Visit blogadda.com to discover Indian blogs कठफोड़वा: rail ki patriyaan

rail ki patriyaan

ट्रेन की पटरियों पर
दर्ज़नो जिंदगियां चलती हैं
कुछ सुलझी हुई कुछ उलझी सी
कुछ खुद में गुम लोगो की दुनिया
कुछ दुसरो में ढून्दते अपनी सी दुनिया

धक्के से चढ़ते धक्के से उतरते
जीवन की पटरी भी ऐसी ही लगती है
रुक रुक के चलने वाली
चलते चलते रुक जाने वाली


कुछ हँसते चेहरे, कुछ नम आँखें
कई चीखती आवाजें, कुछ गुदगुदाती किस्से
नए अजीब रिश्ते
रेल की पटरियों पर रोज़
चलती है दर्ज़नो जिंदगियां

एक बुरा दिन, एक सुहानी शाम
कुछ यहाँ की, कुछ वहां की
एक अनजान सफ़र पर
चंद जाने पहचाने चेहरों के बीच
यह दुनिया अपनी सी लगने लगती है

फिर हर दिन जीवन की पटरियां
रेल की पटरियों से मिल कर
एक नयी कहानी  लिख्ती हैं

और में इन सब के बीच
खुद को खड़ा देख सोचती हूँ
क्या में भी इन्ही में से एक हूँ?

Comments :

2 comments to “rail ki patriyaan”
जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…
on 

आपके यहाँ आकर अच्छा लगा।

book publishing ने कहा…
on 

Extremely beautiful creation.
online ebook publisher

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