आनन्द स्वरूप वर्मा देश के जाने माने पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। संभवत: नेपाल की राजनीति और खासतौर पर वहां की माओवादी राजनीति पर भारत में उनसे ज्यादा गहराई के साथ कम ही लोग जानते हैं। अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जाने वाले वर्मा जी जब रौ में बोलते हैं तो इतना सच कि जुबां कड़वी हो जाए। जाहिर है सच कड़वा ही होता है। छपास डॉट कॉम के राजनीतिक संपादक अमलेन्दु उपाध्याय ने उनसे नेपाली माओवाद और भारत नेपाल संबंधों पर लम्बी बातचीत की। प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश :-
आपकी फिल्म ‘फ्लेम्स ऑफ स्नो’ पर सेंसर बोर्ड ने पाबंदी क्यों लगा दी?
सेंसर बोर्ड का कहना है कि इस देश में अभी जो माओवादी आन्दोलन है, उसका जो विस्तार हुआ है उसे देखते हुए हम इस फिल्म पर रोक लगा रहे हैं। लेकिन हमारा कहना है कि इस फिल्म में भारत के माओवादी आन्दोलन के विषय में एक शब्द भी नहीं कहा गया है, कोई फुटेज भी नहीं है कोई स्टिल भी नहीं है। ऐसी स्थिति में अगर नेपाल के आन्दोलन पर, केवल माओवादी आन्दोलन पर नहीं बल्कि वहां के समग्र आन्दोलन पर कोई फिल्म बनाई जा रही है तो उसको यह बहाना देकर रोकना एकदम अनुचित है। क्योंकि यह फिल्म माओवादी आंदोलन के ऊपर नहीं है बल्कि उसके ऊपर केन्द्रित है। क्योंकि इस फिल्म की शुरूआत होती है जब पृथ्वीनारायण शाह ने नेपाल की स्थापना की थी यानि दो सौ ढाई सौ साल के दौरान जो आन्दोलन हुए उनकी झलक देते हुए यह माओवादी आन्दोलन पर केन्द्रित हो जाती है। क्योंकि यह मुख्य आन्दोलन था जिसने वहां राजशाही को समाप्त किया। अब अगर आप यह कहते हैं कि इस फिल्म से यहां के माओवादियों को प्रेरणा मिलेगी तो किसी एक जनतांत्रिक देश में इस तरह की बात कहकर किसी फिल्म को रोकना अनुचित है। तब तो अगर नेपाल के आन्दोलन पर कोई पुस्तक लिखी जाएगी तो भी प्रेरणा मिलेगी? यह स्थिति तो बिल्कुल जो हमारा फन्डामेन्टल राइट यानि अभिव्यक्ति की आजादी है उसका गला घोंटना है।
क्या भारत का माओवाद और नेपाल का माओवाद अलग-अलग है?
मेरे विचार में हर देश का माओवाद अलग-अलग होता है। क्योंकि जितने भी विचारक रहे हैं मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओत्से तुंग या आज के दौर में प्रचण्ड, सबका यही कहना है कि मार्क्सवाद-लेनिनवाद जो एक सिद्धान्त है, उसको आप अपने देश की सांस्कृतिक, भौगोलिक, राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के अनुरूप लागू कीजिए। हर देश की राजनीतिक सामाजिक पृष्ठभूमि अलग होती है। नेपाल में राजतंत्र था और वहां एक जबर्दस्त सामंती राजनैतिक व्यवस्था थी। उसमें उन्होंने वहां किस परिस्थिति में माओवाद को लागू किया यह उनका मामला है। भारत के माओवाद और नेपाल के माओवाद में बहुत फर्क है। क्योंकि उन्होंने तो चुनाव में भी हिस्सा लिया और सरकार बनाई। जबकि भारत में अभी ऐसी स्थिति नहीं है। दोनों स्थितियों में फर्क तो काफी है। लेकिन नेपाल के माओवादी आन्दोलन से भारत के माओवादी आन्दोलन को प्रेरणा लेने का सवाल है, जैसा कि सेंसर बोर्ड कहता है तो वह यह भी प्रेरणा ले सकते हैं कि किस तरह कोई आन्दोलन आम जनता के बीच न केवल आदिवासियों के बीच पॉपुलर हो सकता है, मध्यवर्ग को भी प्रभावित कर सकता है, मध्यवर्ग को भी अपने दायरे में ले सकता है और वह एक निरंकुश व्यवस्था के खिलाफ सफल हो सकता है। तो दोनों में फर्क तो है। अब भारत में जो लोग हैं जो सत्ता में बैठे हैं जो सेंसर बोर्ड देख रहे हैं उनकी अकल इतनी नहीं है कि इतना विश्लेषण कर सकें।
क्या आपको लगता है कि भारत की सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था माओवादियों के खिलाफ हो चुकी है?
भारत के माओवादियों के?
जी भारत के माओवादियों के
नहीं यह तो एक दूसरा सवाल हो गया क्योंकि इसका मुझसे कोई मतलब नहीं है। ( हंसते हुए) अगर आप हमसे भारत के माओवादी आन्दोलन पर बातचीत करना चाहते हैं तो एक अलग बात है। हमसे तो नेपाल पर ही बात करें।
चलिए नेपाल पर ही केन्द्रित होते हैं। अक्सर यह आरोप लगते रहे हैं कि नेपाल के माओवादियों से भारत के माओवादियों को समर्थन और मदद मिलती रही है और नेपाली माओवादियों का रुख हमेशा से भारत विरोधी रहा है। क्या नेपाली माओवादी वास्तव में भारत विरोधी हैं?
इसके लिए तो आपको यह देखना होगा कि भारत के माओवादियों की केन्द्रीय समिति और उनके बड़े नेता गणपति के हस्ताक्षर से अब से एक डेढ़ साल पहले खुली चिट्ठी नेपाल के माओवादियों को लिखी गई जिसमें नेपाली माओवादी आन्दोलन की तीखी आलोचना की गई। इस पत्र में यह आलोचना की गई कि नेपाली माओवादी क्रांति का रास्ता छोड़ करके संशोधानवादी हो गए। यह तो दोनों के संबंधों की बात है। जहां तक नेपाल के माओवादियों से मदद मिलते रहने की बात है तो वह इस स्थिति में कभी नहीं रहे कि भारत जैसे किसी विशाल देश के किसी संगठन को मदद कर सकें। अगर आप दोनों देशों के एरिया और आबादी की और रिसोर्सेस से तुलना करें तो देखेंगे कि वह भारत के मुकाबले कहीं ठहरते ही नहीं हैं। ऐसे में वह अपने को संभालेंगे कि भारत के माओवादियों की मदद करेंगे। इसलिए कोई भौतिक मदद या इस तरह की मदद की बात नहीं है लेकिन बिरादराना संबंध वह मानते हैं। वह तो भारत के माओवादियों के साथ, पेरू के माओवादियों के साथ, कोलंबिया के माओवादियों के साथ, हर देश के माओवादियों के साथ एक बिरादराना संबंध मानते हैं। वैसे ही भारत के माओवादियों के साथ मानते हैं। इससे ज्यादा उनका कोई लेना देना नहीं है।
लेकिन प्रचण्ड प्रधानमंत्री बनते ही पहले चीन गए जबकि परंपरा रही है कि नेपाल का राजनेता पहले भारत आता है। वैसे भी हम नेपाल के ज्यादा नजदीक हैं, क्योंकि हमारे सदियों पुराने संबंधा नेपाल से हैं। इस कदम से नहीं लगा कि प्रचण्ड के मन में भारत के प्रति कोई गांठ है?
देखिए यह कौन सी परंपरा है कि कोई प्रधानमंत्री जो बनेगा वह पहले भारत आएगा? भारत कोई मंदिर है जो वहां जाएगा और मत्था टेकेगा? जहां तक मेरा सवाल है मैं इस परंपरा के एकदम खिलाफ हूं। दूसरी बात किन परिस्थितियों में प्रचण्ड भारत न आकर चीन गए उसे देखना पड़ेगा। किसी भी विषय पर बात करते समय उस पूरी प्रक्रिया को देख लीजिए न कि केवल परिणिति। केवल परिणिति को देखने पर सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंचेंगे। वह पूरी प्रक्रिया क्या थी मैं आपको थोड़ा संक्षेप में बता दूं। वहां पर बीजिंग में ओलंपिक खेल चल रहे थे चीन में। खेलों के उद्धाटन के समय चीन ने वहां के राष्ट्रपति को निमंत्रण दिया। रामबरन यादव को, जो नेपाली कांग्रेस के हैं। वह जब निमंत्रण मिला तो भारत के नेपाल में राजदूत राकेश सूद ने राष्ट्रपति से कहा कि आप चीन मत जाइए, इससे भारत को अच्छा नहीं लगेगा। तो राष्ट्रपति ने कहा कि हम नहीं जाएंगे। अब केवल बात राष्ट्रपति और राकेश सूद के बीच की होती तो यह किसी भी तरह स्वीकार्य हो सकती थी। मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह भी स्वीकार्य नहीं है। लेकिन डिप्लोमैटिक रूप से एकबारगी यह स्वीकार्य हो सकता है। लेकिन राकेश सूद ने यह जानकारी प्रेस को दी कि हमने मना कर दिया और राष्ट्रपति नहीं गए। अब नेपाल की आम जनता को यह बात बहुत अच्छी नहीं लगी कि हमारे राष्ट्रपति को एक, मतलब राष्ट्रपति तो बहुत बड़ा पद है न, राष्ट्रपति को एक ब्यूरोक्रेट भारत का मना कर दे और वह मान जाए। जब समापन समारोह के लिए, तब यह प्रचण्ड प्रधानमंत्री नहीं बने थे, 15 अगस्त 2008 को बने हैं, और उनको जाना था 16 या 17 अगस्त को, इनको भी निमंत्रण मिला समापन समारोह के लिए और प्रचण्ड ने स्वीकृति दे दी थी। राकेश सूद ने उन्हें भी मना किया कि आप मत जाइए। तब प्रचण्ड ने कहा कि मैंने स्वीकृति दे दी है तो फिर सूद ने कहा कि आप मत जाइए भारत को अच्छा नहीं लगेगा। उन्होंने कहा मैं क्यों नहीं जाऊं जब मैंने स्वीकृति दे दी है मैं जाऊंगा। और वह चले गए। मान लीजिए कि प्रचण्ड उस समय नहीं जाते और राकेश सूद इस बात को भी प्रेस में देता ही कि हमने मना किया तो एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति और प्रधाानमंत्री को भारत का राजदूत मना कर दे कि आप यह न करें वह न करो, यह उचित नहीं है। इसलिए अपनी देश की जनता की भावनाओं को देखते हुए प्रचण्ड के लिए चीन जाना जरूरी हो गया था। अगर राकेश सूद ने यह गड़बड़ियां नहीं की होतीं तो शायद वह इसको एवायड भी कर सकते थे। इसलिए इस घटना का विश्लेषण पूरी परिस्थिति देखकर ही करना चाहिए। हालांकि प्रचण्ड ने भी इसके बाद जो कहा मैं उससे भी बहुत सहमत नहीं हूं कि ‘मेरी पहली राजनीतिक यात्रा तो भारत की ही होगी। क्या जरूरत थी यह भी कहने की। नेपाल एक संप्रभु राष्ट्र है वह भारत का कोई सूबा नहीं है कोई प्रॉविंस नहीं है कोई प्रांत नहीं है।
देखने में आ रहा है कि माओवादियों का आन्दोलन नेपाल में भी कुछ कमजोर पड़ता जा रहा है और आम जनता पर उनकी पकड़ कुछ ढीली पड़ती जा रही है। क्या कारण हैं कि माओवादी कमजोर पड़ रहे हैं?
यह कहने का आधार कोई है?
जी बिल्कुल। अभी उन्होंने हड़ताल का आह्वान किया और लोगों ने सड़को पर उतरकर उसका विरोध किया तो उन्हें हड़ताल वापस लेनी पड़ी?
नहीं। एक मई को जो हड़ताल का आह्वान किया था, वह आप नेपाल के किसी भी सोर्स से पता कर लीजिए अखबार से, जो बुर्जुआ अखबार हैं उनसे मालूम कीजिए वह अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन था। रहा सवाल यह हड़ताल वापस लेने का तो वैसे भी उस को चार पांच दिन से अधिक नहीं चलाते क्योंकि उससे वहां की आम जनता को काफी दिक्कतें उठानी पड़तीं। लेकिन एक चीज का ध्यान दीजिए कि राजतंत्र समाप्त तो हो गया, भौतिक रूप से समाप्त हो गया। लेकिन अभी तमाम राजावादी तत्व सभी पार्टियों में मौजूद हैं। सामन्तवाद वहां अभी मौजूद है, वह तो समाप्त नहीं हुआ है। तो बहुत सारे ऐसे तत्व हैं जो इस समय अपने को माओवादियों के खिलाफ लामबंद कर रहे हैं। पिछले एक वर्ष के दौरान माओवाद विरोधी ताकतों को नजदीक आने का एक अच्छा मौका मिला है। इसमें बहुत सारी अन्तर्राष्ट्रीय ताकतें जिसमें अमेरिका और स्वयं भारत भी शामिल है, इन्होंने माओवाद के खिलाफ तत्वों की मदद की है। निश्चित रूप से जो खबरें आई हैं वह सही हैं कि कुछ प्रदर्शन हुए हैं काठमांडू में लेकिन काठमांडू और शहर तो कभी भी माओवादियों के आधार नहीं रहे उनका आधार तो ग्रामीण इलाका है। काठमांडू में जरूर इस तरह के तत्व हैं लेकिन केवल इस आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि उनकी पकड़ कमजोर पड़ गई है। क्योंकि जिस दिन माओवादियों की पकड़ कमजोर पड़ जाएगी उन्हें नष्ट करने में एक मिनट का भी समय वह ताकतें नहीं लगाएंगी जो उनकी विरोधी हैं।
प्रचण्ड ने बीच में एक बार आरोप लगाया था कि उनकी सरकार गिराने में विदेशी ताकतों का हाथ था और खासतौर पर उन्होंने भारत की तरफ इशारा किया था और आपने सुना भी होगा कि योगी आदित्यनाथ ने बयान दिया था कि राजतंत्र की बहाली के लिए वह नेपाल जाएंगे, बाबा रामदेव भी वहां गए और आरएसएस के प्रचारक इन्द्रेश जी के भी नेपाल में पड़े रहने की खबरें आई थीं। तो क्या आपको लगता है कि भारत की दक्षिणपंथी ताकतें माओवादियों के खिलाफ नेपाल में काम कर रही हैं?
जी हां, प्रचण्ड ने केवल संकेत ही नहीं दिया था बल्कि उन्होंने खुलकर कहा था कि भारत ने उनकी सरकार गिराने में पूरी मदद की थी। और उसकी वजह थी कि सेनाध्यक्ष रुकमांगद कटवाल वाला प्रकरण। कटवाल को जब प्रचण्ड ने बर्खास्त किया तो तीन-तीन बार कटवाल ने प्रधानमंत्री के आदेशों की अवहेलना की थी। इसलिए जरूरी हो गया था उन्हें बर्खास्त करना। उस समय भी राकेश सूद ने प्रचण्ड से कहा था कि अगर आप कटवाल को बर्खास्त करेंगे तो इसके बहुत गम्भीर परिणाम होंगे। अपमानजनक शब्दावली प्रयोग की थी हमारे राजदूत ने। इस राजदूत ने तो ठेका ले रखा है नेपाल की जनता को भारत विरोधी बनाने का। जबकि हम लोग लगातार यह प्रयास करते हैं कि दोनों देशों की जनता के बीच एक सद्भाव बना रहे। लेकिन राकेश सूद की वजह से यह सद्भाव बहुत समय तक बना नहीं रह पाएगा। इसके बाद प्रचण्ड ने कटवाल को बर्खास्त किया। एक निर्वाचित प्रधानमंत्री को यह अधिकार है कि वह सेनाधयक्ष को बर्खास्त कर सके। उन्होंने बर्खास्त किया और राष्ट्रपति ने उन्हें बहाल कर दिया। उन राजनीतिक दलों ने खासतौर पर नेकपा एमाले जो वहां की प्रमुख राजनीतिक दल है उसके अधयक्ष झलनाथ खनाल ने, जिनकी पार्टी सरकार में शामिल थी, वायदा किया कि कटवाल की बर्खास्तगी का वह समर्थन करेंगे। लेकिन जब प्रचण्ड ने बर्खास्त किया तो उन्होंने समर्थन वापस ले लिया। यह प्रचण्ड का मानना है और वहां की जनता का मानना है कि नेकपा एमाले ने जो समर्थन वापिस लिया वह भारत के इशारे पर वापिस लिया। अब यह बात सही है या गलत मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। लेकिन आम नेपाली जनता के अन्दर धारणा यही है, राकेश सूद की हरकतों की वजह से, कि भारत ने ही प्रचण्ड की सरकार गिराने में मदद की। और यही बात प्रचण्ड ने भी कही है। तो एक बात तो है कि भारत की भूमिका इस समय अच्छी नहीं रही। जिस समय नवंबर 2005 में बारह सूत्रीय समझौता हुआ था उसके बाद से भारत की बहुत अच्छी गुडविल बन गई थी नेपाल में। और नेपाली जनता भारत सरकार के प्रति सकारात्मक रुख अख्तियार कर रही थी। लेकिन कटवाल प्रसंग के बाद से लगातार एक के बाद एक कई घटनाएं ऐसी हो चुकी हैं जिनसे नेपाली जनता को लग रहा है कि भारत उसके हितों के खिलाफ काम कर रहा है। हाल के ही अखबार उठाकर देखिए, कांतिपुर और काठमांडू पोस्ट जो वहां के दो बड़े अखबार हैं, और यह माओवादी अखबार नहीं हैं। बाकायदा अखबार हैं जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया है या इंडियन एक्सप्रेस है, इनके प्रिन्ट के कोटा को अट्ठाइस दिन से यहां रोक रखा है कलकत्ता बंदरगाह पर भारत सरकार के अधिकारियों ने। महज इसलिए कि इस अखबार ने लगातार यह लिखा कि मौजूदा परिस्थिति में माधाव नेपाल को इस्तीफा दे देना चाहिए ताकि एक आम सहमति की सरकार बन सके। माधाव नेपाल की सरकार को चूंकि भारत सरकार समर्थन कर रही है इसलिए इनको यह चीज नागवार लगी। इतना ही नहीं राकेश सूद ने वहां के उद्योगपतियों को जो भारतीय उद्योगपति हैं, बुलाकर कहा कि आप लोग कांतिपुर को, काठमांडू पोस्ट को और कांतिपुर टेलीविजन को विज्ञापन देना बन्द कर दें। तो यह सारी चीजें जो हो रही हैं वह दोनों देशों की जनता के संबंधों को बहुत खराब करेंगी। मेरी चिन्ता यह है और अगर दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण होते हैं तो उससे नेपाल का नुकसान तो होगा ही क्योंकि वह छोटा देश है लेकिन भारत का भी कोई बहुत भला नहीं होने जा रहा है।
अगर प्रचण्ड यह समझ लेते कि कटवाल को बर्खास्त करने से भारत की तरफ से इस तरह का हस्तक्षेप हो सकता है तो क्या स्थिति थोड़ी सुधार सकती थी?
नहीं प्रचण्ड को तो यह मालूम पड़ गया था कि अगर हम कटवाल को बर्खास्त करेंगे तो ऐसा होगा क्योंकि उन्हें बहुत खुलकर धामकी दी थी राकेश सूद ने और शायद इस धामकी के जवाब में ही उन्हें कटवाल को बर्खास्त करना और ज्यादा जरूरी हो गया था। क्योंकि अतीत में भारत सरकार के राजदूतों के या भारत सरकार के ब्यूरोक्रेट्स की यह आदत पड़ गई थी कि वह नेपाल के प्रधानमंत्रियों को कुछ भी कह कर अपनी मनमर्जी करवाते थे। कम से कम प्रचण्ड के साथ यह बात नहीं है। उन्होंने कभी यह नहीं कहा, देखिए अगर आज नेपाल के अन्दर साक्षात् माओत्से-तुंग भी शासन करने आ जाएं तो भारत के साथ किसी तरह की दुश्मनी एफोर्ड नहीं कर सकते। इसको प्रचण्ड अच्छी तरह जानते हैं कि भारत से नेपाल तीन तरफ से घिरा हुआ है, यूं कहिए इण्डिया लॉक्ड कंट्री है। ठीक है। भारत से यह नाराजगी मोल लेंगे तो भारत उनकी जनता को कितना कष्ट पहुंचाएगा? तो अगर कोई पार्टी या कोई पार्टी का राजनेता जो सचमुच जनता के हितों की परवाह करता होगा, मैं यह मानता हूं कि माओवादी जनता की हितों की ज्यादा परवाह करते हैं और पार्टियों के मुकाबले, तो वह कभी नहीं चाहेगा कि भारत के साथ शत्रुतापूर्ण संबंधा हों, और प्रचण्ड ने कई मौकों पर यह कहा है कि हमारे पड़ोसी दो जरूर हैं चीन और भारत। हम राजनीतिक तौर से एक समान इक्वल डिस्टेंस रखेंगे दोनों से। लेकिन भारत के साथ हमारे जो संबंध हैं, सांस्कृतिक संबंध, भौगोलिक संबंध, इनकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती चीन से। हमारे और भारत के बीच में रोटी और बेटी का संबंध है, यह शब्द प्रचण्ड ने इस्तेमाल किए थे। तो जब पूरा कल्चरली एक है, दोनों की खुली सीमा है। बिहार का एक बहुत बड़ा हिस्सा खुले रूप से नेपाल आता जाता है। तो ऐसी स्थिति में प्रचण्ड खुद ऐसा नहीं चाहेंगे कि भारत के साथ हमारे संबंधा कटु हों। लेकिन उसके साथ-साथ एक संप्रभु राष्ट्र होने के नाते प्रचण्ड यह जरूर चाहेंगे कि भारत हमारी संप्रभुता का सम्मान करे। छोटे देश और बड़े देश में आकार तो हो सकता है कि अलगृअलग हों लेकिन कहीं यह नहीं होता है कि छोटे देश की संप्रभुता छोटी हो और बड़े देश की संप्रभुता बड़ी हो। अगर ऐसा होता तो इंग्लैण्ड की संप्रभुता तो बड़ी छोटी होती, जो ढाई सौ तीन सौ साल तक भारत पर शासन कर सकी। इसलिए संप्रभुता छोटी बड़ी नहीं होती है देश का आकार छोटा बड़ा होता है। इस बात को भारत का ब्यूरोक्रेट नहीं समझता है। इसलिए जरूरत यह है रूलिंग क्लास के माइंड सेट को बदलने की।
एक आरोप यह लगता रहा है कि जैसा आपने भी कहा कि यहां का जो रूलिंग क्लास ब्यूरोक्रेट है, यह भारत की विदेश नीति के साथ हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ करता रहता है। कहीं न कहीं इसके पीछे इस वर्ग के अपने कुछ निहित स्वार्थ होते हैं या कुछ और इंट्रैस्ट होते हैं? क्या यह आरोप सही है?
देखिए प्रमाण तो कोई नहीं हैं। लेकिन निश्चित तौर पर आखिर क्या वजह है कि किसी भी पड़ोसी देश के साथ हमारे संबंधा अच्छे नहीं हैं। कुछ चीजें तो हैं जो हमारे वश में नहीं हैं। भौगोलिक सीमा, ठीक है भारत एक बड़ा देश है, उसके लिए हम कुछ नहीं कर सकते। बड़े देश का एरोगेन्स तो हम रोक सकते हैं न! तो यह जो प्रॉब्लम है। भूटान के राजतंत्र को हम लगातार समर्थन देते रहे हैं। आप समर्थन दीजिए लेकिन किसकी कॉस्ट पर? वहां की जनता जो रिफ्यूजी बना दी गई जनतंत्र की मांग करने पर! यह हमारी नीति है। और हम दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र हैं और हम दुनिया के सबसे सड़े गले राजतंत्र को समर्थन देते रहे आम जनता के साथ धोखा करके। तो यह बड़ी शर्मनाक स्थिति है और यह हमारी विदेश नीति की असफलता है कि आज सारे पड़ोसी देश हमसे खतरा महसूस करते हैं। बजाय इसके कि अगर आप एक बड़े भाई की तरह रहते या जुड़वां भाई की तरह रहते तो वह चीज नहीं है।
Read more: बात बोलेगी हम नहीं http://batbolegihamnahin.blogspot.com/#ixzz0tdxPRP6L
भारत ने प्रचंड की सरकार गिरवाई-आनंद स्वरुप वर्मा
Amalendu Upadhyaya, बुधवार, 14 जुलाई 2010सोनिया मैडम को गुस्सा क्यों आता है
चन्दन राय, सोमवार, 7 जून 2010कांग्रेस की शक्तिपीठ माने जाने वाली सोनिया परिवार एक बार फिर विवादों में है। कांग्रेस के निचले स्तर के नेता गणेश परिक्रमा में लग गए हैं, सोनिया परिवार की मान की खातिर। आखिर क्यों सोनिया पर लिखी कोई किताब, उपन्यास या सिनेमा को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया जाता है? क्यों सोनिया नहीं चाहती कि वे भारत की राजनीति के केंद्र में आएं? क्या खतरा महसूस करती हैं वे सत्ता के सांप-सीढ़ी के खेल से? कई ऐसी जानी-अनजानी वजहें हैं, जिसके कारण यह परिवार मुख्यधारा की राजनीति से अलग होकर राजनीति की गंगोत्री ही बने रहना चाहता है। गंगोत्री पर खतरा महसूस होते ही कांग्रेस को ऐसा महसूस होने लगता है कि अब तो हमारी राजनीति की गंगा ही सूखने लगेगी। इसलिए इस पर आए खतरे को टालने के लिए कांग्रेस के दूसरे दर्जे के नेताओं को आगे कर लड़ाई लड़ी जाती है। अब कोई अभिषेक मनु सिंघवी बलिदान हो तो, अपनी बला से। लेकिन कांग्रेस अपने सिपाहसलारों की चारण-वंदना का पुरस्कार भी समय पर मंत्रिमंडल में जगह देकर अदा करती है। शर्त भी सिर्फ एक ही होती है कि वह अपनी निष्ठा इस शक्तिपीठ के प्रति राजनीति से संन्यास लेने तक बनाए रखे। जितनी बड़ी परिक्रमा करने वाला होता है, उसे राजनीति में उतने ही शीर्ष पद से नवाजा जाता है। जिसने भी इस परिवार की छत्रछाया को चुनौती दी, चाहे वे मराठा छत्रप हों या ममता बनर्जी, बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। ये बातें कांग्रेस पार्टी में नेहरू के दौर से ही शुरू हो गई थी, जिस परंपरा को इस पार्टी ने आज तक जीवित रखा है। ताजा विवाद प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉमिनिक लापियर के भतीजे जेवियर मोरो के उपन्यास 'एल सारी रोसोÓ यानी 'द रेड सारीÓ को लेकर है। इस उपन्यास को लेकर कांग्रेस के सिपाहसलार यह कयास लगा रहे हैं कि जरूर सोनिया के अनछुए पहलुओं की चर्चा भी इसमें होगी। सोनिया-राजीव के प्रेम-संबंधों से लेकर राजीव की हत्या के बाद वतन वापसी के मुद्दे को भी इस उपन्यास में उठाया गया है।
भारत के प्रबुद्ध वर्ग इस बात से अवगत होंगे कि सोनिया गांधी एक समय अपने बच्चों को लेकर इटली लौट जाना चाहती थीं। कांगे्रस के बुद्धिजीवियों के मान-मनुहार के बाद ही उन्होंने राजनीति में आने का फैसला लिया और देश में एक सशक्त राजनेता बनकर उभरी। कांग्रेस को इस बात का डर सालता रहा है कि सोनिया के कमजोर पहलूओं को जनता के बीच लाने से उनकी सशक्त छवि धूमिल होगी। इसलिए इस उपन्यास का अंग्रेजी संंस्करण भारत में आने से पहले ही वह चाहती है कि इस किताब को प्रतिबंधित कर दिया जाए। कुछ ऐसी ही गुस्ताखी हाल में फिल्म निर्देशक एवं राजनेता प्रकाश झा ने भी की थी। इस हिमाकत की वजह से उनकी फिल्म 'राजनीतिÓ को कड़े सेंसर के दौर से गुजरना पड़ा। कांग्रेस के सहयोगियों की एक कमिटी बना दी गई, जिसने अपनी मर्जी से फिल्म के दृश्यों की कांट-छांट की। आपात काल के दौर में तमाम फिल्म निर्माता-निर्देशकों पर भी इसी तरह का अघोषित सेंसर लागू था। अगर आप कांग्रेस की विचारधारा से सहमत हैं, तो फिल्म बेरोकटोक 'केवल व्यस्कों के लिएÓ होते हुए भी 'यूÓ सर्टिफिकेट से मुक्त। अगर आपने कांग्रेस के विचारों से अलग लाईन लेने की कोशिश की तो फिर आपकी खैर नहीं। सरकार का दिखाई नहीं देनेवाला डंडा इन निर्देशकों को हमेशा लाईन पर रखता था। कुछ ऐसा ही डर फिल्मकार जो राइट की रातों की नींद हराम किए है जिन्होंने लेडी माउंटबेटेन और नेहरू के संबंधों को लेकर इंडियन समर नाम से फिल्म बनाने की तैयारी कर ली थी। जिस डर ने उनकी नींद छीन ली थी, वही हुआ।
हमेशा सत्ताधारी पार्टियों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से अपने अस्तित्व पर खतरा महसूस किया है। ये राजनीतिक हमले पहले दबे-छुपे रूप में होते थे, अब खुलकर होने लगे हैं। राजनेताओं का छद्म आवरण इन दिनों जनता के आगे उतर चुका है। चाहे जसवंत सिंह की किताब को लेकर संघ परिवार में मचा तूफान हो या फिर कभी भाजपा अध्यक्ष रह चुके आडवानी के जिन्ना को लेकर पाकिस्तान की सरजमीं पर दिया गया बयान। राजनेताओं में 'सच का सामनाÓ करने की लोकतांत्रिक आदत इस देश का जाग्रृत समाज विकसित नहीं कर पाया है। यहां एक तरफ तो महामहिम होते हैं, तो दूसरी तरफ भूखी-नंगी जनता। एक तरफ सत्ता की नजदीकियों का मजा लेते पूंजीपति वर्ग हैं, तो दूसरी तरफ अपने हक के लिए सड़क पर उतरे किसान, मजदूर, आदिवासी । हम सशस्त्र नक्सली संघर्ष की हिमायत करने वाली अरुंधति राय की अभिव्यक्ति की आजादी के तर्क पर समर्थन करते हैं, तो वहीं स्पेनिश लेखक मूर के सोनिया गांधी के जीवन पर आधारित उपन्यास पर लाल-पीले हो जाते हैं। प्रकाश झा की 'राजनीतिÓ पर झल्लाने लगते हैं। क्यों? आखिर यह दोहरे मानदंड क्यों? अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही कसौटी है, तो अरुंधति और मूर में अंतर कैसे किया जा सकता है? हम मानते हैं कि अरुंधति के बयान से सुरक्षा बलों से लेकर देश का वह बड़ा तबका भी आहत हुआ, जो नक्सली हिंसा से ग्रस्त है। लेकिन फिर भी हमने बोलने-लिखने की आजादी के मूलभूत सिद्धांत का सम्मान किया। लेकिन मूर को तो कांग्रेस ने कानूनी नोटिस थमा दिया। जबकि मूर यह कह चुके हैं कि उनकी यह कृति सोनिया गांधी की जीवनी नहीं है,महज एक उपन्यास है। इस नाते उपन्यास में जिस कल्पनाशीलता के लिए अवकाश रहता है, वह यहां भी रहना चाहिए। एक बात और मूर ने इस पुस्तक की पांडुलिपि सोनिया की बहन के जरिए प्रकाशन से पूर्व सोनिया गांधी तक भिजवाई थी- इस अपेक्षा से कि अगर कुछ कहना हो तो कहें। लेकिन तब गांधी परिवार की ओर से कोई आपत्ति नहीं जताई गई थी।
क्या कारण है कि अरूंधति राय और महाश्वेता देवी जैसे लोगों को सशस्त्र क्रांति की वकालत करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इस सवाल में ही व्यवस्था के सारे दुख-दर्द का हल छुपा है। हम कह सकते हैं कि गांधीवादी तरीकों से विमुख होते समाज की पीठ सहलाने को सरकार ही उन्हें मजबूर करती है। लेकिन देश के तमाम बुद्धिजीवियों की मांग ठुकराते हुए हमारे गृहमंत्री माओवादियों पर किसी तरह का बहस नहीं चाहते। चाहेंगे भी क्यों, फिर तो विकास का मुद्दा आएगा, आदिवासियों को 'जल, जंगल, जमीनÓ से बेदखल करने की बात सामने आएगी, देशी-विदेशी कंपनियों को जंगल के खनिज संपदाओं के दोहन के लिए अवैध तरीके से एमओयू का मामला भी उठेगा, वनरक्षकों एवं स्थानीय पुलिस की आदिवासी महिलाओं पर अत्याचार की बातें सामने आएगी। सरकार बेवजह एक चर्चा को तूल देकर क्यों 'आ बैल मुझे मारÓ का खतरा घर बैठे मोल लेगी।
कई राज्य सरकारों का ध्येय तो 'माओवादी, माओवादीÓ चिल्लाकर ही केंद्र से पैसा ऐंठना होता है। नक्सलियों की खबरों को प्रमुखता दी जाती है, वहीं गुपचुप तरीके से जंगल में 'आपरेशन ग्रीन हंटÓ के नाम पर आदिवासियों को निशाना बनाया जाता है। कितने माओवादी मरते हैं और कितने आदिवासी, इसका आंकड़ा तो सरकार की फाइलों में भी नहीं दर्ज होता होगा। मरते तो आदिवासी ही हैं, नक्सलियों के साथ न जाओ, तो नक्सली मारते हैं, सलवा जुड़ुूम का साथ दो, तब भी उनकी बंदूकें तनी होती हैं और बाकि कोर-कसर वनरक्षक, स्थानीय पुलिस और आपरेशन ग्रीन हंट चलाने वाले पूरा करते हैं। सरकार को यह सोचना होगा कि आदिवासी डर कर नक्सलियों का समर्थन करते हैं या विकास की धारा वहां तक नहीं पहुंचने के कारण। उनका तो सरकार से एक ही आग्रह हैै कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। जंगलों में रहना उनके लिए वैसा ही है जैसे किसी जंगली जानवर को जंगल की सरहदें से बाहर निकालकर शहर में बसाना। उन्हें घर से उजाड़ेंगे, तब वे किसी का भी दामन थामने को तैयार होंगे, चाहे वे नक्सली हों या मिशनरी या फिर कोई संघी। शहरों में कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो आदिवासियों की कल्पना नंगे रहने वाले, मुंह से जंगली आवाज निकालने वाले, नरबलि देने वाले, अजीब से देवता की पूजा करने वाले समुदाय के रूप में ही करते हैं। ह्वïाईट मैन बर्डेन की तरह नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर तबके के साथ खड़े होने का साहस आज हमें दिखाना होगा और गांधी के अंतिम आदमी की तरह उसका हाथ थामकर चलना होगा। तभी माओवादियों के लाल गलियारे पर शांति के फूल बिखेरे जा सकते हैं। मुख्यधारा की पार्टियों को भी जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को महत्व देना होगा ताकि लोकतंत्र का नवजात पौधा इस देश की मिट्टी में जड़ पकड़ सके और हम गर्व से कहें कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं।
कैसे जिएं निगहबां?
चन्दन राय, सोमवार, 31 मई 2010ये वही इलाके हैं जहां लोग प्यास से मर रहे हैं। ये वही इलाके हैं जहां लोग बीमारी से मर रहे हैं। ये वही लोग हैं, जिन्हें विदेशी कंपनियों के लिए अपने घरों से उजाडा जा रहा है। ये वही लोग हैं, जिनकी याचना को सरकार हमेशा अनसुनी करती आई है। सरकार को ये बात समझनी होगी कि खून चाहे इधर बहे या उधर बहे, अपना ही है।
जवानों को
एक साथ दो मोर्चों पर लडना पड रहा है। माओवादी तो समस्या हैं ही, कब कहां से आएं और दन-दनाकर फायरिंग शुरू कर दें। लेकिन एक और हमलावर है जो उनसे ज्यादा फुर्तीला और खतरनाक है, गुरिल्ला वार में तो वह दुनिया की तेज-तर्रार फौज के भी छक्के छुडा सकता है। ये हैं मलेरिया के मच्छर, जो सुनसान जंगलों में जानलेवा साबित होते हैं, जहां इलाज के लिए दूर-दूर तक कोई अस्पताल नहीं। साथ में कोई डॉक्टर नहीं, जो वक्त-बेवक्त इलाज के लिए आगे आए। बिल्कुल असहाय, उपलब्ध जडी-बूटियों से अनभिज्ञ, धीमे-धीमे बीमार और कमजोर होने के अलावा कोई चारा नहीं और जंगल का कानून है कि वह कमजोर लोगों का साथ नहीं देता।सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट, जिसके खिलाफ माओवादी समाज से लड रहे हैं, ही जंगल का कानून है। एक झटके में ही 76 सीआरपीएफ के जवान शहीद हो जाते हैं। ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाने वाली सरकार को क्या इस बात का अंदाजा नहीं कि जंगल की लडाई के क्या कायदे-कानून होते हैं? आखिर क्यों सरहद की रक्षा करने वाले जवानों को देश की सीमा के अंदर युध्द जैसी स्थिति पैदा कर मरने के लिए छोड दिया जाता है। 9 फीसदी की विकास दर पर मचलने वाले देश के पास क्या इतना भी पैसा नहीं कि अपने सैनिकों के लिए एक मच्छरदानी भी खरीद सके।
वीर जवानों की शहादत ने कई ऐसे अहम सवाल छोड दिए हैं, जो हमें शर्मसार करते हैं। अब जानकारी मिल रही है कि माओवादियों के पास लाईट मशीन गन भी था, स्वचालित हथियारों से लैस करीब 1000 माओवादियों ने हमले की योजना महज वारदात के कुछ घंटे पूर्व ही बनाई थी। गुरिल्ला वार में माहिर माओवादियों को इस बात की जानकारी थी कि ये जवान आने-जाने के लिए इन्हीं रास्तों का उपयोग करते हैं। त्वरित कार्रवाई करते हुए उन्होंने जवानों पर हमला बोला था। हमारे जवान भी गोला, बारूद खत्म होने तक हमले का जवाब देते रहे। एक लंबी लडाई के लिए जरुरी है कि हमारे जवानों के हौसले बुलंद हों। उन्हें यह महसूस हो कि उनकी शहादत के पीछे देश की इज्जत, प्रतिष्ठा के साथ ही लोकशाही का समर्थन भी है। अगर जंगल में हमलों के दौरान उनका ध्यान जंगली जानवरों, मच्छरों, पीने के पानी की तरफ रहा, तो युध्द में हार निश्चित है। हमारे जवानों का मनोबल ऊंचा रखने के लिए जरुरी है कि उनकी छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा किया जाए। उन्हें इलाके की पुख्ता जानकारी हो, माओवादियों की गतिविधियों पर पैनी नजर हो, साथ ही राज्य पुलिस भी खुलकर मदद करे। भूखे-प्यासे और आधे-अधूरे मनोबल से युध्द नहीं लडे ज़ाते।
जवानों को एक साथ दो मोर्चों पर लडना पड रहा है। माओवादी तो समस्या हैं ही, कब कहां से आएं और दन-दनाकर फायरिंग शुरु कर दें। लेकिन एक और हमलावर है जो उनसे ज्यादा फुर्तीला और खतरनाक है, गुरिल्ला वार में तो वह दुनिया की तेज-तर्रार फौज के भी छक्के छुडा सकता है। ये हैं मलेरिया के मच्छर, जो सुनसान जंगलों में जानलेवा साबित होते है, जहां इलाज के लिए दूर-दूर तक कोई अस्पताल नहीं। साथ में कोई डॉक्टर नहीं, जो वक्त-बेवक्त इलाज के लिए आगे आए। बिल्कुल असहाय, उपलब्ध जडी-बूटियों से अनभिज्ञ, धीमे-धीमे बीमार और कमजोर होने के अलावा कोई चारा नहीं। और जंगल का कानून है कि वह कमजोर लोगों का साथ नहीं देता। थके-हारे जवान माओवादियों से लडें या कमजोर साथियों को सहारा दें। कमोबेश जंगल में स्थित सभी कैंप कुछ ऐसे ही हालत से गुजर रहे हैं। तो ये है जंगल का सच, जो दुश्मन देशों के दांत खट्टे करने वाले सैनिकों के मनोबल को भी चकनाचूर कर देता है।
एक ऐसे युध्द में जहां जीत की कोई गुंजाइश नहीं, भूखे-प्यासे जवानों को भेजना कहां तक उचित है? सेना के लिए एक अलग से रसद-सामग्री ले जाने के लिए सैनिकों की टुकडी होती है। दिन में दुश्मनों से लडते समय भी उन्हें पता है कि चलो रात तो भूखे पेट नहीं सोना होगा। ड्राई फ्रूटस के अलावा कई तरह के पौष्टिक आहार सैनिकाें को दिए जाते हैं। लेकिन इस युध्द में क्या हमने उम्मीद लगाई थी कि सीआरपीएफ के जवान भूखे पेट लडक़र भी इन्हें चुटकियों में मसल देंगे। युध्द लडना ही है तो हमें जवानों को मूलभूत सुविधाएं देनी होंगी। जंगल में जवानों का तो ये हाल है कि प्यास लगने पर इन्हें मीलों दूर जाना पडता है। कैंप में पानी के लिए पंप तो लगे हैं, लेकिन बिजली रहे तब तो पानी मिले। जवानों को इस बात का अंदाजा भी नहीं होता कि पानी की तलाश में निकलने पर आगे कोई तालाब भी होगा। एक खतरा ये भी होता है कि माओवादी पानी की तलाश में निकले जवानों पर घात लगा सकते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि जंगल की भीषण गर्मी जवानों को पानी के ठिकानों की ओर जरुर खींच लाएगी। अगर कभी जलाशय मिलते भी हैं, तो जानवर उसे इतना प्रदूषित कर चुके होते हैं कि ऐसे पानी पीना खुलेआम मौत को आमंत्रण देना होता है।
गुरिल्ला वार से अनभिज्ञ जवान जिन गाड़ियां में थे, वे बारूदी सुरंग निरोधी नहीं थीं बल्कि महज बुलेट प्रुफ थीं। क्या सरकार को इस बात की जानकारी थी कि माओवादियों ने जगह-जगह पर बारूदी सुरंगें बिछा रखी हैं। फिर ऐसे वाहन में उन्हें भेजना, तो सीधे मौत के मुंह में भेजना ही कहा जा सकता है। जांच के दौरान पता चला है कि उस दिन माओवादियों ने जवानों को चारों तरफ से घेर लिया। माओवादी पहाड़ी पर थे और उन्होंने गांव को जोड़ने वाले रास्ते को भी बंद कर रखा था। ऊंचाई पर होने का फायदा उन्हें इस लडाई में मिला। अभी सरकार ने इस बात की घोषणा की है कि जवानों को जंगल में विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। इन्हें भारी हथियार लेकर पेड पर चढने की भी टे्रनिंग दी जाएगी। एकाएक हमला करने एवं हमले के बाद छुप जाने की ट्रेनिंग भी इसका एक हिस्सा होगा। लेकिन जंगल के चप्पे-चप्पे से वाकिफ माओवादियों से लड पाना जवानों के लिए फिर भी एक चुनौती होगी।
यों भी 76 जानें कोई मामूली नहीं, वीर जवानों की थीं, जिनके प्रशिक्षण पर देश के करोडाें रुपए लगे होते हैं। अगर एक व्यक्ति पर पांच लोग भी निर्भर थे तो इससे 380 लोगों के जीवन में अंधकार और दुख का साया मंडराने लगा है। सरकार को इस बात की तलाश करनी होगी कि आखिर इन इलाकों में माओवादी क्यों एकाएक बढ़े। ये वही इलाके हैं जहां लोग प्यास से मर रहे हैं। ये वही इलाके हैं जहां लोग बीमारी से मर रहे हैं। ये वही लोग हैं, जिन्हें विदेशी कंपनियों के लिए अपने घरों से उजाडा जा रहा है। ये वही लोग हैं, जिनकी याचना को सरकार हमेशा अनसुनी करती आई है। सरकार को ये बात समझनी होगी कि खून चाहे इधर बहे या उधर बहे, अपना ही है। इनसे लडने वाले कई जवानों की भी शायद वही पारिवारिक पृष्ठभूमि हो। जवानों को भी जानकारी है कि वे ऐसी लडाई में अपनी जान गंवा रहे हैं, जिसका कोई सैनिक हल नहीं। भूखों को बुलेट नहीं, रोटी चाहिए। ऐसे में देश के दुश्मनों से लडने वाला मनोबल उनके सामने नहीं होता। और जब मनोबल में दुश्मनों को मारने वाला जज्बा न हो, तब हथियार तो कुंद हो ही जाएंगे।
दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठकर युध्द के नियम बनाने तो आसान हैं, लेकिन जमीन पर लडने वाले जवानों की असली समस्याओं को समझ पाना मुश्किल। जवानों की शहादत पर घडियाली आंसू बहाने वाले राजनेताओं को इनके प्रति मानवीय रुख अपनाना होगा। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने युध्द लडने वाले सैनिकों के साथ भिखारियों की तरह व्यवहार करने के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजधानी के किसी हिस्से में भीख मांगकर गुजारा करने वाला व्यक्ति भी हर रोज एक हजार रुपए कमा लेता है, और हम दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर जंग लडने वाले सिपाहियों को एक हजार रुपए महीने भत्ता दे रहे हैं, जिसने इस जंग में अपने हाथ तक गंवा दिए हों। क्या बहादुर सैनिकों के साथ व्यवहार करने का सरकार का यही तरीका है? क्या कोर्ट की इस फटकार के बाद सरकार से अपने जवानों के प्रति संवेदनशील होने की उम्मीद की जा सकती है? अगर हालात यही रहे और देश पर जान देने वालों का जज्बा कम हो गया, तो यकीन मानिए, यह देश के अब तक के हुए बडे हादसों से सौ गुना अधिक होगा।
