Visit blogadda.com to discover Indian blogs कठफोड़वा: इस्मत चुग़ताई
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मासूमा

बहुत दिनो से कुछ पढ़ नहीं। अपने पढ़ने की भुख को मिटाने के लिए कुछ खोज रहा था ठीक उसी तरह जैसे कुत्ता भुखा होने पर हड्डी खोजता है। तभीं मुझे इस्मत चुग़ताई की एक किताब मिली `मासूमा´ जिसकी शुरूआत एक कविता से हुई है और खत्म भी कविता से है। और किताब के बारे में ज्यादा तो नहीं बता सकता क्योंकि अभी मैंने पढ़ना शुरू ही किया है मगर मैं आपको वो दोनो कविता पेश करना चाहता हूं-




किताब जहां से शुरू होती है-

चार महीने का मकान का किराया
नौकरों की तन्ख्वाह-बनिये का कर्ज
बिजली का बिल-धोबी की धुलाई
बच्चों की फीस-पानी सर से गुज़र जाता है
मैं डूबते-डूबते उभरकर देखती हूं
मेरी सोलह बरस की जीती जागती बेटी
नौ-उम्र सहेलियों के साथ रस्सी कूद रही है।


और किताब के अन्त में-
मेरी सोलह बरस की जीती जागती बेटी
नौ-उम्र सहेलियों के साथ रस्सी कूद रही है
ऐ काश मैं वापस उसे अपनी कोख में छुपा सकती !