रही है । गृह मंत्रालय माओवाद के कार्य क्रियाशील क्षेत्रों में भ्रष्टाचार को समाप्त करता है। विधि सम्मत व्यवस्था जब समाप्त होती है तब हिंसा का दौर शुरू होता है । आज देश की राजधानी दिल्ली से लेकर लखनऊ तक प्रत्येक विधि सम्मत कार्य को करवाने के लिए घूश की दरें तय हैं . घुश अदा न करने पर इतनी आपत्तियां लग जाएँगी की इस जनम में कार्य नहीं होगा। एक सादाहरण सा ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने में अच्छे-अच्छे लोगों को दलाल का सहारा लेना पड़ता है और तुरंत कार्य हो जाता है यदि आप अपना लाइसेंस बगैर घूश के बनवाना चाहते हैं तो कई दिनों की प्रक्रिया बनवानी पड़ेगी जिसमें आपका हर तरह से उत्पीडन किया जायेगा। चौराहे पर ट्राफ़िक पुलिस की भी ड्यूटी उसको चौराहे की वसूली के आधार पर मासिक देने पर ही लगती है और भ्रष्टाचार का यह रूप गृह मंत्रालय को नहीं दिखता है। राजधानी से दूर के हिस्सों में अधिकारीयों का जंगल राज है और अधिकारियों द्वारा सीधे सीधे आदिवासियों व किसानो के यहाँ डकैतियां डाली जा रही हैं जिसका विरोध होना लाजमी है। कौन सा कुकर्म इन लोगो ने गाँव की भोली जनता के साथ नहीं किया है । मैं माओवाद समर्थक नहीं हूँ लेकिन इस भ्रष्ट तंत्र के साथ भी नहीं हूँ यदि समय रहते भारत सरकार ने अपने नौकरशाहों को भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं किया तो देश की सारी सम्पदा उनके बैंक खातों में ही नजर आएगी। इस तरह के विज्ञापन जारी कर गृहमंत्रालय समझ रहा है की हम चरित्र हत्या कर के अपनी असफलताओं को छिपा लेंगे। एस.पी.एस राठौर, के.पि. एस गिल जैसे अधिकारियों को सरकार माओवादी घोषित क्यों नहीं करती ? अब सरकार को चाहिए की अपने कर्मचारियों और अधिकारियों के चरित्र चित्रण आए दिन मीडिया में छाए रहते हैं उसकी ओर ध्यान दे।

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

आजादी के इन महानायकों को हम भी याद करते हैं


मेरा रंग दे बसंती चोला, माहे रंग दे। इन लाइनों को सुनने के बाद देश पर जान कुर्बान करने वाले भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की यादें ताजा हो जाती हैं। दो साल पहले भी एक फिल्म रंग दे बसंती के जरिए देश के युवाओं में भ्रष्टाचार आदि से लड़ने की अलख जगाने का प्रयास किया गया। युवाओं के इस देश में कुछ हलचल भी दिखी, लेकिन कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा। सच तो यह है कि आज एक बार फिर ऐसे ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू जैसे युवाओं की जरूरत है जो भारत को भ्रष्टाचार, अपराध समेत कई समस्याओं से निजात दिला सकें। भारत मां के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले इन तीनों क्रांतिकारियों को 23 मार्च 1931 को ही फांसी दी गई थी।
आजादी के इन महानायकों को भी हम भी याद करते हैं |


संजय भास्कर  
आदत.. मुस्कुराने की तरफ से 

लो क सं घ र्ष !: वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते


शहीद दिवस के अवसर पर विशेष

जिस पर अपना सर्वस्व लुटाया, जिसके खातिर प्राण दिए थे।
वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते॥
आँख सजल तुम्हारी होती, प्राणों में कटु विष घुल जाता।
पीड़ित जनता की दशा देखकर, ह्रदय विकल व्यथित हो जाता ॥
जहाँ देश के कर्णधार ही, लाशों पर रोटियाँ सेकते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
तुम जैसे वीर सपूतों ने, निज रक्त से जिसको सींचा था।
यह देश तुम्हारे लिए स्वर्ग से सुन्दर एक बगीचा था॥
अपनी आँखों के समक्ष, तुम कैसे जलता इसे देखते ।
वीर भगत सिंह आज अगर........
जिस स्वाधीन देश का तुमने, देखा था सुन्दर सपना।
फांसी के फंदे को चूमा था, करने को साकार कल्पना॥
उसी स्वतन्त्र देश के वासी, आज न्याय की भीख मांगते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
अपराधी, भ्रष्टों के आगे, असहाय दिख रहा न्यायतंत्र।
धनपशु, दबंगों के समक्ष, दम तोड़ रहा है लोकतंत्र।
जहाँ देश के रखवालों से, प्राण बचाते लोग घुमते॥
वीर भगत सिंह आज अगर........
साम्राज्यवाद का सिंहासन, भुजबल से तोड़ गिराया था
देश के नव युवकों को तुमने, मुक्ति मार्ग दिखाया था॥
जो दीप जलाये थे तुमने, अन्याय की आंधी से बुझते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
जिधर देखिये उधर आज, हिंसा अपहरण घोटाला है।
अन्याय से पीड़ित जनता, भ्रष्टाचार का बोल बाला है॥
लुट रही अस्मिता चौराहे पर, भीष्म पितामह खड़े देखते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
साम्राज्यवाद के प्रतिनिधि बनकर, देश लुटेरे लूट रहे।
बंधुता, एकता, देश प्रेम के बंधन दिन-दिन टूट रहे॥
जनता के सेवक जनता का ही, आज यहाँ पर रक्त चूसते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
बंधू! आज दुर्गन्ध आ रही, सत्ता के गलियारों से।
विधान सभाएं, संसद शोभित अपराधी हत्यारों से।
आज विदेशी नहीं, स्वदेशी ही जनता को यहाँ लूटते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
पूँजीपतियों नेताओं का अब, सत्ता में गठजोड़ यहाँ।
किसके साथ माफिया कितने, लगा हुआ है होड़ यहाँ ॥
अत्याचारी अन्यायी, निर्बल जनता की खाल नोचते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
शहरों, गाँवों की गलियों में, चीखें आज सुनाई देती।
अमिट लकीरें चिंता की, माथों पर साफ़ दिखाई देती॥
घुट-घुट कर मरती अबलाओं के, प्रतिदिन यहाँ चिता जलते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
घायल राम, मूर्छित लक्ष्मण, रावण रण में हुंकार रहा।
कंस कृष्ण को, पांडवों को, दुःशासन ललकार रहा॥
जनरल डायर के वंशज, आतंक मचाते यहाँ घूमते।
वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते॥


-मोहम्मद जमील शास्त्री
( सलाहकार लोकसंघर्ष पत्रिका )
शहीद दिवस के अवसर पर भगत सिंह, राजगुरु सहदेव को लोकसंघर्ष परिवार का शत्-शत् नमन

नाम गांव का अनाम कवि


बिहार के ऑफिसियल मानचित्र पर बांका ज़िले के बीचों बीच भितिया गांव साफ दिखाई देता है।अपनी आदिवासी पृष्ठभूमि साफ सुथरा रहन सहन,वन्य संपदा और जागरुक लोगों की वजह से पूरे इलाके में अपनी खास पैठ रखता है...। तमाम लोग ऐसे हैं जिनकी वजह से इस गांव की अलग ही पहचान है..।लेकिन यहां मैं एक सख्स से खासा प्रभावित हूं..। जिन्होंने अपनी कलम को लोकप्रियता का हथियार न बनाते हुए...उसे अपना धर्म मान लिया..। इस कलम के सिपाही ने कभी भी वो हथकंडे नहीं अपनाए, जिनका आज के साहित्य में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है..। जिस राही की कहानी मैं बताने जा रहा हूं उन्होंने अपनी ज़िंदगी का सफर इस कहावत से शुरू किया था कि ..

लीक लीक सब चले...लीक पे चले कपूत..

बिना लीक के तीन चले...शायर शेर सपूत...

और बस फिर क्या था नियति को चाहे जो मंजूर हो , शायर ने कह दिया कि मैं न तो ज़माने की नपी नपाई लीक पर चलूंगा..। और नही उस धंधे में फिट हो जाउंगा जिसे पूर्वजों ने हमारे लिए चुना है..। जब किताबों में खोए रहने की उम्र थी.. तब हाथों में बंदूक थाम ली..वजह भी कोई खास नहीं ..बस यूं ही वीरानों में बेवजह धमाके करने का मन बना लिया था...। हां राह-ए-शौक में कुछ और चीजें थी..मसलन जुर्म के ख़िलाफ क़लम चलाने का जुनून..। लेकिन वहां तो बंदूक का नाम लेना तक गंवारा नहीं था ...। लिहाजा होनी को कुछ और ही मंजूर था...। तभी तो हाथों में असलहे और होठों पर गीत...। यहीं से शुरु होता है हमारे प्रिय अप्रकाशित कवि भूप नारायण मिश्र का...। अब ये अलग बात है कि आने वाले कुछ सालों में बंदूक की जगह धीरे- धीरे बांसुरी ने ले ली...। लेकिन उधेड़बुन अपनी जगह क़ायम रहा..। बस प्रेरणा इतनी सी कि...

ओ पिंजरे के पंछी कवि मन...खिड़की भर आकाश न कम है...

दिया मौत ने जितना तुमके...उतना भी अवकाश न कम है...

और सपने बस इतने कि...

मेहनत से जो मिल जाए..

पका-अधपका फल बड़ा मीठा लगा...

इस बीच जब भी व्यवस्था की आहट हुई... दुनिया ने अपने सांचे में कवि को फिट करना चाहा , तो कवि ने हमेशा की तरह साफ कह दिया कि तेरी दुनिया की नेमतें तुझे मुबारक..मैं तो अपनी धुन का राही हूं...मुझे तेरे ज़माने के रिवाज न तो समझ में आए..और न ही मैं तुम्हारे सांचो में फिट होने के लिए लिखता हूं...। लेकिन हद तो तब हो गई जब शाश्वत बागी की तर्ज पर कवि ने बंधे बंधाए कविता के अनुबंधों और साहित्यिक दुनिया के रिवाजों को भी मानने से इंकार कर दिया..। कविताएं लिखकर कागज पर सजाते चले गए..। स्वयमेव भाव से कविता का मानस उद्धृत होता चला गया और कवि के शब्द चारदिवारी में ही रह गए...। कविताओं की नदियों में अविरल पानी बहता रहा। और कवि गाता रहा कि...

जीवित रह मेरे एक गीत...

संकलन जिए यह चाह नहीं...

हो एक गीत की वाह वाह...

बस कवि की थोड़ी सी चाह यही...। इस बार जब गांव गया तो अपने प्रिय कवि से उनकी कविताओं की मांग की..कहा कि आपकी कविता का बड़ा प्रशंसक हूं और चाहता हूं कि इसे मूर्त रुप मिले...और ये जल्दी कहीं छप जाए..बातों बातों में एक बात मुंह से निकल गई कि ... मैं चाहता हूं आपको उचित सम्मान मिले...। लेकिन पता नहीं दुनिया भर की बातों को चहक-चहक कर सुनने वाले कवि ने कभी मेरी इस बात को गंभीरता से क्यों नहीं लिया...। बोल बैठे... अब और कुछ दिन की है तन्हाई हमारी... बुलाए जा रहे हैं हम इशारे हो रहे हैं... ऐसा भी नहीं है कि इस कवि ने कभी कविता मंचों और पत्र पत्रिकाओं में अपनी आजमाइश नहीं की...। जहां भी गया हाथों हाथ लिया गया...लेकिन अपनी कविता छपवाने की बात जैसे ही कही कवि बिफर पड़े...

पैर निकट भी सांप देखकर ऐसे कभी न उछले थे..

देख आपको इस महफिल में ऐसे उछल गए सब लोग...।

ज्यादा कुछ न कहते हुए उनकी साहित्यिक सरिता पर किसी बड़े शायर के ये शब्द जरुर कहना चाहूंगा...कि

जब उनकी मलाहत के किस्से लिखूंगा ग़ज़ल के शेरों में ..

हर रुखे-सूखे मिसरे में तासीर-ए-नमक आ जाएगी...

आज जब हर काम और हर रचना बस अवॉर्ड के लिए ही लिखी जा रही है...बावजूद इसके साहित्य के इस छोटे से संसार में कुछ लोग ऐसे हैं जो लिखने को अपना धर्म समझते हैं...। यहीं नहीं लिखते भी इसीलिए हैं कि रचनाओं की सुंदरता पर कोई सवाल न उठा दे..। जब भी ये पूछिए कि भाई आपने तो जो भी लिखा वो तो अपने पास ही रख लिया .. तो जवाब मिलेगा कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है ..बात वहां तक पहुंच गई है...जहां तक पहुंचाने के लिए मुंह में जबान मिली थी...।

- राजेश कुमार

एक नाम गांव का निवासी

जाएं तो जाएं कहां?

अब दिल्ली सरकार के निशाने पर किसी तरह दो वक्त की रोटी कमा रहे ऑटोरिक्शा चालक हैं। सरकार कथित 55 हजार ऐसे चालकों को दिल्ली से खदेड़ने की पूरी तैयारी में है। वजह बताई जा रही है कि ये रिक्शा चालक सड़क पर जाम लगाते हैं। अव्यवस्था फैलाते हैं। सरकार को ऑटो से लगने वाला जाम नज़र आता है लेकिन हर रोज सड़कों पर उतर रही हजारों लंबी-लंबी कारें जाम की वजह नहीं लगतीं। चूंकीं ये कारें आम आदमी की नहीं हैं। ये सरकार के साथ सत्ता और उसकी नीतियों से सबसे ज्यादा नफे में रहने वाले और मलाई चाटने वाले चुनिन्दा लोग हैं। ये लोग सरकार के निशाने पर कैसे हो सकते हैं? सबसे आसान टारगेट तो कमजोर वर्ग है।

सरकार के गुण्डे पुलिसवालों ने कनाट प्लेस के जनपथ मार्केट में पटरियों पर दुकान लगाकर गुजारा करने वाली महिलाओं से रोजी छीन ली तो वे 20 मार्च को बीच सड़क पर बैठ गईं और रोरोकर अपना दर्द लोगों को बताने लगीं। किसी के पास वक्त नहीं था कि उनकी बातें सुने। दिक्कत इस बात से थी उनकी वजह से रोड़ जाम हो गया है। इनकी वजह से उनका वीकेण्ड खराब हो रहा है। बाद में महिला पुलिस ने सबको खदेड़ दिया। दिल्ली सरकार रोज-बरोज कुछ न कुछ ऐसा कर रही है।

कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ कहकर सत्ता में आई कांग्रेस आम आदमी के पेट पर लात मारने और उसे दिल्ली और दुनिया से रूखसत करने पर अमादा है। हजारों भिखारियों को ठिकाने लगा चुकी है और बचे हुओं को ठिकाने लगाने का काम जोरों पर है।

दिल्ली में सरकार की नाक का सवाल बन चुके कॉमनवेल्थ खेल होने हैं। सरकार को दिखाना है कि वह कितनी काबिल है जिसने इसे ठीक से करवा लिया है। विदेशियों को चकाचक और भीडमुक्त सड़कें दिखानी हैं। बताना है कि दिल्ली कितनी सुंन्दर है। कितनी साफ़ है। ये वर्ल्डक्लास शहर से किसी मायने में कम नहीं है। इसकी गन्दगी (गरीब और आम आदमी) को एमसीडी की तरह कूडे़ के ट्रक के तरह शहर से दूर फिंकवा रही है। वैसे उसका बस चले तो वह दिल्ली को साफ सुधरा बनाने के लिए इन लोगों को अरब सागर में फिंकवा दे।

आजकल केन्द्र सरकार भी अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन दे रही है। लोगों को बता रहा है कि माओवादी कितने खतरनाक और खूंखार हैं। ये देश के मध्यवर्ग को हकीकत से दूर रखकर माओवादियों के प्रति नफरत फैलाने का प्रचार और सरकारी पाखण्ड है। सरकार का अब तक इस बात का एहसास नहीं हुआ कि माओवाद समस्या नहीं विचारधारा है जो उसकी गलत नीतियों की उपह है। ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम पर वह इस विचारधारा को समस्या बताकर खत्म करने पर कृतसंकल्प है। सरकार को कौन बताए कि हिंसा से विचारधाराएं खत्म नहीं बल्कि और उग्र होती हैं।

लो क सं घ र्ष !: भगत सिंह के वैचारिक शत्रु

शहीद भगत सिंह ब्रिटिश साम्राज्यवाद को इस देश से नेस्तनाबूत कर देना चाहते थेब्रिटिश साम्राज्यवादियो ने अपने मुख्य शत्रु को 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी थीब्रिटिश साम्राज्यवाद के दुनिया में पतन के बाद उसकी जगह अमेरिकन साम्राज्यवाद ने ले लीआज देश में अमेरिकन साम्राज्यवाद के पिट्ठू जाति, भाषा, धर्म के विवाद को खड़ा कर देश की एकता और अखंडता को कमजोर करना चाहते हैंवास्तव में यही भगत सिंह की विचारधारा के असली शत्रु हैंइन शत्रुओं का और अमेरिकन साम्राज्यवाद के पिट्ठुओं का हर जगह विरोध करना आवश्यक हैप्रस्तुत लेख शहीद भगत सिंह के शहादत दिवस से पूर्व प्रकाशित किया जा रहा है
- लोकसंघर्ष



भगत सिंह की याद में
उनकी शहादत के 75 वर्ष पूरे होने पर

ब्रिटिश सरकार ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फाँसी दी तो वे केवल तेईस साल के थे। लेकिन आज तक वे हिन्दुस्तान के नौजवानों के आदर्श बने हुए हैं। इस छोटी सी उम्र में उन्होंने जितना काम किया और जितनी बहादुरी दिखायी, उसे केवल याद कर लेना काफी नहीं है। हम उन्हें श्रध्दांजलि देते हैं। 1926 में भगत सिंह ने नौजवान भारत सभा का गठन किया। नौजवानों का यह संगठन ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शोषण के कारनामे लोगों के सामने रखने के लिए बनाया गया था। मुजफ्फर अहमद, जो कि कम्युनिस्ट पार्टी के स्थापना सदस्य थे, अठारह साल के भगत सिंह के साथ अपनी मुलाकात को याद करते हैं। कम्युनिस्ट पार्टी का गठन 1925 में कानपुर में हुआ था और कानपुर बोल्शेविक कान्स्पिरेसी केस के तहत अब्दुल मजीद और मुजफ्फर अहमद गिरफ्तार कर लिए गये थे। भगत सिंह कॉमरेड अब्दुल मजीद के घर उन दोनों का सम्मान करने गये। जाहिर है, अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत से ही भगत सिंह का रुझान कम्युनिस्ट आंदोलन की तरफ था।

1930 में जब भगत सिंह जेल में थे, और उन्हें फाँसी लगना लगभग तय था, उन्होंने एक पुस्तिका लिखी, “मैं नास्तिक क्यों हूँ।” यह पुस्तिका कई बार छापी गयी है और खूब पढ़ी गयी है। इसके 1970 के संस्करण की भूमिका में इतिहासकार विपिन चंद्र ने लिखा है कि 1925 और 1928 के बीच भगत सिंह ने बहुत गहन और विस्‍तृत अध्ययन किया। उन्होंने जो पढ़ा, उसमें रूसी क्रांति और सोवियत यूनियन के विकास संबंधी साहित्‍य प्रमुख था। उन दिनों इस तरह की किताबें जुटाना और पढ़ना केवल कठिन ही नहीं बल्कि एक क्रांतिकारी काम था। भगत सिंह ने अपने अन्य क्रांतिकारी नौजवान साथियों को भी पढ़ने की आदत लगायी और उन्हें सुलझे तरीके से विचार करना सिखाया।

1924 में जब भगत सिंह 16 साल के थे, तो वे हिन्दुस्‍तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) में शामिल हो गये। यह एसोसिएशन सशस्त्र आंदोलन के जरिये ब्रिटिश साम्राज्यवाद को खत्‍म करना चाहता था। 1927 तक HRA के अधिकतर नेता गिरफ्तार किए जा चुके थे और कुछ तो फाँसी के तख्‍ते तक पहुँच चुके थे। HRA का नेतृत्‍व अब चंद्रशेखर आजाद और कुछ अन्य नौजवान साथियों के कंधों पर आ पड़ा। इनमें से प्रमुख थे भगत सिंह। 1928 बीतते भगत सिंह और उनके साथियों ने यह त्‍य कर लिया कि उनका अंतिम लक्ष्‍य समाजवाद कायम करना है। उन्होंने संगठन का नाम HRA से बदलकर हिन्दुस्‍तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) रख लिया। यह सोशलिस्ट शब्द संगठन में जोड़ने से एक महत्त्वपूर्ण तब्‍दीली आयी और इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ था भगत सिंह का। सोशलिज्म शब्द की समझ भगत सिंह के जेहन में एकदम साफ थी। उनकी यह विचारधारा मार्क्सवाद की किताबों और सोवियत यूनियन के अनुभवों के आधार पर बनी थी। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ तब तक जो सशस्त्र संघर्ष हुए थे, उन्हें भगत सिंह ने मार्क्सवादी नजरिये से गहराई से समझने की कोशिश की।

दिल्ली असेम्बली में बम फेंकने के बाद 8 अप्रैल 1929 के दिन भगत सिंह बटुकेश्वर दत्त के साथ जेल पहुँचे। बम फेंककर भागने के बजाय उन्होंने गिरफ्तार होने का विकल्प चुना। जेल में उनकी गतिविधियों का पूरा लेखा-जोखा आज हमें उपलब्ध है। उन दिनों भगत सिंह का अध्ययन ज्यादा सिलसिलेवार और परिपक्व हुआ। लेकिन अध्ययन के साथ-साथ भगत सिंह ने जेल में राजनैतिक कैदियों के साथ होने वाले बुरे सलूक के खिलाफ एक लम्बी जंग भी छेड़ी। यह जंग सशस्त्र क्रांतिकारी जंग नहीं थी, बल्कि गांधीवादी किस्म की अहिंसक लड़ाई थी। कई महीनों तक भगत सिंह और उनके साथी भूख हड़ताल पर डटे रहे। उनके जेल में रहते दिल्ली एसेम्बली बम कांड और लाहौर षडयंत्र के मामलों की सुनवाई हुई। बटुकेश्वर दत्त को देशनिकाले की और भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरू को फाँसी की सजा हुई।

बेहिसाब क्रूरता के बावजूद ब्रिटिश सरकार उनके हौसलों को पस्‍त नहीं कर पायी। सुश्री राज्यम सिन्हा ने अपने पति विजय कुमार सिन्हा की याद में एक किताब लिखी। किताब का नाम है “एक क्रांतिकारी के बलिदान की खोज।” इस पुस्‍तक में उन्होंने विजय कुमार सिन्हा और उनके दोस्‍त भगत सिंह के बारे में कुछ मार्मिक बातें लिखी हैं। इन क्रांतिकारी साथियों ने कोर्ट में हथकड़ी पहनने से इन्कार कर दिया था। कोर्ट मान भी गयी, लेकिन अपने दिये हुए वादे का आदर नहीं कर पायी। जब कैदी कोर्ट में घुसे तो झड़प शुरू हो गयी और फिर बेहिसाब क्रूरता और हिंसा हुई। - “जब पुलिस को यह लगा कि उनकी इज्जत पर बट्टा लग रहा है तो पठान पुलिस के विशेष दस्‍ते को बुलाया गया जिन्होंने निर्दयता के साथ कैदियों को पीटना शुरू किया। पठान पुलिस दस्‍ता अपनी क्रूरता के लिए खास तौर पर जाना जाता था। भगत सिंह के ऊपर आठ पठान दरिंदे झपटे और अपने कँटीले बूटों से उन्हें ठोकर मारने लगे। यही नहीं, उनपर लाठियाँ भी चलाई गयीं। एक यूरोपियन अफसर राबर्टस ने भगत सिंह की ओर इशारा करते हुए कहा कि यही वो आदमी है, इसे और मारो। पिटाई के बाद वे इन क्रांतिकारियों को घसीटते हुए ऐसे ले गये, जैसे भगत सिंह लकड़ी के ठूँठ हों। उन्हें एक लकड़ी की बेंच पर पटक दिया गया। ये सारा हँगामा कोर्ट कंपाउंड के भीतर बहुतेरे लोगों के सामने हुआ। मजिस्ट्रेट खुद भी यह नजारा देख रहे थे। लेकिन उन्होंने इसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। उन्होंने बाद में बहाना यह बनाया कि वे कोर्ट के प्रमुख नहीं थे, इसलिए पुलिस को रोकना उनकी जिम्मेदारी नहीं थी।

शिव वर्मा, जो बाद में सीपीएम के सीनियर कॉमरेड बने और अजय कुमार घोष, जो सीपीआई के महासचिव हुए, इस वारदात में बेहोश हो गये। तब भगत सिंह उठे और अपनी बुलंद आवाज में कोर्ट से कहा, “मैं कोर्ट को बधाई देना चाहता हूँ ! शिव वर्मा बेहोश पड़े हैं। यदि वे मर गये तो ध्यान रहे, जिम्मेदारी कोर्ट की ही होगी।”

भगत सिंह उस समय केवल बाईस वर्ष के थे लेकिन उनकी बुलंद शख्सियत ने ब्रिटिश सरकार को दहला दिया था। ब्रिटिश सरकार उन आतंकवादी गुटों से निपटना तो जानती थी, जिनका आतंकवाद उलझी हुई धार्मिक व राष्ट्रवादी विचारधारा पर आधारित होता था। लेकिन जब हिन्दुस्‍तान रिपब्लिक एसोसिएशन का नाम बदलकर हिन्दुस्‍तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन हो गया और भगत सिंह उसके मुख्य विचारक बन गये तो ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार दहशत में आ गयी। भगत सिंह के परिपक्व विचार जेल और कोर्ट में उनकी निर्भीक बुलंद आवाज के सहारे सारे देश में गूँजने लगे। देश की जनता अब उनके साथ थी। राजनीतिक कैदियों के साथ जेलों में जिस तरह का अमानवीय बर्ताव किया जाता था, उसके खिलाफ भगत सिंह ने जंग छेड़ दी और बार-बार भूख हड़ताल की। उनका एक प्यारा साथी जतिन दास ऐसी ही एक भूख हड़ताल के दौरान लाहौर जेल में अपने प्राण गँवा बैठा। जब उसके शव को लाहौर से कलकत्ता ले जाया गया, तो लाखों का हुजूम कॉमरेड को आखिरी सलामी देने स्टेशन पर उमड़ आया।

कांग्रेस पार्टी का इतिहास लिखने वाले बी. पट्टाभिरमैया के अनुसार इस दौरान भगत सिंह और उनके साथियों की लोकप्रियता उतनी ही थी, जितनी महात्‍मा गांधी की !

जेल में अपनी जिन्दगी के आखिरी दिनों में भगत सिंह ने बेहिसाब पढ़ाई की। यह जानते हुए भी कि उनके राजनीतिक कर्मों की वजह से उन्हें फाँसी होने वाली है, वे लगातार पढ़ते रहे। यहाँ तक कि फाँसी के तख्‍ते पर जाने के कुछ समय पहले तक वे लेनिन की एक किताब पढ़ रहे थे, जो उन्होंने अपने वकील से मँगायी थी। पंजाबी क्रांतिकारी कवि पाश ने भगत सिंह को श्रध्दांजलि देते हुए लिखा है, “लेनिन की किताब के उस पन्ने को, जो भगत सिंह फाँसी के तख्‍ते पर जाने से पहले अधूरा छोड़ गये थे, आज के नौजवानों को पढ़कर पूरा करना है।” गौरतलब है कि पाश अपने प्रिय नेता के बलिदान वाले दिन, 23 मार्च को ही खालिस्‍तानी आतंकवादियों द्वारा मार दिये गये।

भगत सिंह ने जेल में रहते हुए जो चिट्ठियॉं लिखते थे, उनमें हमेशा किताबों की एक सूची रहती थी। उनसे मिलने आने वाले लोग लाहौर के द्वारकादास पुस्‍तकालय से वे पुस्‍तकें लेकर आते थे। वे किताबें मुख्य रूप से मार्क्सवाद, अर्थशास्त्र, इतिहास और रचनात्‍मक साहित्‍य की होती थीं। अपने दोस्‍त जयदेव गुप्‍ता को 24 जुलाई 1930 को जो ख़त भगत सिंह ने लिखा, उसमें कहा कि अपने छोटे भाई कुलबीर के साथ ये किताबें भेज दें : 1) मिलिटेरिज्‍म (कार्ल लाईपनिस्ट), 2) व्हाई मेन फाईट (बर्न्टेड रसेल), 3) सोवियत्‍स ऐट वर्क 4) कॉलेप्स ऑफ दि सेकेण्ड इंटरनेशनल 5) लेफ्ट विंग कम्यूनिज्म (लेनिन) 6) म्युचुअल एज (प्रिंस क्रॉप्टोकिन) 7) फील्ड, फैक्टरीज एण्ड वर्कशॉप्स, 8) सिविल वार इन फ्रांस (मार्क्स), 9) लैंड रिवोल्यूशन इन रशिया, 10) पंजाब पैजेण्ट्स इन प्रोस्पेरिटी एण्ड डेट (डार्लिंग) 11) हिस्टोरिकल मैटेरियलिज्म (बुखारिन) और 12) द स्पाई (ऊपटॉन सिंक्लेयर का उपन्यास)

भगत सिंह औपचारिक रूप से ज्यादा पढ़ाई या प्रशिक्षण हासिल नहीं कर पाए थे, फिर भी उन्हें चार भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। उन्होंने पंजाबी, हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं में लिखा है। जेल से मिले उनके नोटबुक में 108 लेखकों के लेखन और 43 किताबों में से चुने हुए अंश मौजूद हैं। ये अंश मुख्य रूप से मार्क्स और एंगेल्स के लेखन से लिए गए हैं। उनके अलावा उन्होंने थॉमस पाएने, देकार्ट, मैकियावेली, स्पिनोजा, लार्ड बायरन, मार्क ट्वेन, एपिक्यूरस, फ्रांसिस बेकन, मदन मोहन मालवीय और बिपिन चंद्र पाल के लेखन के अंश भी लिए हैं। उस नोटबुक में भगत सिंह का मौलिक एवं विस्‍तृत लेखन भी मिलता है, जो “दि साईंस ऑफ दि स्टेट” शीर्षक से है। ऐसा लगता है कि भगत सिंह आदिम साम्यवाद से आधुनिक समाजवाद तक समाज के राजनीतिक इतिहास पर कोई किताब या निबंध लिखने की सोच रहे थे।

जिस बहादुरी और दृढ़ता के साथ भगत सिंह ने मौत का सामना किया, आज के नौजवानों के सामने उसकी दूसरी मिसाल चे ग्वारा ही हो सकते हैं। चे ग्वारा ने क्रांतिकारी देश क्यूबा में मंत्री की सुरक्षित कुर्सी को छोड़कर बोलिविया के जंगलों में अमेरिकी साम्राज्यवाद से लड़ने का विकल्प चुना। चे ग्वारा राष्ट्रीय सीमाएँ लाँघकर लातिनी अमेरिका के लोगों को पढ़ना-लिखना सिखाते थे। ये सच है कि चे ग्वारा का व्यक्तिगत अनुभव भगत सिंह की तुलना में बहुत ज्यादा विस्‍तृत था, और उसी वजह से उनके विचार भी अधिक परिपक्व थे। लेकिन क्रांति के लिए समर्पण और क्रांति का उन्माद दोनों ही नौजवान साथियों में एक जैसा था। दोनों ने साम्राज्यवाद और पूँजीवादी शोषण के खिलाफ लड़ाई लड़ी। दोनों ने ही अपने उस मकसद के लिए जान दे दी, जो उन्हें अपनी जिन्दगी से भी ज्यादा प्यारा था।

20 मार्च 1931 को, अपने शहादत के ठीक तीन दिन पहले भगत सिंह ने पंजाब के गवर्नर को एक चिट्ठी लिखी, “हम यह स्पष्ट घोषणा करें कि लड़ाई जारी है। और यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक हिन्दुस्‍तान के मेहनतकश इंसानों और यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा का कुछ चुने हुए लोगों द्वारा शोषण किया जाता रहेगा। ये शोषक केवल ब्रिटिश पूँजीपति भी हो सकते हैं, ब्रिटिश और हिन्दुस्‍तानी एक साथ भी हो सकते हैं, और केवल हिन्दुस्‍तानी भी। शोषण का यह घिनौना काम ब्रिटिश और हिन्दुस्‍तानी अफसरशाही मिलकर भी कर सकती है, और केवल हिन्दुस्‍तानी अफसरशाही भी कर सकती है। इनमें कोई फर्क नहीं है। यदि तुम्हारी सरकार हिन्दुस्‍तान के नेताओं को लालच देकर अपने में मिला लेती है, और थोड़े समय के लिए हमारे आंदोलन का उत्‍साह कम भी हो जाता है, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि हिन्दुस्‍तानी आंदोलन और क्रांतिकारी पार्टी लड़ाई के गहरे अँधियारे में एक बार फिर अपने-आपको अकेला पाती है, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लड़ाई फिर भी जारी रहेगी। लड़ाई फिर से नये उत्‍साह के साथ, पहले से ज्यादा मुखरता और दृढ़ता के साथ लड़ी जाएगी। लड़ाई तबतक लड़ी जाएगी, जबतक सोशलिस्ट रिपब्लिक की स्थापना नहीं हो जाती। लड़ाई तब तक लड़ी जाएगी, जब तक हम इस समाज व्यवस्था को बदल कर एक नयी समाज व्यवस्था नहीं बना लेते। ऐसी समाज व्यवस्था, जिसमें सारी जनता खुशहाल होगी, और हर तरह का शोषण खत्‍म हो जाएगा। एक ऐसी समाज व्यवस्था, जहाँ हम इंसानियत को एक सच्ची और हमेशा कायम रहने वाली शांति के दौर में ले जाएँगे......... पूँजीवादी और साम्राज्यवादी शोषण के दिन अब जल्द ही खत्‍म होंगे। यह लड़ाई न हमसे शुरू हुई है, न हमारे साथ खत्‍म हो जाएगी। इतिहास के इस दौर में, समाज व्यवस्था के इस विकृत परिप्रेक्ष्‍य में, इस लड़ाई को होने से कोई नहीं रोक सकता। हमारा यह छोटा सा बलिदान, बलिदानों की श्रृंखला में एक कड़ी होगा। यह श्रृंखला मि. दास के अतुलनीय बलिदान, कॉमरेड भगवतीचरण की मर्मांतक कुर्बानी और चंद्रशेखर आजाद के भव्य मृतयुवरण से सुशोभित है।”

उसी 20 मार्च्र के दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दिल्ली की एक आम सभा में कहा, “आज भगत सिंह इंसान के दर्जे से ऊपर उठकर एक प्रतीक बन गया है। भगत सिंह क्रांति के उस जुनून का नाम है, जो पूरे देश की जनतापर छा गया है।”

फ्री प्रेस जर्नल ने अपने 24 मार्च 1931 के संस्करण में लिखा, “शहीद भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव आज जिन्दा नहीं हैं। लेकिन उनकी कुर्बानी में उन्हीं की जीत है, यह हम सबको पता है। ब्रिटिश अफसरशाही केवल उनके नश्वर शरीर को ही खत्‍म कर पायी, उनका जज्बा आज देश के हर इंसान के भीतर जिन्दा है। और इस अर्थ में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव अमर हैं। अफसरशाही उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। इस देश में शहीद भगत सिंह और उनके साथी स्वतंत्रता के लिए दी गयी कुर्बानी के लिए हमेशा याद किए जाएँगे। “सचमुच, 1931 के ब्रिटिश राज के उन आकाओं और कारिंदों की याद आज किसी को नहीं, लेकिन तेईस साल का वह नौजवान, जो फाँसी के तख्‍ते पर चढ़ा, आज भी लाखों दिलों की धड़कन है।”

आज अगर हम भगत सिंह की जेल डायरी और कोर्ट में दिये गये वक्‍तव्य पढ़ें, और उसमें से केवल “ब्रिटिश” शब्द को हटाकर उसकी जगह “अमेरिकन” डाल दें, तो आज का परिदृश्य सामने आ जाएगा। भगत सिंह के जेहन में यह बात बिल्कुल साफ थी, कि शोषक ब्रिटिश हों या हिन्दुस्‍तानी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आज लालच के मारे हिन्दुस्‍तानी नेता और अफसर अमरीकी खेमे में जा घुसे हैं। लेकिन भगत सिंह के ये शब्द हमारे कानों में गूँज रहे हैं - “लड़ाई जारी रहेगी।” आज के बोलिविया में चे ग्वारा और अलान्दे फिर जीवित हो उठे हैं। लातिनी अमेरिका की इस नयी क्रांति से अमरीका सहम गया है। उसी तरह हिन्दुस्‍तान में भगत सिंह के फिर जी उठने का डर बुशों और ब्लेयरों को सताता रहे।

विपिन चंद्र ने सही लिखा है कि हम हिन्दुस्‍तानियों के लिए यह बड़ी त्रासदी है कि इतनी विलक्षण सोच वाले व्यक्ति के बहुमूल्य जीवन को साम्राज्यवादी शासन ने इतनी जल्दी खत्‍म कर डाला। उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद ऐसे घिनौने काम करता ही है, चाहे हिन्दुस्‍तान हो या वियतनाम, इराक हो, फिलीस्‍तीन हो या लातिन अमरीका। लेकिन लोग इस तरह के जुर्मों का बदला अपनी तरह से लेते हैं। वे अपनी लड़ाई और ज्यादा उग्रता से लड़ते हैं। आज नहीं तो कल, लड़ाई और तेज होगी, और ताकतवर होगी। हमारा काम है क्रांतिकारियों की लगाई आग को अपने जेहन में ताजा बनाए रखना। ऐसा करके हम अपनी कल की लड़ाई को जीतने की तैयारी कर रहे होते हैं।

--लेखक, श्री चमनलाल, प्राध्यापक, जे एन यू, दिल्ली
अनुवादक , सुश्री जया मेहता एवं सुधीर साहू

शलाका पर घमासान


यह एक पुराना भूत है जो अकादमी के खंडहरों में घूमता रहता है। गाहे-बगाहे कभी अशोक चक्रधर की नियुक्ति पर, कभी गबन पर, कभी डॉ. प्रेम सिंह समेत कई मूर्धन्य लेखकों का अकादमी छोड़े जाने, राजनितिक दबाव पर और अब सम्मान के नाम पर यह भूत अवतरित हुआ है। लेकिन इस बार इस भूत ने अकादमी के गलियारों में हलचल तो ला ही दी साथ ही साहित्यकारों ने भी अकादमी की औकात बता दी है।

शलाका सम्मान हिंदी अकादमी को ओर से दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में समर्पित भाव से काम करने वाले विद्वानों तथा मूर्धन्य साहित्यकारों के प्रति अपने आदर और सम्मान की भावना को व्यक्त करने के लिए हिन्दी अकादमी द्वारा प्रतिवर्ष यह सम्मान दिया जाता है। इस बार इस प्रतिष्ठित सम्मान सहित आठ पुरस्कार राष्ट्रीय कर दिए गए और इस बार से एक ख़ास परिवर्तन किया गया है जिसके तहत अब दिल्ली ही नही वरन दिल्ली से बाहर के साहित्यकारों को भी यह सम्मान दिया जा सकता है साथ ही पुरस्कार की रकम भी बढाकर २ लाख कर दी गयी।

इसी क्रम में अकादमी ने वर्ष २००९-१० शलाका सम्मान प्रो. केदारनाथ सिंह को देने की घोषणा की। इसके साथ ही अन्य पुरस्कारों के लिए चयनित नामों की सूची जारी की गयी जिसमे पुरूषोत्तम अग्रवाल, रेखा जैन, पंकज सिंह, गगन गिल और विमल कुमार शामिल हैं। आगामी 23 मार्च को यह सम्मान दिए जाने थे जिसमे महाश्वेता देवी सिरकत करने वाली थीं।

लेकिन तभी ऐसा हुआ जो अकादमी के इतिहास में आज तक नही हुआ था। केदारनाथ सिंह ने सम्मान लेने से इंकार तो किया ही बाकी अन्य लोगों ने भी इंकार कर दिया। असल में यह एक पुराना भूत है जो अकादमी के खंडहरों में घूमता रहता है। गाहे-बगाहे कभी अशोक चक्रधर की नियुक्ति पर, कभी गबन पर, कभी डॉ. प्रेम सिंह समेत कई मूर्धन्य लेखकों का अकादमी छोड़े जाने, राजनितिक दबाव पर और अब सम्मान के नाम पर यह भूत अवतरित हुआ है। लेकिन इस बार इस भूत ने अकादमी के गलियारों में हलचल तो ला ही दी साथ ही साहित्यकारों ने भी अकादमी की औकात बता दी है। दरअसल, अकादमी ने हिंदी के वरिष्ठ कथाकर कृष्ण बलदेव वैद को उनकी कृति 'सुअर' के लिए वर्ष 2008-09 के शलाका सम्मान के लिए नामित किया था। फिर अचानक उनका नाम काट दिया गया और किसी को भी यह सम्मान नहीं दिया गया। असल में एक टटपुजिये से छुटभैये नेता ने वैद के चयन की शिकायत "दिल्लीवाहिनी" शीला दीक्षित से कर दी थी। नेता का आरोप था कि वैद के लेखन में अश्लीलता है और 'सुअर' में जो अभद्र भाषा व नारी जाति का अपमान किया गया है वह एक सभ्य समाज के लिए किसी भी दृष्टि से शोभनीय नहीं है। वैद की कहानी देश में बालिकाओं के जन्म दर बढाने को लेकर चल रही सरकारी व गैर सरकारी प्रतिष्ठानों द्वारा चलाये जा रहे अभियान के विरूध्द है। इसके साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री से इस तरह की कृतियों को दिए जाने वाले सम्मान को खारिज करने व जांच की मांग की थी। आखिरकार वैद का नाम फ़ाइनल नही हो पाया। लेकिन अब इस मामले ने तूल पकड़ लिया है।

केदारनाथ सिंह तथा अन्य के सम्मान नही लेने के निर्णय का समर्थन करते हुए साहित्यकार राजेन्द्र यादव ने कहा कि शलाका सम्मान की परंपरा को ही खत्म कर देना चाहिए। इसकी गरिमा पर जो धब्बा लगा है, उससे हिन्दी साहित्य के विद्वान बेहद आहत हैं। साहित्यकार विमल कुमार का मानना है कि अश्लीलता का बहाना बनाकर किसी साहित्यकार को अपमानित करने की हरकत को कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकरण से पुरस्कारों के चयन में राजनीति की बात खुलकर सामने आ गई है। लेकिन आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल का कहना है कि किसी लेखक की रचना के कुछ अंश पढ़कर इस तरह के आरोप लगाना कतई उचित नहीं है। पुरस्कार लेखक के समग्र रचनाकर्म को आधार बना कर दिया जाता है। अकादमी के सम्मान को ठुकराने वाले साहित्यकारों में एक पंकज सिंह ने बताया कि समिति द्वारा लिए गए निर्णय की गरिमा की परवाह किए बगैर अकादमी ने पूरी तरह से मनमानी करते हुए एक वरिष्ठ कथाकार को अपमानित किया है।

इस तरह यह साफ है कि इस मुद्दे पर साहित्यकार एकजुट हो रहे हैं। इतना ही नहीं, केदार नाथ सिंह के सम्मान के ठुकराए जाने के बाद कई अन्य साहित्यकारों ने भी अकादमी की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाते हुए सिंह की कतार में खड़े हो गए। प्रसिद्ध साहित्यकार प्रियदर्शन ने भी साहित्य कृति सम्मान नहीं लेने की घोषणा की है। इसी बीच महाश्वेता देवी ने भी कार्यक्रम में सिरकत करने से इंकार कर दिया है। इन सब विवादों से आजिज आकर हिंदी अकादमी ने शलाका सम्मान कार्यक्रम को टाल दिया है। यह पुरस्कार अब तीन महीने बाद फिर से एक नए सिरे से घोषित किए जाएंगे। यह भी कयास लगाया जा रहा है कि इन पुरस्कारों की सूची में कृष्ण बलदेव वैद का नाम भी शुमार किया जा सकता है। फिलहाल यह सम्मान टलने से चल रही रस्साकशी पर तो विराम लगता नजर आ रहा है , लेकिन "अकादमी का हिंदी भूत" कभी भी फिर जाग सकता है।

माइ नेम इज़ आम दर्शक और मैं बेवकूफ़ नहीं हूं



एक दिन महान फ़िल्मकार करन जौहर अपने कमरे में अकेले बैठे देश की समस्याओं पर गहन चिन्तन कर रहे थे। अचानक उनकी अन्तरआत्मा (यह एक ऐसी चीज़ होती है जो अक्सर खूब सारे पैसे कमाने के बाद और विराट सफलता पाने के बाद हर इंसान में थोड़ी देर के लिये जाग जाती है और भुगतना दूसरों को पड़ता है। इस बार करन की अन्तरआत्मा का शिकार आम दर्शक हुये, खैर) उनके सामने आ खड़ी हुयी। अन्तरआत्मा ने उनसे पूछा के ऐ बॉलीवुड के सफलतम निर्माता निर्देशकों में से एक, बता आज तक तूने अपनी फ़िल्मों से कितने लोगों को जगाया है। सिनेमा जिसे समाज का दर्पण कहा जाता है, से कितनी ज्वलन्त समस्याओं की नब्ज़ पर उंगली रखी है। करन ने बताया कि उन्होंने स्त्रियों के कल्याण के लिये अपनी फिल्म में दिखाया है कि पुरुष का इन्तज़ार अगर स्त्री दस सालों तक करे तो वह भी एक दिन वापस ज़रूर आता है। उन्होंने अपनी एक दूसरी फ़िल्म में दिखाया है कि जिनके आंगन में हवाई जहाज़ उतरता है वे भी दीन दुखियारी लड़कियों से प्रेम विवाह कर सकते हैं और इस तरह समाज में वर्ग अन्तराल को कम करने की कोशिश की है। उन्होंने अपने बैनर द्वारा निर्देशित फि़ल्मों से प्रेम का प्रसार किया है और यहां तक बताने की कोशिश की है कि प्रेम किसी के भी बीच हो सकता है। और दो पुरुषों के बीच हुआ प्रेम भी उतनी ही सार्थक और बिकाऊ होता है। अन्तरआत्मा कनवेंस नहीं हुयी। उसने करन के कान में कुछ कहा और करन उठ खड़े हुये। उन्होंने सोचा कि यह सही वक्त आ गया है कि जब कुछ ऐसी चीज़ बनायी जाय जिससे पता चल सके कि वे भी देश की समस्याओं को लेकर गम्भीर हैं। हालांकि बाद में उन्हें याद आया कि वे इतने ग्लोबल हो चुके हैं कि उनसे देश की समस्याओं से ज्यादा दुनिया की चिन्ता करनी चाहिये। बहरहाल, उन्होंने अपने अभिन्न मित्र शाहरूख खान को याद किया और दोनों ने मिलकर एक शानदार फ़िल्म बना डाली जिसका नाम उन्होंने रखा ´माई नेम इज़ खान' हालांकि देश के अल्पसंख्यकों की भी समस्याएं भी कम विकराल नहीं थीं और आये दिन सन्दिग्ध इनकाउंटर हो रहे थे। यहां तक कि देश में अल्पसंख्यकों को किराये पर कमरा लेने तक की जद्दोजहद करनी पड़ रही थी लेकिन करन जानते थे कि ये तुच्छ समस्याएं दिखाने से रुपये आएंगे जबकि अमेरिका में एक अल्पसंख्यक की समस्याएं दिखाने से डॉलर पौण्ड सहित और भी बहुत कुछ आयेगा। फ़िल्म एस्पर्जर नामक बीमारी से ग्रस्त एक व्यक्ति रिज़वान खान की है जिसकी भूमिका शाहरूख ने पूरी ईमानदारी से निभायी है जैसा कि एक साक्षात्कार में उन्होंने खुद ही कहा था कि जहां उन्हें अच्छा पैसा मिलता है वहां वो अच्छा काम करते हैं (सबूत के लिये देखें हालिया रिलीज ´दूल्हा मिल गया´)। एस्पर्जरग्रस्त रिजवान हिन्दी फिल्म के नायकों से कहीं से भी पीछे नहीं है विकलांगता के बावजूद। वह अच्छे खासे पज़ल को चुटकियों में हल कर सकता है और पीले रंग से डर लगने के बावजूद कई दृश्यों में पीले रंग से डरना भूल जाता है। काजोल चुलबुली मन्दिरा के रोल में हैं जिनका पहले पति से एक बच्चा है। वह इतनी समझदार दिखायी पड़ती हैं कि एक एस्पर्जरग्रस्त व्यक्ति से शादी करने के लिये उन्हें सिर्फ सुबह का नज़ारा दिखाये जाने की ज़रूरत होती है। उन्हें न तो रिजवान का एस्पर्जरग्रस्त होने से कोई समस्या नहीं है और उसके मुसलमान होने को तो वह महान महिला एक बार भी रेखांकित नहीं करती। आपके मन में ये सवाल उठता है लेकिन आप यह सोच कर चुप रह जाते हैं कि नायिका वाकई बहुत समझदार और सुलझी हुयी है। 9/11 के हमले के बाद नायिका का बेटा एक हमले में मार दिया जाता है जिसे बहुत सतही तरीके से फिल्म में नस्लीय हमला करार दिया गया है पर दरअसल वह दूसरी समस्या है। उसके बाद वही नायिका जिसके लिये अलग धर्म का होना बहुत मामूली बात थी अचानक प्रवीन तोगड़िया और मौलाना बुखारी की तरह उन्माद में आ जाती है। वह रिज़वान खान को भला बुरा कहती है, हिस्टीरिया के मरीज़ की तरह चीखती है और यह जानते हुये भी कि उसके पति का इसमें कोई हाथ नहीं है, उसे अपने से दूर कर देती है। यहां करण को कहानी में एक ज़बरदस्त टिवस्ट मिलता है कि नायक को अमेरिका के राष्ट्रपति से मिलने भेजा जाय तो अमेरिकी दर्शक बहुत खुश होंगे। तो वह नायिका को सिखाते हैं। नायिका कुछ संवाद बोलने के बाद यह प्रस्ताव नायक को देती है और नायक अपने अभियान पर चल देता है। मगर नायक और उसके साथ निर्देशक दोनों ही असली सफ़र पर जाने की बजाया इधर उधर ज्यादा भटकते दिखायी देते हैं। एस्पर्जरग्रस्त नायक तूफ़ान में जाकर वह वह काम करता है जो सुपरमैन भी न कर पाता। वह महामानव बनने लगता है और अन्तत: अपने मिशन में कामयाब होता है। वह नवनिर्वाचित राश्ट्रपित बराक ओबामा से हाथ मिलाकर बोलता है-माइ नेम इज़ खान एण्ड आयम नॉट ए टेररिस्ट। फ़िल्म खत्म होती है और जैसा कि उम्मीद थी, भारत के दर्शक शाहरूख की उम्दा एक्टिंग के लिये यह अझेल फ़िल्म देख ले जाते हैं और टारगेट ऑडियंस अपनी समस्या से आइडेंटिफाई करती हुयी। विदेशों में फ़िल्म सफ़लता के झण्डे गाड़ देती है और कई रिकॉर्ड तोड़ देती है और करन का यह भ्रम बरक़रार रह जाता है कि वे बड़ी शानदार फिल्में बनाते हैं।
बहरहाल, फ़िल्म बहुत ही बोझिल तरीके से शुरू होती है और उससे भी बोझिल तरीके से ख़त्म। शुरूआत फिर भी अच्छी है जहां ज़रीना वहाब ने एक मां की भूमिका में कई अच्छे दृश्य दिये हैं। मगर पूरी फ़िल्म में अतार्किक कहे जा सकने वाले दृश्यों की भरमार है। 9/11 की बरसी पर जब सभी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं, हमारा नायक जो भारत में डिजायनर कपड़े पहनता था अचानक शलवार कुर्ते में सूरा फतह पढ़ता दिखायी देता है। वह बहुत प्यारा मुसलमान है जो उस माहौल में भी कहीं भी नमाज पढ़ सकता है। मस्जिद में एक कहानी सुनते वक़्त वो ढेर सारे मुसलमानों के बीच असली कहानी सुनाता है और आश्चर्य है कि वहां बैठे सभी मुसलमानों में से किसी को भी उसका जवाब नहीं मालूम। सभी पूछते हैं तो रिज़वान जवाब देता है- वह शैतान था।
फ़िल्म के सफल होने के बाद करन एक दिन अपने कमरे में बैठे कुछ गठीले अभिनेताओं की तस्वीरें देख रहे थे कि उनकी अन्तरआत्मा वहां आ गई। उसने कहा कि फिल्म में भारत के अल्पसंख्यकों की समस्याओं को दिखाया जाना चाहिये था जो अपेक्षाकृत ज्यादा असहाय हैं। करन मुस्कराये, दरवाज़ा खोला और उसे लात मार कर बाहर धकेल दिया।
विमल चन्द्र पाण्डेय

मासूमा

बहुत दिनो से कुछ पढ़ नहीं। अपने पढ़ने की भुख को मिटाने के लिए कुछ खोज रहा था ठीक उसी तरह जैसे कुत्ता भुखा होने पर हड्डी खोजता है। तभीं मुझे इस्मत चुग़ताई की एक किताब मिली `मासूमा´ जिसकी शुरूआत एक कविता से हुई है और खत्म भी कविता से है। और किताब के बारे में ज्यादा तो नहीं बता सकता क्योंकि अभी मैंने पढ़ना शुरू ही किया है मगर मैं आपको वो दोनो कविता पेश करना चाहता हूं-




किताब जहां से शुरू होती है-

चार महीने का मकान का किराया
नौकरों की तन्ख्वाह-बनिये का कर्ज
बिजली का बिल-धोबी की धुलाई
बच्चों की फीस-पानी सर से गुज़र जाता है
मैं डूबते-डूबते उभरकर देखती हूं
मेरी सोलह बरस की जीती जागती बेटी
नौ-उम्र सहेलियों के साथ रस्सी कूद रही है।


और किताब के अन्त में-
मेरी सोलह बरस की जीती जागती बेटी
नौ-उम्र सहेलियों के साथ रस्सी कूद रही है
ऐ काश मैं वापस उसे अपनी कोख में छुपा सकती !

जुगाड़ से पहले का जुगाड़


एक चुटकुला है. एक अमेरिकी मोटर साइकिल से ही भारत भ्रमण पर निकला पडा. रास्ते में एक जगह मोटर साइकिल खराब हो गई. बेचारा परेशान. अचानक एक आदमी मिला. बोला क्या समस्या है. मै आपकी मोटर साइकिल ठीक कर देता हूँ. दो मिनट में उसने मोटर साइकिल ठीक कर दी. अमेरिकी ने पूछा...तुमने कैसे ठीक किया. आदमी बोला..... कुछ नहीं थोड़ा जुगाड़ लगाया बस. अमेरिकी ने सोचा.... बड़ा अच्छा है यह जुगाड़. दूसरी बार भी मोटर साइकिल खराब हुई. एक और आदमी ने दो मिनट में उसे ठीक कर दिया . इस बार पूछने पर उस आदमी ने भी यही बताया की थोडा जुगाड़ लगाया और आपकी मोटर साइकिल ठीक हो गयी. अमेरिकी ने सोचा भाई ये जुगाड़ तो कमाल की टेक्नोलॉजी है. जब वह अमेरिका पहुचा तो उसने इस जुगाड़ के बारे में तब के प्रेसिडेंट बिल क्लिंटन को बताया. क्लिंटन भी इस जुगाड़ टेक्नोलॉजी से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने अटल बिहारी वाजपयी को फोन किया और कहा की आप चाहे तो हम कितना भी पैसा देने को तैयार है लेकिन आप हमें बदले में जुगाड़ टेक्नोलॉजी दे दे. वाजपयी जी ने जवाब दिया की महाशय आप चाहे जो मांग ले लेकिन जुगाड़ टेक्नोलॉजी न मांगे क्योंकि हमारी सरकार तो इसी के सहारे चलती है.

तो ये है महिमा जुगाड़ की. लेकिन सवाल ये है की जब हम एक सरकारी कलर्क बनने निकलते है तो तमाम तरह की जानकारियां जुटाते है. तैयारी करते है. फिर अगर असफल हो जाते है तो इसे अपनी नियति मान कर चुप बैठ जाते है. कोइ और काम कर लेते है. जाहिर है, हरेक फील्ड का अपना-अपना रिस्क फैक्टर है. क्या हम इसके बारे में सोचते है की कल को कुछ उल्टा-सीधा हो गया तो क्या करेंगे. हम जब मीडिया में आने की सोचते है तो क्या करते है. यहाँ तक की एक सही ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट भी नहीं तलाश पाते.
क्रमश:....................

मीडिया में नौकरी यानि 'फुलटू' जुगाड़


उत्तम बनर्जी
चाहे टीवी हो या फिर प्रिंट ...पत्रकारिता में अपना भविष्य तलाश रहे स्टूडेंट इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि बिना जुगाड़ के इस इण्डस्ट्री में कुछ होने वाला नहीं। वजह साफ है...इक्के दुक्के मीडिया इंस्टीट्यूट को छोड़ दिया जाए तो देश में कुकुरमुत्ते की तरह फैले तमाम संस्थानों से निकले स्टूडेंट्स जिनका कोर्स कंपलीट करने के बाद एक ही ख्वाब होता है मीडिया में आते ही छा जाना। मगर हकीकत की जमीन पर कदम रखते ही इनका ये ख्वाब आइने की तरह चकनाचूर हो जाता है। तमाम योग्यता के बावजूद देश के टॉप-मोस्ट टीवी चैनल या फिर अखबार में नौकरी पाने की उम्मीद कहीं दूर दूर तक नज़र नहीं आती।

वजह इनके पास यहां तक पहुंचकर अपनी काबिलियत दिखाने के लिए किसी जुगाड़ का न होना। कुछ दिनों मीडिया हाउसों के चक्कर लगाने के बाद इन्हें ये बात समझते देर नही लगती कि जिस ग्लैमर के फेर में इन्होंने समाज में कुछ अलग से कर गुजरने के लिए ये पेशा चुना... अन्दरखाने इसकी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। टीवी चैनल हो या अखबार का दफ्तर... रेज्यूमे लेकर पहुंचते ही स्टूडेंट्स का पाला सबसे पहले दफ्तर के बाहर खड़े सुरक्षा गार्ड से होता है जिसे सुरक्षा करने के साथ साथ पूरी तरह से ये अघोषित अथारिटी मिली होती है कि नए नवेले पत्रकारों से वो अपने तरीके से ही निपटे। आज के जमाने के हिसाब से महज साक्षरता की डिग्री लिए (कई सुरक्षा गार्ड के पास तो लम्बे चौड़े शरीर के अलावा कोई सर्टिफिकेट तक नहीं होता) ये गार्ड होनहार पत्रकारों का बाहर से ही इंटरव्यू लेकर इन्हें गुडबॉय बोल देता है। अगर दो चार मिनट ठहरकर गार्डों से संस्थान के बारे में पता किया जाए तो ये सुनकर वाकई हैरानी होती है कि इन्हें संस्थान की अन्दरूनी खबर ऐसे मालूम रहती है जैसे ये मैनेजमेंट टीम के ही कोई सीक्रेट एजेंट हों। एक जगह से निपटकर स्टूडेंट दूसरे मीडिया संस्थान पहुंचता है, ये सोचकर कि शायद वहां कुछ भला हो जाए लेकिन यहां की स्थिति भी वही ढाक के तीन-पात।

लिहाजा, कुछ दिनों में ही इन्हें एकेडमिक और प्रोफेशनल के बीच करियर का फर्क समझ में आना शुरू हो जाता है। आखिर में नौकरी को छोड़कर स्टूडेंट इस समझौते पर राजी हो जाते हैं कि किसी मीडिया संस्थान में इंटर्नशिप ही मिल जाए। इंटर्नशिप के दौरान शोषण और त्रासदी का एक नया दौर शुरू होता है। इसके ठीक उलट कुछ मीडिया संस्थानों में बहुतायत में लड़के-लड़कियों को सिर्फ इसलिए इंटर्नशिप दी जाती है ताकि चैनल या अखबार को मुफ्त में काम करने वाले लोग मुहैया हो सके। इंटर्नशिप पाने वाले स्टूडेंटस जी जान से मेहनत करते हैं ताकि उनकी मेहनत और प्रतिभा पर उनके बास की नज़र पड़े और उनके भाग्य का पिटारा खुल जाए लेकिन ऐसा कभी कभार ही हो पाता है। आलम ये है कि कई स्टूडेंटस इसी गलतफहमी में एक-एक साल तक अलग-अलग मीडिया संस्थान में केवल इंटर्नशिप ही करते नज़र आते हैं लेकिन आखिर में सिवाय मायूसी के इनके हाथ कुछ नही लगता।

अब एक दिलचस्प बात...मीडिया के दिग्गजों के बारे में ...मीडिया के महारथी माने जाने वाले दिग्गज पत्रकारों का एक हुजुम ऐसा भी है जिन्हें अगर गलती से फोन कर नौकरी की बात कर दी जाए तो वे ऐसे रिएक्ट करते हैं जैसे उनसे राह चलते कोई भिखारी टकरा गया हो। फोन करने वालों से इनका पहला सवाल यही होता है कि तुम्हें मेरा नंबर किसने दिया। मीडिया के इन महारथियों को शायद इस बात का इल्म तो होगा ही कि इस इण्डस्ट्री में उनके फोंन नंबर तो क्या आज की तारीख में किसी का भी नंबर हासिल करना कोई टेढ़ी खीर नही है। हैरानी की बात तो ये है कि अपने बीते दिनों को ऐसे लोग जरा भी याद नही रखते जब इन्होंने भी नौकरी के लिए इधर-उधर खाक छानी होगी।

ये बात जगजाहिर है कि अब पुराने पत्रकारिता के दिन लद गए जब पत्रकार मतलब कुर्ता-पजामा और कंधे पर बैग होता था। उस दौर में पत्रकारिता का मकसद भी कलम की ताकत से हवा का रूख मोड़ देना था...आज पत्रकारिता के मॉडर्न लुक में ज्यादातर बड़े पत्रकारों के पास नए मॉडल की चार-पहिया गाड़ी होती है। तनख्वाह तो पूछिए मत....सुनते ही होश उड़ जाएंगे। ज्यादातर संपादक अपने संस्थान में इस बात को अक्सर कहते सुने जाते हैं कि चैनल या अखबार मैं समाजसेवा के लिए नही चला रहा हूं। अखबारों में जहां सर्कुलेशन को लेकर भस्सड़ मची रहती है, ठीक यही हाल टीवी चैनलों में टीआरपी को लेकर दिखाई देता है। कही फलां न्यूज चैनल या अखबार उनसे आगे नही निकल जाए इस बात को लेकर संपादक दफ्तर के हर कर्मचारी को अक्सर नसीहत झाड़ते नज़र आते हैं। अगर गलती से भी टीआरपी या सर्कुलेशन कम हुआ तो गाज गिरना तय है।

ऐसे हालात में मैं मीडिया के उन तमाम स्टूडेंटस को यही ताकीद करना चाहूंगा कि अगर प्रतिभा, पेशेंश और सबसे महत्वपूर्ण चीज जुगाड़ है तभी इस फील्ड में कदम रखें। नही तो..... ये राह नहीं आसां बस इतना समझ लीजै। इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।

(लेखक प्रज्ञा टीवी में एसोसिएट प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर हैं)





आनंद प्रधान
अपने समाचार चैनलों में कुछ अपवादों को छोड़कर आक्रामकता और शोर बहुत है। इस हद तक कि खबरें चीखती हुई दिखती हैं। एंकर और रिपोर्टर चिल्लाते हुए से लगते हैं। चर्चाएं हंगामाखेज होती हैं। धीरे-धीरे यह शोर और आक्रामकता चैनलों की सबसे बड़ी पहचान बन गई है। संपादक इस बात को बड़े फाख्र से अपने दमखम, साहस और स्वतंत्रता की निशानी के बतौर पेश करते हैं। उनका दावा है कि उन्होंने हमेशा बिना डरे, पूरी मुखरता से न्याय के हक में आवाज उठाई है। इसके लिए आवाज ऊंची भी करनी पड़ी है तो उन्होंने संकोच नहीं किया है।

चैनलों के कर्ता-धर्ताओं का तर्क है कि उनकी आक्रामकता और शोर आम लोगों को जगाने और ताकतवर लोगों को चुनौती देने के लिए जरूरी हैं। बात में कुछ दम है। कई मामलों में यह आक्रामकता और शोर जरूरी भी लगता है। पहरेदार की उनकी भूमिका को देखते हुए यह स्वाभाविक भी है। यह भी सही है कि कई मामलों में चैनलों के इस शोर से सत्ता या उसका संरक्षण पाए शक्तिशाली अपराधियों को पीछे हटना पड़ा या कमजोर लोगों को न्याय मिलने का अहसास हुआ़ भले ही चैनलों के भ्रष्टाचार विरोधी या न्याय अभियान का दायरा ज्यादातर कुछ सांसदों, छोटे-मोटे नेताओं-अफसरों, बड़े शहरों और उनके उच्च मध्यमवर्गीय लोगों तक सीमित रहा हो लेकिन इसके लिए भी चैनलों की तारीफ होनी चाहिए। आखिर कुछ नहीं से कुछ होना हमेशा बेहतर है।

कल्पना करिए कि आज से 50 या 100 साल बाद जब इतिहासकार हमारे मौजूदा चैनलों की रिकॉर्डिंग के आधार पर आज का इतिहास लिखेंगे तो उस इतिहास में क्या होगा? वह किस देश का इतिहास होगा और उस इतिहास के नायक, खलनायक और विदूषक कौन होंगे? लेकिन समाचार चैनलों से उनके दर्शकों की अपेक्षाएं इससे कहीं ज्यादा हैं। मशहूर लेखक आर्थर मिलर ने अच्छे अखबार की परिभाषा देते हुए लिखा था कि अच्छा अखबार वह है जिसमें देश खुद से बातें करता दिखता है। बेशक, समाचार चैनलों के लिए भी यह कसौटी उतनी ही सटीक है। सवाल यह है कि हमारे शोर करते चैनलों में हमारा वास्तविक देश कितना दिखता है? क्या उनमें देश खुद से बातें करता हुआ दिखाई देता है? याद रखिए, चैनल कहीं न कहीं हमारे दौर का इतिहास भी दर्ज कर रहे हैं। जाहिर है कि स्रोत के बतौर चैनलों को आधार बनाकर लिखे इतिहास में मुंबई, दिल्ली और कुछ दूसरे मेट्रो शहरों का वृत्तांत ही भारत का इतिहास होगा जिसमें असली नायक, खलनायक की तरह, खलनायक, विदूषक और विदूषक, नायक जैसे दिखेंग़े। इस इतिहास में कहानी तो बहुत दिलचस्प होगी लेकिन उसमें गल्प अधिक होगा, तथ्य कम। शोर बहुत होगा पर समझ कम। थोथापन, आक्रामकता, कट्टरता, जिद्दीपन जैसी चीजें ज्यादा होंगी मगर न्याय और तर्क कम। बारीकी से देखें तो साफ तौर पर चैनलों के शोर और आक्रामकता के पीछे एक षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी और भीरुपन भी दिखाई देगा। लगेगा कि चैनल जान-बूझकर शोर-शराबे और आक्रामक रवैए के पीछे कुछ छुपाने में लगे रहते हैं। आखिर वे क्या छुपाते हैं? गौर से देखिए तो वे वह हर जानकारी छुपाते या नजरअंदाज करते हैं जिससे नायक, नायक, खलनायक, खलनायक और विदूषक, विदूषक की तरह दिखने लग़े, इसीलिए चैनल आम तौर पर उन मुद्दों से एक हाथ की दूरी रखते हैं जो सत्ता तंत्र द्वारा तैयार आम सहमति को चुनौती दे सकते हैं।

नहीं तो क्या कारण है कि माओवादी हिंसा को लेकर जो चैनल इतना अधिक आक्रामक दिखते और शोर करते हैं, वे छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और बंगाल में जमीन पर क्या हो रहा है, उसकी रिपोर्टिंग के लिए टीम और कैमरे नहीं भेजते? क्या ये जगहें देश से बाहर हैं? इन राज्यों में जमीन, जंगल, नदियों और संसाधनों के साथ ही वहां के मूल निवासियों की क्या स्थिति है, इसके बारे में खबर हर कीमत पर, सच दिखाने का साहस, आपको रखे आगे और सबसे तेज होने का दावा करने वाले चैनलों से नियमित वस्तुपरक रिपोर्ट की अपेक्षा करना क्या चांद मांगने के बराबर है?

क्या चैनलों से यह उम्मीद करना गलत है कि वे मुंबई में बाल-उद्घव-राज ठाकरे को दिन-रात दिखाने और शोर मचाने के बाद कुछ समय निकालकर युवा वकील शाहिद आजमी की हत्या पर भी थोड़ी आक्रामकता दिखाएंगे? या देश भर में कहीं नक्सली, कहीं माओवादी और कहीं आतंकवादी बताकर पकड़े-मारे जा रहे नौजवानों के बारे में थोड़े स्वतंत्र तरीके से खोजबीन करके निष्पक्ष रिपोर्ट दिखाएंगे? क्या वे उन बुद्घिजीवियों-पत्रकारों के बारे में तथ्यपूर्ण रिपोर्ट सामने लाएंगे, जिन्हें नक्सलियों का समर्थक बताकर गिरफ्तार किया गया है या जिनकी हिरासत में मौत हुई है? क्या वे चंडीगढ़ की रुचिका की तरह छत्तीसगढ़ के गोंपद गांव की सोडी संबो की कहानी में भी थोड़ी दिलचस्पी लेंगे और उसे न्याय दिलाने की पहल करेंगे? दरअसल, शोर-शराबे और आक्रामकता के बावजूद ऐसे सैकड़ों मामलों में चैनलों की चुप्पी कोई अपवाद नहीं। यह एक बहुत सोची-समझी चुप्पी है जिसे चैनलों के शोर-शराबे में आसानी से सुना जा सकता है।

(आनंद प्रधान भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं और उनका यह लेख तहलका से साभार लिया गया है)

आधी के लिए तिहाई क्यों?

महिला आरक्षण बिल बहुमत से राज्य सभा में पास हो गया आशा है कि लोक सभा में भी पास हो जाएगा लेकिन सवाल अभी भी है. जिसके लिए सभापति का माइक तोड़ दिया गया बिल की कापियां फाड़ दी गयीं. क्या ये मसक्कत सिर्फ बिल को पास होने से रोकने के लिए थी? या जनता के प्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र में जा कर मुंह भी दिखाना था तो पिछड़े-दलितों-औरतों की बात भी करनी थी सो कर दिया.

अगर दुसरे पार्टियों के लिए मुद्दा महिला आरक्षण बिल को सिर्फ पास कराना था तो बहस का कोई मतलब नहीं हैं लेकिन मुझे लगता हैं कि एक बार फिर सोचने कि जरुरत है कि आखिर यह क्यों तय किया गया कि कोटा कि जरुरत है? अगर विकास सिर्फ मुद्ददा है तो क्या ये सोचे जाने कि जरुरत नहीं है कि आखिर हम किस कोटा की बात कर रहे हैं जिससे आज तक सिर्फ गिने-चुने-पढ़े-लिखे-खाते-पीते घरों का भला हुआ है अगर आप को लगता है कि प्रति व्यक्ति आय का बढ़ जाना या आर्थिक विकास कि दर ऊँची हो जाना ही विकास है तब तो ठीक है पर लगता नहीं कि ऐसा है. पता नहीं आंकड़े क्या कहते हैं पर मुझे तो मंडल कमीशन की सिफारिशों, OBC/SC/ST कोटा और पता नहीं कितने कोटों के बाद भी गरीबों-असहायों-लाचारों-मजलूमों-किसानों-मेहनतकशों की स्थिति में सुधार होता नज़र नहीं आता अगर मुझे चश्मे की जरुरत हो तो वो भी बतायें. आज भी इसी आस में कि अगर आरक्षण की सूची में नाम आ जाए तो नौकरी मिल जायेगी-घर बन जाएगा-सरकारी राहत मिल जायेगी और जाने क्या-क्या के बहाने लोग जगह-जगह आन्दोलन छेड़ते रहते हैं. 
क्या इन आधी आबादी की शोषितों को मुट्ठी भर आरक्षण दे देने से उनका समूल विकास हो जायगा? अभी भी पंचायतों के कई चुनाव में महिलाओं का सीट आरक्षित है लेकिन वहां सत्ता किसके हाथ में होती है प्रधान पति के हाथ में. सच्चाई से मुह मत मोड़िये आज आरक्षण जैसे लालच की कोई प्रासंगिकता नहीं है ये सिर्फ वोट बैंक का चक्कर है जिसे राजनैतिक पार्टियाँ भुना रहीं हैं. महिलाओं को मुट्ठी भर आरक्षण तो ऐसे दे रहीं हैं जैसे सारा राज-पाट सौपें दे रहीं हैं.

 
आखिर क्यों किसी पार्टी कि औकात नहीं हुई कि वह आरक्षण बिल का विरोध कर सके सिर्फ इसलिए कि कोई अपने वोट बैंक में सेंध नहीं लगवाना चाहता है लेकिन जैसे ही किसी पार्टी से पूछा जाता है कि आप ने चुनाव में कितनी टिकटें महिलाओं को दी थी सभी के मुंह पर टेप चिपक जाती है, अपनी बगलें झाँकने लगते हैं. भाई साहब नियत में ही खोट है अगर नियत साफ़ होती तो कोई पार्टी भला करने के लिए बिल का इंतज़ार नहीं करती समाज सेवा करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता का ठप्पा लगाना जरुरी है क्या?  कोई बिल कोई आरक्षण कभी भी किसी समाज का भला नहीं कर सकता है मेरी इस बिल को लेकर कोई आपति नहीं है लेकिन कृपया इसे किसी नैतिकता या आदर्श राजनैतिक पहल के रूप में मत देखिये. 

'जंग में क़त्ल सिपाही ही होंगे, सुर्ख रु जिल्ले इलाही ही होंगे'


भारतीय धर्मशास्त्रों को यदि झुठला दें तो इस मुल्क का इतिहास लगभग पांच हजार साल पुराना है। इन पांच हजार सालों में इस मुल्क ने बहुत कुछ खोया-पाया है। भारतीय जाति व्यवस्था भी उसी सामाजिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है। वर्ण व्यवस्था का जाति व्यवस्था में बदल जाना भी खोने और पाने में ही शामिल है। मैं आपको पांच हजार सालों के इतिहास का इतिहास नहीं बता रहा हूँ बल्कि कोशिश कर रहा हूँ कि जो बात मैं कहना चाह रहा हूँ वो स्पष्ट हो सके। आप इन पांच हजार सालों के इतिहास को शोषण का इतिहास, सवर्णों का इतिहास, शोषितों का इतिहास या कुछ और जो आपको बेहतर लगे मान सकते हैं। आखिर इतिहास भी तो सत्ता का ही एक 'टूल' होता है ठीक वैसे ही जैसे राजनीति होती है, या आरक्षण होता है।

आज़ाद हिन्दोस्तान से पहले राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान के इतिहास पर गौर करें तो अम्बेडकर-गांधी विवाद हमे प्रस्तुत विषय पर कुछ रौशनी डालता है। गांधी का प्रथक निर्वाचन मंडलों का विरोध करना, अम्बेडकर का प्रथक निर्वाचन मंडलों के सवाल पर अडे रहना किन्तु अंत गाँधी के 'फास्ट अनटो देअथ' के सामने झुक जाना और पूना पेक्ट पर हस्ताक्षर कर गांधी के पक्ष को मान लेने को आप सवर्ण विजय कह सकते हैं चाहें तो सवर्ण चाल या फिर दलित पराभव। औपनिवेशिक शासकों के लिए ये एक फायदा था।

बात न ही दलित पराभव के साथ ख़तम होती है और नाही सवर्ण विजय के साथ। दरअसल बात यहीं से शुरू होती है। यदि गौर से देखा जाये तो अब सवर्ण और दलित का सवाल नहीं है बल्कि राजनितिक सवर्ण और राजनितिक दलित का है। और यदि आप राजनितिक शब्द को इस मुल्क के इलेक्टोरल प्रोसेस में ही सीमित करके देखेंगे तो समस्या और गंभीर हो जाएगी। मैं जिस राजनितिक सवर्ण की बात कर रहा हूँ वो इससे कहीं ज्यादा व्यापक है। और इसमें ये भी ज़रूरी नहीं है की राजनितिक सवर्ण जाति से भी सवर्ण हो। वो दलित होकर भी राजनितिक सवर्ण हो सकता है और जिसके उदाहरण हमारी व्यवस्था में आपको बहुत मिल जायेंगे। मशहूर समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास ने एक ज़माने में संस्कृतिकरण को परिभाषित किया था जिसके मूल में निचली जातियों द्वारा उच्च सामाजिक दर्जा हासिल करने की प्रक्रिया थी। ये प्रक्रिया ब्रह्मनिकल मूल्यों और आचरण को गैर ब्राहमणों द्वारा अपना लेने को इंगित करती है जिसमे गैर ब्राहमण जातियां इस कदर ब्रहामनिकल मूल्यों और आदर्शों को अपना लेती हैं के उनके अपने मूल्य और आदर्श समाप्त हो जाते हैं। हमारा राजनितिक सवर्ण भी दरअसल कुछ ऐसा ही है। ये वो लोग हैं जो सत्ता पर अपनी पकड़ रखते हैं, सत्ता प्रतिष्ठानों पर काबिज हैं, उन्हें अपने तरीके से मोल्ड कर सकते हैं तोड़ मरोड़ सकते हैं। कहने का मतलब है की बात अब केवल अगड़ों, दलितों और पिछड़ों से बाहर की है। एक तरफ वो हैं जो पोलिटिकल सवर्ण है और दूसरी तरफ पोलिटिकल दलित व पिछड़े लोग। जिसका चांस पोलिटिक्स में लग गया वो रातों रात सवर्ण हो जा रहा है,और जो इस परिधि से बाहर हैं वो हाशिये पर हैं। अब बात राजनीतिकरण की है.

मुझे हैरानी हो रही है इस हाय तोबा को देखकर जो महिला आरक्षण के सवाल पर मची हुई है। मैं इस हालत में नहीं हूँ की इस पर कोई स्टैंड ले कर अपनी बात कह सकूं। क्योंकि ये व्यवस्था स्टैंड के मुद्दे पर केवल दो विकल्पों को पेश कर रही है। एक, या तो आप इसका समर्थन करें और दो के इसका विरोध करें। इनके अलावा और कोई विकल्प प्रस्तुत ही नहीं किया जा रहा और न ही ऐसी कोई गुंजाईश ही छोड़ी है की कोई विकल्प पेश किया जा सके। ये ठीक उसी किस्म की रिक्तता है जो हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विधमान है। यानी की घूम फिर कर बात वहीँ आ जाएगी जहाँ से शुरू हुई। हमारी महिलाएं भी पोलिटिकल सवर्ण बन्ने को बेक़रार हैं? यदि हां, तो कितनी ? इसका समुचित उत्तर दिए बिना कोई फैसला करना बेमानी ही होगी क्यूंकि इस मुल्क की सभी महिलाएं शहरों में नहीं रहती हैं और सभी की समस्या केवल तैंतीस फीसद आरक्षण से समाप्त नहीं हो जाएँगी। फिर इसका लाभ किन लोगों को मिलने वाला है? वो कौन भारतीय नारियां हैं जिनका जीर्णोधार इससे होने वाला है। कहीं ये वो ही पोलिटिकल सवर्ण तो नहीं जिसने इस बार नारी की शकल अख्तियार कर ली है?

मैं इस बात से बिलकुल इत्तेफाक रखता हूँ की राजनितिक प्रतिनिधित्व सामाजिक परिवर्तन का और सामाजिक रूप से शोषित व उपेक्षित लोगों को शाश्क्त करने का ठोस जरिया है। संविधान में राजनितिक आरक्षण कुछ इन्ही आदर्शों को सोच कर रखा गया था। लेकिन अफ़सोस की बात ये है की इसने केवल कुछ का ही भला किया है। तो क्या फिर हम ये मान ले की महिला आरक्षण भी उन्ही 'कुछ' को ध्यान में रखकर प्लान किया गया है। आरक्षण मिल जाने की हालत में भी इस बात की क्या गारंटी है की जिनकी (पुरुष प्रधानता) की वजह से ये पूरा मामला उठा उस की मानसिकता या सोच में कुछ बुनियादी बदलाव आएगा? ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब या विकल्प तक ये व्यवस्था नहीं देती।

१७८९ की फ्रांस की क्रांति ने दुनिया भर को हिला दिया था। इसने दुनिया को पहला विकल्प दिया की राजतन्त्र के अलावा भी कोई व्यवस्था हो सकती है। लेकिन इस क्रांति ने महिलायों को कोई फायदा नही पहुंचाया। उन्हें वोट देने का हक नहीं था। महिलाओं ने लोकतंत्र के इस बुनियादी हक को पाने के लिए फ्रांस में एक लम्बी लड़ाई लड़ी ओर बीसवीं सदी के मध्य में यानी के १९४६ में आकर इस बुनियादी हक को हासिल किया। लेकिन ये लड़ाई महिलाओं ने अपने दम पर लड़ी थी। और तब तक लड़ी थी जब तक की पुरुषीय मानसिकता हार नहीं गयी। कोई समझोता या बारगेनिंग की गुंजाईश ही नहीं रकखी। लड़ाई आर या पार की लड़ी। क्या ऐसी लड़ाई लड़ने की अपेक्षा हम भारत के उस महिला समुदाय और उनसे रख सकते हैं जो महिला आरक्षण को किसी भी सूरत में कानूनी जामा पहनाने की जुगत में भिडे हुए हैं या उनसे जो इस बिल के वर्तमान स्वरुप को स्वीकार नहीं कर रहे हैं और इसमें परिवर्तन चाहते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है की आरक्षण की आड़ में पुरुषीय मानसिकता महिलाओं की नाक में नकेल डालकर उसका कण्ट्रोल अपने हाथ में रखने की कोशिश कर रही है?

मैं पहले ही कह चूका हूँ की ये व्यवस्था इस विषय पर दो के अलावा कोई और विकल्प नहीं देती। और सच कहूं तो ये एक बहुत भयानक हालत है। इस विकल्पहीनता से लाभ पोलिटिकल सवर्ण को ही मिलने वाला है क्यूंकि 'जंग में क़त्ल सिपाही ही होंगे, सुर्ख रू जिल्ले इलाही ही होंगे'।